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Supreme Court: 40 याचिकाओं पर सुनवाई शुरू, परियोजनाओं की पर्यावरण मंजूरी से जुड़े आदेश पर पुनर्विचार की मांग

Tue, 07 Oct 2025 10:09 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Tue, 07 Oct 2025 10:09 PM IST
सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 40 याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की, जिनमें 16 मई के उसके फैसले पर पुनर्विचार और संशोधन की मांग की गई है। फैसले में केंद्र सरकार की  उन परियोजनाओं को पिछली तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी देने के निर्णय को खारिज कर दिया गया था, जो पर्यावरण नियमों का उल्लंघन कर रही थीं।

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SC commences hearing pleas seeking review, modification of May 16 verdict on grant of EC to projects
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 40 याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। इन याचिकाओं में शीर्ष कोर्ट के 16 मई के फैसले में संशोधन और पुनर्विचार की मांग की गई है। कोर्ट ने केंद्र सरकार की उन परियोजनाओं को पिछली तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी देने के फैसले को रद्द कर दिया था, जो पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करते पाए गए थे।
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वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी निजी रियल एस्टेट डेवलपर्स की शीर्ष संस्था क्रेडाई की ओर से पेश हुए। उन्होंने चीफ जस्टिस (सीजेआई) बीआर गवई, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस के विनोद चंद्र की बेंच के सामने अपनी दलीलें रखनी शुरू कीं। बेंच कुल चालीस याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इनमें क्रेडाई और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी सेल की याचिका भी शामिल है। इन याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट के 16 मई के फैसले पर पुनर्विचार, उसमें संशोधन या स्पष्टीकरण की मांग की गई है। 
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जस्टिस अभय एस ओका (अब सेवानिवृत्त) और जस्टिस भुइयां की बेंच ने 16 को फैसला सुनाया था। फैसले में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और संबंधित अधिकारियों को उन परियोजनाओं को पिछली तारीख से पर्यावरण मंजूरी देने से रोक दिया गया था, जो पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करते हुए शुरू की गई थीं। 

जस्टिस ओका ने इस फैसले को लिखा था, जिसकी अब समीक्षा की जा रही है। उन्होंने कंपनियों को बाद में मिली पर्यावरण मंजूरी को खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था कि प्रदूषण मुक्त वातावरण में जीने का अधिकार संविधान के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। रोहतगी ने आलोचना करते हुए कहा, यह फैसला बताता है कि केवल एक ही रास्ता बचता है- ढांचों को तोड़कर गिराना। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को ऐसी परियोजनों को पीछे की तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी देने का अधिकार है और इस पहलू को उस फैसले में नजरअंदाज कर दिया गया, जिसकी अब समीक्षा की जा रही है।


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उन्होंने कहा, फैसला कहता है कि अगर कोई पर्यावरणीय मंजूरी नहीं है तो उसे गिरा दो और मंजूरी लेकर फिर से बनाओ। कोर्ट का मानना था कि अगर पहले से मंजूरी नहीं थी तो सब कुछ गिरा दो। रोहतगी ने कहा कि सरकार ने दंड के भुगतान के बाद पिछली तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी देने का प्रावधान इसलिए बनाया है, ताकि अगर परियोजनाओं के पास अन्य मंजूरियां हों तो उन्हें बचाया जा सके। बेंच ने फिर पूछा कि क्या सरकार हत्या के मामलों में माफी देने का प्रावधान बना सकती है। रोहतगी ने कहा कि एक हत्या के दोषी को भी 14 साल के बाद रिहा कर दिया जाता है क्योंकि नीति सुधार करने की होती है, सजा देने की नहीं। 

उन्होंने कहा कि अगर सब कुछ तोड़ दिया गया तो इससे और अधिक प्रदूषण होगा और इसके अलावा, पर्यावरण मंजूरी देने में समीक्षा की एक नीति भी होती है। रोहतगी ने कहा कि कभी-कभी परियोजना के प्रस्तावक को पता नहीं होता कि उसे पहले पर्यावरण मंजूरी लेनी होती है, ऐसे मामलों में परियोजना को बचाया जाना चाहिए। इस पर बेंच ने कहा, कानून को नजरअंदाज करना कोई बहाना नहीं है। 

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