India-Iran दस साल के लिए भारत का हुआ चाबहार बंदरगाह; अटल सरकार में शुरू हुई वार्ता को मोदी सरकार ने किया पूरा
भारत का लक्ष्य सीआईएस (स्वतंत्र देशों का राष्ट्रमंडल) देशों तक पहुंचने के लिए चाबहार बंदरगाह को अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) के तहत आवाजाही का केंद्र बनाना चाहता है।
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भारत-ईरान ने सोमवार को बहुप्रतिक्षित चाबहार बंदरगाह समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के तहत ईरान का यह बंदरगाह 10 वर्ष के पट्टे पर भारत को मिला है। इस अवधि में भारत इसका विकास-संचालन करेगा। इसे लेकर भारत-ईरान के बीच अटल सरकार के दौर में वार्ता शुरू हुई थी, जिसे दो दशक बाद मोदी सरकार ने अमलीजामा पहनाया।
इसे अरब सागर में पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर चीनी मौजूदगी के खतरों के खिलाफ भारत के संतुलन का प्रयास माना गया है। बंदरगाह और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ईरानी समकक्ष मेहरदाद बजरपाश के साथ चाबहार स्थित शाहिद-बेहिश्ती पोर्ट टर्मिनल के दीर्घकालिक संचालन अनुबंध के गवाह बने। सोनोवाल ने कहा, चाबहार न केवल भारत का निकटतम ईरानी बंदरगाह है, बल्कि समुद्री परिवहन की दृष्टि से भी अहम है। यह बंदरगाह वैशि्वक उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) परियोजना का प्रमुख केंद्र बनेगा। आईएनएसटीसी में शामिल भारत कि अलावा ईरान, अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस मिलकर एशिया-यूरोप के बीच माल-ढुलाई की 7,200 किमी लंबी परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। यह भारत-अफगानिस्तान के लिए भी मील का पत्थर है।
भारत की तरफ से आईपीजीएल को मिला अनुबंध
यह अनुबंध भारत की तरफ आईपीजीएल और ईरान की तरफ से पोर्ट्स एंड मैरीटाइम (पीएमओ) के बीच हुआ है। समझौता अवधि में बंदरगाह को आईपीजीएल की तरफ से विकसित-संचालित किया जाएगा। आईपीजीएल बंदरगाह पर 12 करोड़ डॉलर निवेश करेगा। बुनियादी ढांचे में सुधार को साझा परियोजनाओं के लिए भारत 25 करोड़ डॉलर का ऋण भी देगा।
भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है चाबहार
- भारत के लिए रणनीतिक रूप से यह काफी महत्वपूर्ण है।
- भारत की अब अफगानिस्तान तक पहुंच आसान हो जाएगी, पहले कोई भी माल भेजने के लिए पाकिस्तान होकर जाना पड़ता था।
- अब आर्मेनिया, अजरबैजान के साथ सीधे व्यापार कर संभव होगा।
- यूरोप तक आसानी से कारोबार होगा और यूरोप पहुंचने में हमारे जहाजों को 15 दिन कम लगेंगे।
- चाबहार प्रोजेक्ट पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह और चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का जवाब है।
- मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के बीच कारोबार बेहतर होगा और आपसी संबंध मजबूत होंगे।
- इसके जरिये भारत राष्ट्रमंडल देशों तक पहुंचने के लिए नॉर्थ-साउथ परिवहन गलियारे को विकसित करना चाहता है।
- चाबहार को इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ फ्रेट कॉरिडोर से भी जोड़ा जाएगा, ऐसा होने पर भारत की कनेक्टिविटी रूस तक हो जाएगी।
चाबहार बंदरगाह के संचालन का अनुबंध भारत के लिए उपलब्धि
म्यांमार में सितवे बंदरगाह के उद्घाटन के बाद चाबहार बंदरगाह के संचालन का अनुबंध समुद्री क्षेत्र में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर देखा जा है। इस अनुबंध के जरिए दोनों देशों का उद्देश्य समुद्री क्षेत्र में चीनी उपस्थिति को बेअसर करना है। बता दें कि सर्वानंद सोनोवाल ने पिछले साल मई में म्यांमार के सितवे बंदरगाह का उद्घाटन किया था।
ईरान के चाबहार बंदरगाह को भारत की कनेक्टिविटी पहल के प्रमुख घटक के तौर पर देखा जाता है। यह भारत, अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया के बीच व्यापार का छोटा मार्ग प्रदान करेगा। भारत का लक्ष्य सीआईएस (स्वतंत्र देशों का राष्ट्रमंडल) देशों तक पहुंचने के लिए चाबहार बंदरगाह को अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) के तहत आवाजाही का केंद्र बनाना है।
जयशंकर ने चाबहार बंदरगाह समझौते पर दी प्रतिक्रिया
केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चाबहार बंदरगाह समझौते को लेकर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा, "मेरे कैबिनेट सहयोगी सर्वानंद सोनोवाल आज ईरान जा रहे हैं। भारत और ईरान के बीच दीर्घकालिक समझौता देखने की उम्मीद है। हम यह उम्मीद करते हैं कि बंदरगाह के उस हिस्से से अधिक निवेश और कनेक्टिविटी मिलेगा। यह निश्चित रूप से एक अच्छी दिशा में जा रहा है।"
आईएनएसटीसी एक बहु-मॉडल परिवहन मार्ग है। यह हिंद महासागर और फारस की खाड़ी को ईरान के जरिए कैस्पियन सागर और रूस के माध्यम से उत्तरी यूरोप से जोड़ता है। इस साल जनवरी में केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी ने चाबहार बंदरगाह विकास योजना में तेजी लाने के लिए चर्चा की थी। इस बैठक में विदेश मंत्री जयशंकर ने ईरान के साथ सहयोग समझौते में रुचि दिखाई थी।