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Supreme Court: बिना अध्ययन रेत खनन पर्यावरण के लिए खतरनाक, सुप्रीम कोर्ट ने वैज्ञानिक विश्लेषण पर दिया जोर
Sat, 23 Aug 2025 06:51 AM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Sat, 23 Aug 2025 06:51 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना उचित वैज्ञानिक अध्ययन के नदी तल से बालू खनन पारिस्थितिकी के लिए खतरनाक है। कोर्ट ने सतत और किफायती तरीके अपनाने की जरूरत बताई। जस्टिस नरसिम्हा और चंदूरकर की पीठ ने कहा कि निर्माण-ग्रेड बालू की वैश्विक मांग बढ़ रही है और 2050 तक इसकी भारी कमी हो सकती है।
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सुप्रीम कोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नदी तल की मौजूदा स्थिति का उचित अध्ययन किए बिना बालू खनन के लिए पर्यावरणीय मंजूरी देना पारिस्थितिकी के लिए घातक साबित हो सकता है। शीर्ष अदालत ने सतत और किफायती तरीकों से नदी से बालू खनन के लिए वैज्ञानिक अध्ययन किए जाने पर जोर दिया। जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर की पीठ ने कहा कि निर्माण कार्य में उपयोग होने वाली बालू की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है और अनुमान है कि 2050 तक दुनिया में निर्माण-ग्रेड बालू की भारी कमी हो सकती है।
पीठ ने कहा, निर्माण-ग्रेड बालू मुख्य रूप से नदियों जैसे जलीय वातावरण में मिलती है। नियंत्रित परिस्थितियों में भी नदी तल और किनारों से बालू निकालने का अभ्यास पर्यावरण को प्रभावित करता है। कोर्ट ने कहा, आसान उपलब्धता के कारण निर्माण परियोजनाओं में लंबे समय से बालू और बजरी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता रहा है।
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लेकिन खनन की पद्धति और नदी की भौगोलिक-जलवैज्ञानिक स्थिति के आधार पर यह प्रक्रिया तटों के क्षरण और पारिस्थितिक संतुलन पर प्रतिकूल असर डाल सकती है। पीठ ने कहा कि नदी तल की मौजूदा स्थिति और पुनःपूर्ति (रीप्लेनिशमेंट) की क्षमता का अध्ययन किए बिना पर्यावरणीय मंजूरी देना पारिस्थितिकी के लिए हानिकारक होगा। इसलिए पुनःपूर्ति अध्ययन जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट किसी जिले के भू-विज्ञान, सिंचाई, वन, लोक निर्माण और खनन विभाग की ओर से तैयार की जाती है। इसका उद्देश्य खनन गतिविधियों के लिए उपयुक्त और निषिद्ध क्षेत्रों की पहचान करना, संसाधनों की पुनःपूर्ति की दर तय करना और खनन के बाद उचित विश्राम अवधि निर्धारित करना होता है।
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पीठ ने कहा, निर्माण-ग्रेड बालू मुख्य रूप से नदियों जैसे जलीय वातावरण में मिलती है। नियंत्रित परिस्थितियों में भी नदी तल और किनारों से बालू निकालने का अभ्यास पर्यावरण को प्रभावित करता है। कोर्ट ने कहा, आसान उपलब्धता के कारण निर्माण परियोजनाओं में लंबे समय से बालू और बजरी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता रहा है।
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लेकिन खनन की पद्धति और नदी की भौगोलिक-जलवैज्ञानिक स्थिति के आधार पर यह प्रक्रिया तटों के क्षरण और पारिस्थितिक संतुलन पर प्रतिकूल असर डाल सकती है। पीठ ने कहा कि नदी तल की मौजूदा स्थिति और पुनःपूर्ति (रीप्लेनिशमेंट) की क्षमता का अध्ययन किए बिना पर्यावरणीय मंजूरी देना पारिस्थितिकी के लिए हानिकारक होगा। इसलिए पुनःपूर्ति अध्ययन जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट किसी जिले के भू-विज्ञान, सिंचाई, वन, लोक निर्माण और खनन विभाग की ओर से तैयार की जाती है। इसका उद्देश्य खनन गतिविधियों के लिए उपयुक्त और निषिद्ध क्षेत्रों की पहचान करना, संसाधनों की पुनःपूर्ति की दर तय करना और खनन के बाद उचित विश्राम अवधि निर्धारित करना होता है।
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