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अहमदाबाद: शोधकर्ताओं को सीवेज के गंदे पानी में कोविड-19 जीन होने के साक्ष्य मिले
Tue, 09 Jun 2020 12:49 PM IST
Tanuja Yadav
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, अहमदाबाद
Published by: Tanuja Yadav
Updated Tue, 09 Jun 2020 12:49 PM IST
सार
- आईआईटी गांधीनगर के शोधकर्ताओ ने गंदे पानी की निगरानी पर दिया जोर
- शोधकर्ताओं को गंदे पानी में कोविड-19 के जीन होने के सबूत मिले
- कोरोना वायरस के ओआरएफ1एबी, एस और एन तीन जीन मिले
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Sewage Treatment Plant
विस्तार
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर के शोधकर्ताओं ने पाया है कि सीवेज के गंदे पानी में भी कोरोना के गैर संक्रमित जीन पाए जा रहे हैं। अहमदाबाद के बाहरी इलाकों से एकत्र किए सीवेज के गंदे पानी के सैंपल से शोधकर्ताओं ने यह जांच की है। कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए शोधकर्ताओं ने गंदे पानी पर आधारिक निगरानी पर जोर दिया है।
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शोधकर्ताओं का कहना है कि इलाज से पहले हॉटस्पॉट की पहचान करना बेहद जरूरी है। अभी तक नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और अमेरिका ने गंदे पानी में सार्स-कोव-2 वायरस के कण देखे हैं। अप्रैल में आईआईटी गांधीनगर 51 प्रीमियर विश्वविद्यालयों और रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ एक वैश्विक संघ से जुड़ा था।
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इस संघ का काम गंदे पानी की निगरानी करना था ताकि भविष्य में कोविड-19 को लेकर दुनिया को चेतावनी दी जा सके। आईआईटी गांधीनगर के प्रोफेसर मनीष कुमार ने कहा कि वायरस की उपस्थिति पता करने के लिए गंदा पानी एक महत्वपूर्ण स्रोत है। उत्सर्जन के दौरान वायरस सिर्फ सिम्टोमैटिक ही नहीं एसिम्टोमैटिक मरीजों के शरीर को भी छोड़ता है।
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अध्ययन में पाया गया है कि गंदे पानी में कोरोना वायरस संक्रमण नहीं फैलाता है। पानी में तापमान एक बड़ी भूमिका निभाता है, जिसकी वजह से वायरस के जीवन पर असर पड़ता है। विश्लेषण के लिए गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने आईआईटी गांधीनगर को आठ मई से 27 मई तक गंदे पानी के सैंपल इकट्ठे करने में मदद की।
हर 100 मिलीलीटर सैंपल को कई समय तक केंद्रित किया ताकि सैंपल में से जेनेटिक मैटेरियल RTPCR को अलग कर दिया जाए। सैंपल में से आरएनए को अलग निकाला गया, जिसके बाद पता चला कि सभी सैंपल में कोरोना वायरस के तीन जीन मिले, जिसमें ओआरएफ1एबी, एस और एन जीन शामिल हैं।
टीम में मौजूद अरबिंद कुमार पटेल ने पाया कि आरटीपीसीओर के परिणाम की वजह से अहमदाबाद के सरकारी अस्पताल में कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। गंदे पानी पर आधारिक महामारी विज्ञान ज्यादातर विकसित देशों में की जाती है। मनीष कुमार ने कहा कि देश में जनसंख्या ज्यादा होने की वजह से सभी लोगों का कोरोना टेस्ट नहीं हो सकता है।
कोरोना वायरस लंबे समय के लिए रहने वाला है, इसके लिए जरूरी है कि सरकार महामारी को समझने और वृत्त को नीचे लाने के लिए गंदे पानी पर आधारित निगरानी पर जोर दे। शोधकर्ताओं का कहना है कि मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में गंदे पानी की निगरानी करने से सरकार को कोरोना के चरम को रोकने में मदद मिल सकेगी।
सीएसआईआर-राष्ट्रीय पर्यावरण अभियंत्रिकी और रिसर्च संस्थान के निदेशक राकेश कुमार का कहना है कि भारत में गंदे पानी पर आधारित निगरानी करना कठिन काम है। इस प्रणाली को अपनाने के लिए बहुत ज्यादा सैंपलिंग करनी होगी। भारत में पानी की मात्रा को देखते हुए यह काम मुश्किल हो सकता है।
जीबीआरसी के निदेशक चैतन्य जी जोशी का कहना है कि गंदे पानी के सैंपल से निकाले गए सैंपल में जीन का विश्लेषण करना मुश्किल काम है। हालांकि इस अध्ययन में कोरोना वायरस के विस्तार को समझने के लिए मदद मिल सकती है।