अध्ययन: शोधकर्ताओं ने खोजा जलवायु चेतना का नया फॉर्मूला, आंकड़ों से नहीं अनुभवों से बदलेगी सोच
शोधकर्ताओं ने पाया कि जब लोगों को दीर्घकालिक तापमान वृद्धि के चार्ट दिखाए गए तो उन्होंने अपेक्षाकृत हल्की प्रतिक्रिया दी। लेकिन जब उन्हें यही परिवर्तन इस रूप में दिखाया गया कि क्या झील अब भी हर साल जमती है या नहीं, तो उनकी चिंता अधिक तीव्र रही।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
जलवायु परिवर्तन का मुकाबला सिर्फ आंकड़ों से नहीं होगा बल्कि उन अनुभवों को समझाने से होगा जो लोगों की संस्कृति, भावनाओं और दिनचर्या से जुड़े हैं। तापमान के ग्राफों से ज्यादा जरूरी है यह बताना कि हम क्या-क्या खो रहे हैं। बर्फ की झीलें, आइस स्केटिंग, तैरने के तालाब, यहां तक कि ताजा हवा भी। प्रिंसटन और कैलिफोर्निया विवि के वैज्ञानिकों ने एक नए शोध में इसी मनोविज्ञान को उजागर किया है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर ह्यूमन बिहेवियर में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जब लोगों को दीर्घकालिक तापमान वृद्धि के चार्ट दिखाए गए तो उन्होंने अपेक्षाकृत हल्की प्रतिक्रिया दी। लेकिन जब उन्हें यही परिवर्तन इस रूप में दिखाया गया कि क्या झील अब भी हर साल जमती है या नहीं, तो उनकी चिंता अधिक तीव्र रही।
ये भी पढ़ें: F-35B: 'तकनीकी दिक्कत को दूर करने का काम जारी', केरल में 10 दिनों से फंसे लड़ाकू विमान पर ब्रिटिश उच्चायोग
सामान्यता’ की मानसिकता पर चोट जरूरी
शोधकर्ताओं का मानना है कि लोग बहुत तेजी से नए नॉर्मल को स्वीकार कर लेते हैं। यही जलवायु उदासीनता की जड़ है। इस अध्ययन में यह भी बताया गया कि जलवायु संचार में बाइनरी विजुअल्स जैसे हां/ना, हुआ/नहीं हुआ ज्यादा प्रभावी होते हैं। यही कारण है कि जलवायु संचार के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए यह शोध एक नया रास्ता दिखा सकता है।
ये भी पढ़ें: Odisha: अंतरजातीय विवाह के बाद महिला के परिवार का सामाजिक बहिष्कार, NHRC ने ओडिशा सरकार को भेजा नोटिस
धारणा बदलनी होगी भारत का उदाहरण
अध्ययन की प्रमुख लेखिका के अनुसार यह धारणा कि लोग तब जागेंगे जब हालात बद से बदतर होंगे, अब सही साबित नहीं हो रही। बहुत से बदलाव इतने छोटे होते हैं कि उन्हें देखा ही नहीं जाता और यही सबसे खतरनाक है। भारत जैसे देश जहां लाखों लोग जलवायु जोखिमों से सीधे प्रभावित हो रहे हैं, वहां यह अध्ययन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उत्तर भारत में सर्दियों की कम होती ठंड, पूर्वोत्तर में कम होती बर्फबारी या केरल में मानसून पैटर्न में गड़बड़ी,ऐसे स्थानीय अनुभवों को यदि सांस्कृतिक जुड़ाव के साथ प्रस्तुत किया जाए तो जलवायु के प्रति चेतना व्यापक जनसमूह तक पहुंच सकती है।
संबंधित वीडियो
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.