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अध्ययन: शोधकर्ताओं ने खोजा जलवायु चेतना का नया फॉर्मूला, आंकड़ों से नहीं अनुभवों से बदलेगी सोच

Thu, 26 Jun 2025 05:22 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Thu, 26 Jun 2025 05:22 AM IST
सार

शोधकर्ताओं ने पाया कि जब लोगों को दीर्घकालिक तापमान वृद्धि के चार्ट दिखाए गए तो उन्होंने अपेक्षाकृत हल्की प्रतिक्रिया दी। लेकिन जब उन्हें यही परिवर्तन इस रूप में दिखाया गया कि क्या झील अब भी हर साल जमती है या नहीं, तो उनकी चिंता अधिक तीव्र रही।  

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Researchers discovered new formula for climate consciousness now be tackled not by data but by experiences
जलवायु परिवर्तन (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ANI

विस्तार

जलवायु परिवर्तन का मुकाबला सिर्फ आंकड़ों से नहीं होगा बल्कि उन अनुभवों को समझाने से होगा जो लोगों की संस्कृति, भावनाओं और दिनचर्या से जुड़े हैं। तापमान के ग्राफों से ज्यादा जरूरी है यह बताना कि हम क्या-क्या खो रहे हैं। बर्फ की झीलें, आइस स्केटिंग, तैरने के तालाब, यहां तक कि ताजा हवा भी। प्रिंसटन और कैलिफोर्निया विवि के वैज्ञानिकों ने एक नए शोध में इसी मनोविज्ञान को उजागर किया है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर ह्यूमन बिहेवियर में प्रकाशित हुआ है।

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शोधकर्ताओं ने पाया कि जब लोगों को दीर्घकालिक तापमान वृद्धि के चार्ट दिखाए गए तो उन्होंने अपेक्षाकृत हल्की प्रतिक्रिया दी। लेकिन जब उन्हें यही परिवर्तन इस रूप में दिखाया गया कि क्या झील अब भी हर साल जमती है या नहीं, तो उनकी चिंता अधिक तीव्र रही।  
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सामान्यता’ की मानसिकता पर चोट जरूरी
शोधकर्ताओं का मानना है कि लोग बहुत तेजी से नए नॉर्मल को स्वीकार कर लेते हैं। यही जलवायु उदासीनता की जड़ है। इस अध्ययन में यह भी बताया गया कि जलवायु संचार में बाइनरी विजुअल्स जैसे हां/ना, हुआ/नहीं हुआ ज्यादा प्रभावी होते हैं। यही कारण है कि जलवायु संचार के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए यह शोध एक नया रास्ता दिखा सकता है।

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धारणा बदलनी होगी  भारत का उदाहरण
अध्ययन की प्रमुख लेखिका के अनुसार यह धारणा कि लोग तब जागेंगे जब हालात बद से बदतर होंगे, अब सही साबित नहीं हो रही। बहुत से बदलाव इतने छोटे होते हैं कि उन्हें देखा ही नहीं जाता और यही सबसे खतरनाक है। भारत जैसे देश जहां लाखों लोग जलवायु जोखिमों से सीधे प्रभावित हो रहे हैं, वहां यह अध्ययन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उत्तर भारत में सर्दियों की कम होती ठंड, पूर्वोत्तर में कम होती बर्फबारी या केरल में मानसून पैटर्न में गड़बड़ी,ऐसे स्थानीय अनुभवों को यदि सांस्कृतिक जुड़ाव के साथ प्रस्तुत किया जाए तो जलवायु के प्रति चेतना व्यापक जनसमूह तक पहुंच सकती है।

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