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गांधी स्मृति में महात्मा को याद करते हुए: उनके कदमों के अंतिम निशान, उनके अंतिम क्षण उकेरते हुए
Sat, 28 Sep 2019 08:44 PM IST
Trainee Trainee
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Trainee Trainee
Updated Sat, 28 Sep 2019 08:44 PM IST
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महात्मा गांधी(फाइल फोटो)
यह वह जगह है जहां नाथूराम गोडसे की गोलियां खा कर राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी ‘हे राम’ कहते हुए जमीन पर गिर पड़े थे और उन्होंने अंतिम सांसें ली थी और जहां प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र के दुख और व्यथा को ‘हमारी जिंदगी से रोशनी चली गई’ के अपने ऐतिहासिक शब्दों से स्वर दिया था।
तीस जनवरी के उस मनहूस सूर्यास्त के 71 साल बाद जब देश और उसके साथ सारी दुनिया गांधी का 150वां जन्मदिवस मना रही है, गांधी स्मृति अटल, अचल है और यहां गांधी अपनी संपूर्णता में जिंदा हैं।
तीस जनवरी मार्ग पर कुछ दूर चलें तो विशाल बिड़ला हाउस आता है जहां ‘बापू’ ने अपने अंतिम 144 दिन गुजारे थे। यहीं वह शहीद हुए थे। उनके शहादत के दिन पर ही इस सड़क को नाम ‘तीस जनवरी मार्ग’ रखा गया है।
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बारह साल का युवराज और उसका दोस्त शहीद स्तंभ पर लगी पट्टिका पर लिखे ‘हे राम’ पढ़ते हुए उसे समझने की कोशिश कर रहे थे। यह स्तंभ उस जगह बना है जहां गोडसे की गोलियां खा कर राष्ट्रपिता गिरे और अंतिम सांसें ली थी।
दो अक्तूबर को महात्मा गांधी के 150वें जन्म दिवस से पहले सैकड़ों की संख्या में स्कूली बच्चे गांधी स्मृति आए हुए थे। जब उनसे इस जगह के बारे में पूछा गया तो वे एक साथ बोलने लगे। युवराज ने कहा, गांधी जी यहां रहते थे। इस सड़क पर उनकी हत्या की गई। वह एक दिन में एक हजार खत लिखते थे।’’
सीमेंट से सुरक्षित किए गए बापू के अंतिम कदम उस जगह तक जाते हैं जहां गोडसे उनका इंतजार कर रहा था और उनपर गोलियां चलाने से पहले जहां उसने उनके चरण स्पर्श किए थे।
हत्या के तुरंत बाद डबडबाए आंखों से नेहरू ने बिड़ला हाऊस के गेट से राष्ट्र को इस विकराल त्रासदी की सूचना देते हुए कहा था, ‘हमारी जिंदगी से रोशनी चली गई और हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा है'
नेहरू के इस संबोधन को दुनिया के महानतम भाषणों में से एक माना जाता है।
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तीस जनवरी के उस मनहूस सूर्यास्त के 71 साल बाद जब देश और उसके साथ सारी दुनिया गांधी का 150वां जन्मदिवस मना रही है, गांधी स्मृति अटल, अचल है और यहां गांधी अपनी संपूर्णता में जिंदा हैं।
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तीस जनवरी मार्ग पर कुछ दूर चलें तो विशाल बिड़ला हाउस आता है जहां ‘बापू’ ने अपने अंतिम 144 दिन गुजारे थे। यहीं वह शहीद हुए थे। उनके शहादत के दिन पर ही इस सड़क को नाम ‘तीस जनवरी मार्ग’ रखा गया है।
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बारह साल का युवराज और उसका दोस्त शहीद स्तंभ पर लगी पट्टिका पर लिखे ‘हे राम’ पढ़ते हुए उसे समझने की कोशिश कर रहे थे। यह स्तंभ उस जगह बना है जहां गोडसे की गोलियां खा कर राष्ट्रपिता गिरे और अंतिम सांसें ली थी।
दो अक्तूबर को महात्मा गांधी के 150वें जन्म दिवस से पहले सैकड़ों की संख्या में स्कूली बच्चे गांधी स्मृति आए हुए थे। जब उनसे इस जगह के बारे में पूछा गया तो वे एक साथ बोलने लगे। युवराज ने कहा, गांधी जी यहां रहते थे। इस सड़क पर उनकी हत्या की गई। वह एक दिन में एक हजार खत लिखते थे।’’
सीमेंट से सुरक्षित किए गए बापू के अंतिम कदम उस जगह तक जाते हैं जहां गोडसे उनका इंतजार कर रहा था और उनपर गोलियां चलाने से पहले जहां उसने उनके चरण स्पर्श किए थे।
हत्या के तुरंत बाद डबडबाए आंखों से नेहरू ने बिड़ला हाऊस के गेट से राष्ट्र को इस विकराल त्रासदी की सूचना देते हुए कहा था, ‘हमारी जिंदगी से रोशनी चली गई और हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा है'
नेहरू के इस संबोधन को दुनिया के महानतम भाषणों में से एक माना जाता है।