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Rajasthan election: क्या 13 नवंबर के बाद राजस्थान में दिखेगा वसुंधरा राजे का असर?

Wed, 08 Nov 2023 08:59 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Wed, 08 Nov 2023 08:59 PM IST
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सार
Rajasthan election: अभी भाजपा की शीर्ष पंक्ति के नेता छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के चुनाव प्रचार अभियान में व्यस्त हैं। दीपावली के बाद सभी नेताओं के फोकस में राजस्थान रहेगा। छत्तीसगढ़ में पहले चरण का मतदान हो चुका है। 17 नवंबर को दूसरे चरण का मतदान होना है। इसलिए संघ और भाजपा के नेताओं ने दीपावली के बाद 13 नवंबर से जयपुर की तरफ कूच करने की योजना बनाई है...
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Rajasthan election: Will Vasundhara Raje impact be seen in Rajasthan after November 13?
Rajasthan election: Vasundhara Raje - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)

विस्तार

राजस्थान में वसुंधरा राजे पिछले पांच साल से भाजपा के फ्रंटफुट कैनवास से गायब थीं, लेकिन उनके करीबी कह रहे हैं कि 13 नवंबर के बाद वह फिर भाजपा के प्रमुख चेहरे के रूप में उभर सकती हैं। क्यों वसुंधरा राजे या तो भाजपा के लिए जरूरी हैं या फिर मजबूरी। हालांकि भाजपा के प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल को इस तरह के कोई आसार नहीं दिखाई देते। अमर उजाला से अग्रवाल साफ कहते हैं कि 2018 का चुनाव वसुंधरा के नेतृत्व में लड़ा गया था, हार मिली थी। फिर भाजपा लोकतांत्रिक पार्टी है और चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा उनका अधिकार बना रहना चाहिए। इसलिए राजस्थान में विधानसभा चुनाव देश के सबसे लोकप्रिय नेता प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे, उनके दृष्टिकोण और सरकार के कामकाज पर होगा।

अग्रवाल कहते हैं कि राजस्थान में भाजपा सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। चेहरा घोषित करके चुनाव लड़ने या न लड़ने के सवाल पर गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि जहां बिल्कुल स्पष्टता रहती है, वहां भाजपा मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करती है। जहां ऐसा नहीं है, वहां सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाता है। हालांकि अग्रवाल को भरोसा है कि राजस्थान में जबरदस्त बहुमत से भाजपा की सरकार बनेगी। अब आइए दीन दयाल उपाध्याय स्थित भाजपा मुख्यालय की तरफ चलते हैं।  

वसुंधरा राजे जरूरी हैं या मजबूरी?

भाजपा के केंद्रीय मुख्यालय में राजस्थान की राजनीति में रूचि और पकड़ रखने वाले तमाम नेताओं का मानना है कि राजस्थान में वसुंधरा राजे सबसे लोकप्रिय हैं। पिछले पांच साल में भाजपा ने कई नेताओं को विकल्प में खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन मुकाबले में दूसरे सभी चेहरे काफी निचले पायदान पर हैं। पूर्व भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया के कार्यकाल में वसुंधरा राजे को राजस्थान भाजपा में हाशिए पर रखा गया। उनके सचिवालय के सूत्र भी पिछले डेढ़ साल से लगातार यही शिकायत कर रहे हैं। राजस्थान में चुनाव की तारीख नजदीक आते देखकर वसुंधरा राजे ने जुलाई 2023 से अपने अभियान को बढ़ाया, लेकिन पार्टी के मंच और सार्वजनिक मंच से उन्हें हाशिए पर रखे जाने के ही संदेश बाहर आए। बताते हैं कि इस बीच भाजपा ने राजस्थान में विधानसभा चुनाव के बाबत एक गोपनीय सर्वे कराया। इस सर्वे में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के मुकाबले में केवल वसुंधरा राजे ही दमदार चेहरा हैं। लोकप्रियता में इस समय वसुंधरा गहलोत को पीछे छोड़ रही हैं। वसुंधरा की सरकार में मंत्री रहे एक नेता का कहना है कि राज्य में वसुंधरा का 35-40 सीटों पर काफी प्रभाव है। वह करीब 60 सीटों पर हार-जीत के समीकरण को प्रभावित कर सकती हैं। वैसे भी पिछले चुनाव में 38 सीटों पर भाजपा की हार तीन फीसदी से कम वोटों से हुई थी। जीते हुए विधायकों में 50 से अधिक विधायक वसुंधरा की ही जय जयकार करने वाले थे। यही कारण भी है कि वसुंधरा को राजस्थान में दरकिनार करना मुश्किल हो रहा है।

बीकानेर के एक भाजपा नेता कहते हैं कि विधानसभा चुनाव में पार्टी कांग्रेस पर भारी पड़ रही है, लेकिन अगर भाजपा का चेहरा वसुंधरा घोषित होतीं, तो यह अंतर काफी बड़ा होता। वह कहते हैं कि वैसे भी राजस्थान में सरकार बदलने का ट्रेंड रहा है। 2013 में वसुंधरा ने बड़े अंतर से कांग्रेस से सत्ता छीनी थी। 2018 में भाजपा से कांग्रेस बहुत कम अंतर से जीती थी। दोनों चुनावों के नतीजों का विश्लेषण करेंगे तो फर्क साफ नजर आएगा।

वसुंधरा ने भी खेल दिया है चुनावी दांव?

एक जनसभा में सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह की परफारमेंस से गदगद वसुंधरा ने कहा कि अब वह राजनीति से रिटायर हो सकती हैं। 03 नवंबर को वसुंधरा की यह एक लाइन सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। दिल्ली तक इसकी गूंज सुनाई दी। राजस्थान से आने वाले दो कैबिनेट मंत्रियों के सचिवालय में इसकी चर्चा हुई। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के दफ्तर के एक सदस्य ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। हालांकि राजस्थान भाजपा के एक बड़े नेता ने कहा कि वसुंधरा ने असलियत को स्वीकार कर लिया है। लेकिन माना जा रहा है कि इस वाक्य का मतलब भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह समेत कुछ नेता समझ रहे थे। खैर, वजह जो भी रही हो लेकिन अगले दिन वसुंधरा राजे ने इस बयान को लेकर चाय की प्याली में आ रहे तूफान को शांत कर दिया। उन्होंने 4 नवंबर को कहा कि वह कहीं नहीं जा रही हैं। वसुंधरा ने जनता को संदेश देते हुए साफ कहा कि नामांकन दाखिल करके आ रही हूं। मेरे राजनीति से संन्यास लेने की बात दिमाग में मत रखना। भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार, केंद्रीय गृहमंत्री और प्रधानमंत्री मोदी के बाद भाजपा तथा सरकार में हैसियत रखने वाले अमित शाह ने भी वसुंधरा राजे की 2013-2018 के समय की सरकार की उपलब्धियां गिनाई। वसुंधरा राजे की राजनीति को समझने वाले कहते हैं कि राजनीति में माहिर वसुंधरा भी खेल रही हैं।

भाजपा, वसुंधरा और 13 नवंबर के बाद का कनेक्शन क्या है?

अभी भाजपा की शीर्ष पंक्ति के नेता छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के चुनाव प्रचार अभियान में व्यस्त हैं। दीपावली के बाद सभी नेताओं के फोकस में राजस्थान रहेगा। छत्तीसगढ़ में पहले चरण का मतदान हो चुका है। 17 नवंबर को दूसरे चरण का मतदान होना है। इसलिए संघ और भाजपा के नेताओं ने दीपावली के बाद 13 नवंबर से जयपुर की तरफ कूच करने की योजना बनाई है। राजस्थान में 25 नवंबर को मतदान होना है। इसलिए राजस्थान में 10 दिनों तक जोरदार प्रचार अभियान चलने वाला है। ताकि 200 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा 120 से अधिक सीटें हासिल कर सके। अंदरखाने से इसके संकेत आ रहे हैं कि इस दौरान वसुंधरा राजे को महत्व देकर भाजपा के रणनीतिकार जीत के अंतर को बड़ा करने की पहल कर सकते हैं। वसुंधरा की चुनाव प्रचार की शैली और ठसक भरा अंदाज भी कुछ कह रहा है।

दबाव की राजनीति में माहिर हैं अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे

राजस्थान की राजनीति में ये दोनों नेता धुरंधर हैं। 2018 याद होगा। सचिन पायलट ने चुनाव प्रचार की जमीन तैयार करने में कड़ी मेहनत की थी। उनके पास कांग्रेस के नेता राहुल गांधी का भरोसा था, लेकिन मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत। अशोक गहलोत को पहले से स्थिति का पता था। लिहाजा चुनाव में प्रत्याशी खड़ा करने की उनकी कला, राजनीति के अनुभव और सबके बीच स्वीकार्यता ने बढ़त दे दी। इसी की बिना पर पांच साल का समय भी पूरा किया।

अशोक गहलोत का राजनीति करने का अपना तरीका है। वसुंधरा राजे का अपना। राजनीति करने की दक्षता और विधाओं में अपने अंदाज में वसुंधरा राजे कहीं भी कमजोर नहीं हैं। उन्हें पता है कि कब शांत रहना है, कब विरोध करना है, कब कराना है और कैसे पकड़ बनाए रखनी है? वह चार बार के चुनाव में भाजपा की मुख्यमंत्री पद का चेहरा रही हैं। अपने तमाम विरोधियों को धूल चटाई है। झुंझुनू के उनके धुर समर्थक नेता कहते हैं कि पांच साल से पार्टी ने भी वसुंधरा का साथ नहीं दिया, लेकिन पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने साथ दिया है। कहने का अर्थ यह कि अभी वसुंधरा चुकी नहीं हैं। राजनीति में हैं और राजनीति करेंगी।

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