राहुल गांधी की ताजपोशी: युद्ध के मैदान में राजतिलक के मायने
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आखिरकार कांग्रेस ने राहुल गांधी को अपना अध्यक्ष बनाने का फैसला कर लिया है। सबकुछ ठीक रहा तो चार दिसंबर को राहुल गांधी अपना नामांकन भरेंगे और नाम वापसी की आखिरी तारीख के बाद राहुल को कांग्रेस का सर्वसम्मति से निविर्रोध अध्यक्ष घोषित कर दिया जाएगा। सोमवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी के केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव का जो कार्यक्रम दिया उसे मंजूर कर लिया गया एक दिसंबर से और अध्यक्ष पद के लिए चुनाव की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है।
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राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस संगठन के शीर्ष स्तर से लेकर प्रदेश इकाईयों में भारी फेरबदल होगा और कई पुराने मठाधीश नेता मार्गदर्शक मंडल की शोभा बढ़ा सकते हैं। कांग्रेस के 88वें अध्यक्ष के रूप में राहुल के सामने चुनौतियों के पहाड़ और अपार संभावनाओं के द्वार दोनों हैं। उन्हें एक तरफ पार्टी के भीतर पुराने और बुजुर्ग नेताओं और युवा एवं उत्साही नेताओं के बीच संतुलन बनाना होगा तो कई मठ भी ध्वस्त करने होंगे।
संगठन के भीतर की चुनौतियों के साथ ही उन्हें देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति के चक्रव्यूह का भी मुकाबला करना होगा। उन्हें भाजपा की एकछत्र सत्ता के मुकाबले तमाम विपक्षी दलों को कांग्रेस के साथ एकजुट करके उनकी अगुआई भी करनी होगी, और 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले कनार्टक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को सफलता दिलानी होगी।
तब जाकर 2019 में कांग्रेस एनडीए विरोधी विपक्षी मोर्च का नेतृत्वऔर राहुल गांधी को अगले प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में पेश कर सकेगी। यह चुनौतियां आसान नहीं हैं,और अगर राहुल इनका सामना सफलता पूर्वक कर सके तो फिर देश की राजनीति में उनके लिए संभावनाओं के अपार द्वार खुल सकेंगे। वरना उन्हें अपने परिवार की विरासत को संभाले रखने में भारी मुशिकल आएगी जो मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के बाद उन्हें सौंपी जा रही है।इसलिए राहुल की असली परीक्षा अब शुरु होगी।
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पार्टी अध्यक्ष पद पर राहुल की यह ताजपोशी तब हो रही है जब वह गुजरात में अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं। यहां उनका मुकाबला सीधे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र समेत 18 राज्यों की सत्ता पर काबिज देश की सबसे बड़ी सदस्य संख्या वाले राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी से है। यानी बीच युद्द के मैदान में राहुल गांधी को पार्टी का सर्वेसर्वा बनाया जा रहा है।
गुजरात विधानसभा के चुनावों में हो चुकी है जंग शुरू
यूं तो गुजरात में कांग्रेस भाजपा के मुकाबले पिछले 22 सालों से अपनी सत्ता वापसी की जंग लड़ रही है और पिछले कई चुनावों (विधानसभा और लोकसभा) में राहुल कई बार अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करने के लिए मोदी और भाजपा के खिलाफ गुजरात आ चुके हैं। यह अलग बात है कि तब राहुल के पास केंद्र और कई बड़े राज्यों की सत्ता थी,संसाधन थे और नरेंद्र मोदी सिर्फ गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उनके जोड़ीदार अमित शाह को गुजरात से बाहर लोग बहुत ज्यादा नहीं जानते थे।
बावजूद इसके गुजरात में भाजपा और मोदी दोनों अजेय रहे। तब राहुल की मां सोनिया गांधी पार्टी अध्यक्ष थीं और पार्टी की जीत हार उनके सिर माथे होती थी। लेकिन अब इस बार जब गुजरात विधानसभा के चुनावों की जंग शुरू हो चुकी है और बतौर पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आगे बढ़कर मोदी शाह जोड़ी से सीधा मोर्चा ले रखा है। न सिर्फ वह लगातार गुजरात के दौरे कर रहे हैं, बल्कि उनकी इस चुनौती को भाजपा ने भी इस बार बेहद गंभीरता से लिया है और पिछले कुछ महीनों में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार गुजरात आकर जनसभाएं कर चुके हैं।
अमित शाह तो गुजरात में ही लगभग डेरा डाले हुए हैं। यही नहीं करीब 20 केंद्रीय मंत्री, 200 सांसद और भाजपा व संघ परिवार के कार्यकर्ताओं की विशाल फौज गुजरात के गली मोहल्लों गांवों कस्बों शहरों हाट बाजारों को मथ रही है। तब इतने सियासी घमासान के बीच कांग्रेस राहुल गांधी को अपना अध्यक्ष बनाने जा रही है। यानी साफ है राहुल की ताजपोशी गुजरात चुनाव से पहले ही होनी है और राहुल के सिर पर अभी तक ढाल बनकर बरकरार सोनिया गांधी का हाथ अब पीछे हो जाएगा और राहुल अब सेनापति की भूमिका से उठकर सीधे राजा की भूमिका में होंगे।
यानी सफलता और विफलता जो भी होगी वो राहुल की होगी। आमतौर पर हर हमले से राहुल को बचाती आ रही कांग्रेस आखिर यह जोखिम इस वक्त क्यों उठा रही है, यह एक बड़ा सवाल है।इसकी दो ही वजहें हो सकती हैं। पहली यह कि पिछले कुछ महीनों से राहुल गांधी की छवि में चमत्कारिक बदलाव आया है। लोकसभा चुनावों और उसके बाद लगातार कांग्रेस की हार ने न सिर्फ राहुल की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा बल्कि सोशल मीडिया पर राहुल को बच्चा पप्पू आदि विशेषणों से संबोधित करते हुए मजाक और चुटकुलों की बाढ़ आ गई। यहां तक कि कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता भी दबी जुबान से राहुल के व्यक्तित्व और नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाने लगते थे। पार्टी में यदा कदा प्रियंका गांधी को आगे लाने की मांग भी उठती रही। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इससे बिना विचलित हुए अपने बेटे राहुल गांधी के पीछे मजबूती से खड़ी रहीं।
लेकिन करीब दो महीने पहले राहुल गांधी के अमेरिका दौरे और बर्कले विश्वविद्यालय में छात्रों के साथ उनके संवाद से राहुल की भाषण शैली और छवि में बदलाव का दौर शुरु हुआ। फिर उनके चुटीले ट्वीट और सोशल मीडिया पर उनकी टीम की सक्रियता ने इसे और संवारा। अपने गुजरात दौरों में राहुल ने लगातार युवकों, व्यापारियों, लघु उद्यमियों, किसानों, महिलाओं, पिछड़ों, आदिवासियों, दलितों के साथ संवाद और संबोधन में नोटबंदी, जीएसटी, की विफलता, अर्थव्यवस्था की गिरती स्थिति, बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्या, व्यापार के संकट आदि को मुद्दा बनाकर जिस तरह भाजपा, राज्य सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरा है उसने गुजरात में कांग्रेस को मुकाबले में ला खड़ा किया।
भाजपा की माथे पर चिंता की लकीरें
यही नहीं गुजरात के तीन विद्रोही युवाओं पाटीदार युवा नेता हार्दिक पटेल, पिछडे वर्ग के नेता अल्पेश ठाकुर और दलित युवा नेता जिग्नेंश मेवानी का भरोसा जीतकर उनको कांग्रेस के साथ खड़ा करने में कामयाबी पाई है, उसने भी भाजपा की माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ाई हैं। अल्पेश को तो राहुल ने कांग्रेस में शामिल ही कर लिया। जीएसटी और नोटबंदी के खिलाफ अरसे से लामबंद सूरत के व्यापारियों के बीच नोटबंदी की बरसी मनाकर राहुल ने नई राजनीतिक परिपक्वता का परिचय भी दिया। राहुल ने एक तरफ तो गुजरात में अकेले ही भाजपा को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया तो दूसरी तरफ जय शाह, शोर्य डोवल, राफेल सौदे समेत हर अहम मुद्दे पर सोशल मीडिया के जरिए सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए खुद को उनके मुकाबले में खड़ा कर लिया।
राहुल के इस बदले औरआक्रामक अंदाज से उनके प्रति बन रहे सकारात्मक माहौल का फायदा उठाने के लिए ही कांग्रेस ने तय किया कि गुजरात चुनाव से पहले ही उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाकर पार्टी की कमान पूरी तरह सौंप दी जाए। आकलन यह है कि इससे गुजरात में काम कर रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल भी ऊंचा हो जाएगा क्योंकि सेहत की समस्या से जूझ रहीं सोनिया गांधी अब अध्यक्ष के रूप में चुनाव प्रचार का बोझ उठाने में उतनी समर्थ नहीं हैं जो कार्यकर्ताओं की अपेक्षा है। इसलिए युवा राहुल के अध्यक्ष बनते ही एक तरह यह कमी पूरी हो जाएगी तो दूसरी तरफ कांग्रेस को उम्मीद है कि कांग्रेस को इससे वोटों का फायदा भी हो सकता है। और अगर सबकुछ ठीक रहा और गुजरात में पार्टी वह करने में कामयाब हो गई जो वह पिछले 22 सालों में नहीं कर सकी है और जिसके बारे में अभी कांग्रेसी भी पूरे विश्वास से नहीं कह सकते हैं कि पार्टी गुजरात में भाजपा को हराकर सरकार बना लेगी, लेकिन अगर यह हो गया यह कांग्रेस सत्ता से दूर रहकर भी भाजपा के बिल्कुल करीब पहुंच गई तो यह पार्टी के ऩए अध्यक्ष राहुल गांधी की बहुत बड़ी सफलता होगी।
इसका पूरा सेहरा राहुल के सिर बंधेगा और पार्टी के भीतर बाहर उनका दबदबा और नेतृत्व दोनों कायम हो जाएगा। दूसरा आकलन यह भी है कि अगर गुजरात में कांग्रेस अपेक्षा के मुताबिक नतीजे नहीं ला पाई तो फिर राहुल की लोकप्रियता सवालों के घेरे में होगी और तब फिर उनका अध्यक्ष बनना खटाई में पड़ सकता है और सोनिया की खराब सेहत पार्टी में नेतृत्व संकट भी पैदा कर सकती है। इसलिए चुनाव से पहले ही राहुल को अध्यक्ष बनाकर नेतृत्व के यक्ष प्रश्न को समय पर ही हल कर लिया जाए।
एक सवाल हैं कि जब से सोनिया गांधी की सेहत बिगड़ी है तब से बतौर पार्टी उपाध्यक्ष सारे फैसले राहुल ही कर रहे हैं। इसलिए उनके अध्यक्ष बनने से कांग्रेस की सेहत और नियति पर क्या फर्क पड़ेगा। यह सही है कि इन दिनों कांग्रेस के करीब करीब सभी फैसले राहुल ही कर रहे हैं।लेकिन अपने हर फैसले पर उन्हें अब तक बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मंजूरी लेनी जरूरी होती थी जो उन्हें मिल भी जाती थी। लेकिन बावजूद इसके यह एक ऐसा कवच था जो सोनिया के वफादार पुराने नेताओं से जुड़े मामलों में फैसला लेने में राहुल की अड़चन था। अध्यक्ष बनने के बाद यह बाधा खत्म हो जाएगी और राहुल ज्यादा आजादी से फैसले ले सकेंगे।
अध्यक्ष बनने के बाद वह पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में अपने मनमाफिक टीम बनाएंगे, जो पार्टी की नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं और देश के युवाओं के विचारों और आकांक्षाओं के साथ सीधा संवाद कर सके। हालांकि राहुल पुराने नेताओं को पूरी तरह नजरंदाज नहीं करेंगे, वो उनके अनुभव का लाभ उठाएंगे, लेकिन मठाधीशी अब नहीं चल सकेगी।राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद कार्यकर्ताओं में ज्यादा जोश आने की भी उम्मीद है। जो लोग राहुल के स्वभाव और प्रकृति को जानते हैं, उनके मुताबिक राहुल कांग्रेस के प्रथम परिवार के वारिस होने के बावजूद अपने पिछले 14 सालों के राजनीतिक जीवन में उन्होंने खुद को सिर्फ वहीं तक सीमित रखा जो जिम्मेदारी उन्हें दी गई।
जब वह सिर्फ सांसद थे, तो सिर्फ अमेठी की समस्याओं और कामकाज से मतलब रखते थे। जब वह महासचिव बने और उन्हें युवक कांग्रेस और एनएसयूआई की जिम्मेदारी दी गई तो उन्होंने सिर्फ इन दोनों संगठनों के काम को ही देखा।जब उपाध्यक्ष बने तो उन्होंने अपनी भूमिका का विस्तार किया और पार्टी के सभी मामलों को देखना शुरु किया। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के बेटे होने के बावजूद उन्होंने कभी भी उपाध्यक्ष की अपनी सीमारेखा पार नहीं की। इसलिए अब जब वह अध्यक्ष बनेंगे तो वह पूरी तरह स्वतंत्र और निर्भीक फैसले करेंगे,ये अपेक्षा उनसे की जा सकती है। युद्ध के मैदान में राहुल की ताजपोशी न सिर्फ गुजरात में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मनोबल बढ़ाएगी, बल्कि देश भर के कांग्रेसी इससे उत्साहित होंगे।