Rajya Sabha: आप सांसद ने की राइट टू रिकॉल की मांग, बोले- काम न करने पर जनता को मिले जनप्रतिनिधि हटाने की ताकत
आप के सांसद राघव चड्डा ने राज्यसभा में राइट टू रिकॉल की मांग की है। कहा गया कि जैसे जनता के पास किसी जनप्रतिनिधि को चुनने का अधिकार होता है, वैसे ही उसे हटाने का भी अधिकार होना चाहिए।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आम आदमी पार्टी राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने आज सदन में 'राइट टू रिकॉल' (जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार) प्रणाली शुरू करने की मांग की। उनका कहना है कि अगर चुने हुए प्रतिनिधि काम नहीं करते हैं, तो वोटरों के पास उन्हें उनके पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने का अधिकार होना चाहिए।
शून्य काल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिकों को संसद सदस्य और विधानसभा सदस्य चुनने का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन अभी वोटरों के पास काम न करने या गलत व्यवहार के आधार पर उन्हें बीच में हटाने का कोई सीधा तरीका नहीं है।
उन्होंने कहा कि राइट टू रिकॉल की रूपरेखा लोगों को एक तय और कानूनी तौर पर तय प्रक्रिया से उन्हें हटाने का अधिकार देगी। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि भारत में पहले से ही राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और जजों के खिलाफ महाभियोग चलाने का प्रावधान है, और सरकारों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की इजाजत है।
विधायकों के लिए इस तरह का सिद्धांत लागू करने से उनकी जवाबदेही बढ़ेगी और लोकतंत्र मजबूत होगा। उन्होंने कहा चुने हुए प्रतिनिधियों के काम के मूल्यांकन के लिए पांच साल एक लंबा समय होता है और ऐसा कोई पेशा नहीं है जहां आप पांच साल तक बिना किसी नतीजे के खराब प्रदर्शन करें।
उन्होंने कहा कि दुनिया भर में, 20 से ज़्यादा लोकतंत्र में ऐसे नियम किए गए हैं। इसमें यूनाइटेड स्टेट्स और स्विट्जरलैंड शामिल हैं। आगे चड्ढा ने कहा अस्थिरता को रोकरने के लिए सुरक्षा उपाय भी होने चाहिए।
उन्होंने कहा कि वापस बुलाने का आधार गलत काम, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी या ड्यूटी की गंभीर लापरवाही तक सीमित होना चाहिए, न कि नियमित राजनीतिक असहमति तक। हटाने की प्रक्रिया तभी होनी चाहिए जब 50 प्रतिशत से ज्यादा वोटर औपचारिक वोट में वापस बुलाने का समर्थन करें। उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रणाली से राजनीतिक पार्टियों को मजबूत उम्मीदवार चुनने में मदद मिलेगी, जवाबदेही बढ़ेगी और भ्राष्टाचार कम होगा।