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भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल: आखिर क्यों गूंजा था 'करो या मरो', कैसे बदल गई आजादी की लड़ाई की दिशा?

Sat, 08 Aug 2026 05:45 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Sat, 08 Aug 2026 05:45 AM IST
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सार
भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे व्यापक और निर्णायक जनआंदोलन माना जाता है। गांधीजी के 'करो या मरो' के आह्वान ने देशभर में आजादी की नई चेतना जगाई। नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन पूरे देश में फैल गया और जनता ने स्वतःस्फूर्त तरीके से अंग्रेजी शासन का विरोध किया। इसे भारत की आजादी का रास्ता मजबूत करने वाले सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों में गिना जाता है। आइए इसके बारे में विस्तार से जानें
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Quit India Movement: Why Did Gandhi Call for 'Do or Die,' and How Did It Change India's Freedom Struggle?
भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

8 अगस्त 1942, मुंबई का ग्वालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) लोगों से खचाखच भरा हुआ था। मंच पर महात्मा गांधी मौजूद थे। देश के सामने सबसे बड़ा सवाल था क्या भारत अंग्रेजों के अधीन रहते हुए द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन का साथ देता रहेगा या अब अपनी आजादी के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ेगा?


इसी ऐतिहासिक बैठक में गांधीजी ने वह संदेश दिया, जिसने पूरे देश में नई ऊर्जा भर दी करो या मरो । यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ अंतिम जनसंघर्ष का आह्वान था। उसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया और ब्रिटिश सरकार से साफ शब्दों में कहा कि अब भारत पर उसका शासन समाप्त होना चाहिए। इसके साथ ही शुरू हुआ भारत छोड़ो आंदोलन, जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे व्यापक और निर्णायक जनआंदोलनों में से एक माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत क्यों हुई और इसने भारत की आजादी की लड़ाई की दिशा कैसे बदल दी? आइए जानते हैं...

भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल
भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

आखिर 1942 में ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस ने अंतिम लड़ाई का फैसला किया?

भारत छोड़ो आंदोलन अचानक शुरू नहीं हुआ था। इसके पीछे कई वर्षों की राजनीतिक घटनाएं और उस समय की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां थीं। सितंबर 1939 में जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, तब ब्रिटेन ने भारत से बिना किसी राजनीतिक सलाह-मशवरा किए उसे भी युद्ध का हिस्सा घोषित कर दिया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया। उसका कहना था कि जिस देश को खुद आजादी नहीं मिली, उससे लोकतंत्र की रक्षा के लिए युद्ध लड़ने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

उधर, दिसंबर 1941 में जापान ने पर्ल हार्बर पर हमला किया, जिसके बाद अमेरिका भी युद्ध में शामिल हो गया। इसके बाद जापानी सेना ने मलाया, सिंगापुर और बर्मा (अब म्यांमार) पर तेजी से कब्जा कर लिया। मार्च 1942 में रंगून के पतन के बाद युद्ध भारत की सीमाओं के बेहद करीब पहुंच गया। ब्रिटेन को एहसास हो गया कि भारतीयों का सहयोग लिए बिना भारत की रक्षा करना आसान नहीं होगा।

क्रिप्स मिशन क्या था और यह क्यों विफल हुआ?

युद्ध के दौरान भारतीय नेताओं का समर्थन हासिल करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1942 में सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। इसे क्रिप्स मिशन कहा जाता है। क्रिप्स ने कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी समेत कई नेताओं से मुलाकात की। ब्रिटेन ने प्रस्ताव दिया कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस दिया जाएगा और एक संविधान सभा गठित की जाएगी।

लेकिन भारतीय नेताओं ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनकी मुख्य मांग थी कि तत्काल एक राष्ट्रीय सरकार बनाई जाए, वास्तविक सत्ता भारतीयों को सौंपी जाए और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय भी भारतीयों के नियंत्रण में हों। ब्रिटिश सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई।

महात्मा गांधी ने इन प्रस्तावों की तुलना डूबते बैंक के पोस्ट-डेटेड चेक से की थी। उनका मानना था कि ब्रिटेन भारत को तत्काल स्वतंत्रता देने के लिए गंभीर नहीं है। क्रिप्स मिशन की विफलता ने कांग्रेस के भीतर यह विश्वास और मजबूत कर दिया कि अब अंग्रेज स्वेच्छा से सत्ता नहीं छोड़ेंगे और निर्णायक आंदोलन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।

भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल
भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

गांधीजी की सोच क्यों बदल रही थी?

1942 तक गांधीजी का मानना था कि ब्रिटिश सरकार अब भारत की सुरक्षा भी प्रभावी ढंग से नहीं कर सकती। जापानी सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी और ब्रिटेन लगातार पीछे हट रहा था। गांधीजी का तर्क था कि यदि अंग्रेज भारत छोड़ दें, तो भारतीय जनता स्वयं अपने देश की रक्षा कर सकती है।

अप्रैल 1942 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से पहले गांधीजी ने एक मसौदा भेजा। इसमें उन्होंने कहा कि ब्रिटेन भारत की रक्षा करने में सक्षम नहीं है और विदेशी सैनिकों को भारत छोड़ देना चाहिए। हालांकि कांग्रेस के भीतर इस पर मतभेद थे, इसलिए उस समय अपेक्षाकृत नरम प्रस्ताव स्वीकार किया गया। लेकिन जुलाई तक परिस्थितियां और गंभीर हो चुकी थीं।

कांग्रेस ने आंदोलन का फैसला कैसे किया?

5 जुलाई 1942 से वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक शुरू हुई, जो कई दिनों तक चली। यहां गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आजाद सहित कई नेताओं के बीच लंबी चर्चा हुई। जापान के खतरे और आंदोलन की रणनीति को लेकर अलग-अलग राय थी, लेकिन अंततः सहमति बन गई।

14 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रस्ताव पारित किया कि अब ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ देना चाहिए। साथ ही यह भी तय हुआ कि इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए अगस्त में मुंबई में होने वाली अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की बैठक में रखा जाएगा।

भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल
भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
8 अगस्त 1942: जब इतिहास बदल गया
7 और 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ऐतिहासिक बैठक हुई। जवाहरलाल नेहरू ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पेश किया और सरदार वल्लभभाई पटेल ने उसका समर्थन किया। प्रस्ताव भारी उत्साह और देशभक्ति के माहौल में पारित हो गया।

प्रस्ताव पारित होने के बाद महात्मा गांधी ने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि अब आजादी की लड़ाई अपने निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है। उन्होंने लोगों से करो या मरो का आह्वान किया। गांधीजी का संदेश था कि हर भारतीय अहिंसक तरीके से संघर्ष करे और तब तक लड़ाई जारी रखे, जब तक भारत स्वतंत्र न हो जाए।

अंग्रेजों ने आंदोलन शुरू होने से पहले ही कार्रवाई क्यों कर दी?

ब्रिटिश सरकार को अंदाजा था कि अगर यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया, तो उसे नियंत्रित करना बेहद कठिन होगा। इसलिए उसने आंदोलन शुरू होने का इंतजार नहीं किया। 9 अगस्त 1942 की सुबह महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद सहित लगभग पूरा शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व गिरफ्तार कर लिया गया। गांधीजी को पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद किया गया, जबकि नेहरू को अहमदनगर किले में कैद रखा गया।

ब्रिटिश सरकार को उम्मीद थी कि शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन अपने आप खत्म हो जाएगा। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। नेताओं की गिरफ्तारी की खबर आग की तरह पूरे देश में फैल गई और बिना किसी केंद्रीय नेतृत्व के भी लोग सड़कों पर उतर आए। यही वह क्षण था, जब भारत छोड़ो आंदोलन वास्तव में एक जनआंदोलन बन गया।

नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन कैसे फैला?

मुंबई, अहमदाबाद, दिल्ली, कोलकाता, बेंगलुरु समेत कई शहरों में हड़तालें शुरू हो गईं। स्कूल-कॉलेज बंद हो गए, बाजारों में कारोबार ठप पड़ गया और हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार किया गया और देखते ही देखते आंदोलन गांवों तक पहुंच गया। खासकर बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट्र और ओडिशा में इसका असर सबसे अधिक दिखाई दिया।

भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल
भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

आंदोलन का स्वरूप क्यों बदल गया?

महात्मा गांधी ने लोगों से पूरी तरह अहिंसक आंदोलन चलाने की अपील की थी। लेकिन लगभग पूरा शीर्ष नेतृत्व जेल में होने की वजह से कई जगह आंदोलन स्वतःस्फूर्त रूप से आगे बढ़ा और लोगों का गुस्सा हिंसक घटनाओं में भी बदल गया।

कई इलाकों में रेलवे लाइनें उखाड़ दी गईं, टेलीग्राफ और टेलीफोन की तारें काट दी गईं, डाकघरों, रेलवे स्टेशनों और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया गया। इन कार्रवाइयों का उद्देश्य अंग्रेजी प्रशासन की संचार व्यवस्था और शासन को बाधित करना था। हालांकि कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर कभी भी हिंसा का समर्थन नहीं किया। नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कई स्थानों पर यह घटनाएं स्वतःस्फूर्त रूप से हुईं।


अंग्रेजों ने आंदोलन को कैसे दबाया?

ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए अभूतपूर्व दमन का सहारा लिया। कई जगह सेना बुला ली गई। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज और गोलीबारी की। ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 9 अगस्त से 30 नवंबर 1942 के बीच 1,008 लोग मारे गए, 3,275 लोग गंभीर रूप से घायल हुए और एक लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। हालांकि कई इतिहासकारों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।

भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल
भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

समानांतर सरकारें कैसे बनीं?

भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे अनोखी घटनाओं में से एक थी समानांतर सरकारों का गठन। जब कई इलाकों में अंग्रेजी प्रशासन कमजोर पड़ने लगा, तब स्थानीय लोगों ने अपने स्तर पर प्रशासन संभालना शुरू कर दिया।
  • महाराष्ट्र के सातारा में 'प्रति सरकार' बनाई गई, जो सबसे लंबे समय तक सक्रिय रही।
  • बंगाल के तामलुक (मिदनापुर) में 'तम्रलिप्त राष्ट्रीय सरकार' का गठन हुआ।
  • उत्तर प्रदेश के बलिया में भी कुछ समय के लिए स्थानीय लोगों ने प्रशासन अपने हाथ में ले लिया।
इन समानांतर सरकारों ने न्याय व्यवस्था, राहत कार्य, जनसेवा और स्थानीय प्रशासन से जुड़े कई काम किए। इससे यह संदेश गया कि भारतीय केवल आजादी की मांग ही नहीं कर रहे थे, बल्कि शासन चलाने की क्षमता भी रखते थे।

भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल
भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

महिलाओं ने कैसे संभाली आंदोलन की कमान?

भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक महिलाओं की सक्रिय भागीदारी थी। जब अधिकांश पुरुष नेता जेल में थे, तब कई महिला स्वतंत्रता सेनानियों ने आंदोलन की कमान संभाली।

अरुणा आसफ अली: 9 अगस्त 1942 को ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का तिरंगा फहराकर अरुणा आसफ अली आंदोलन का प्रतीक बन गईं। अंग्रेजों ने उन्हें फरार घोषित कर उनकी संपत्ति जब्त कर ली, लेकिन उन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन जारी रखा।

उषा मेहता: नेताओं की गिरफ्तारी के बाद सही सूचना लोगों तक पहुंचाने के लिए उषा मेहता ने मुंबई से गुप्त कांग्रेस रेडियो शुरू किया। इस रेडियो के माध्यम से जेल में बंद नेताओं के संदेश और आंदोलन से जुड़ी खबरें पूरे देश में पहुंचाई जाती थीं। बाद में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और जेल भेज दिया।

सुचेता कृपलानी: सुचेता कृपलानी ने भूमिगत कार्यकर्ताओं के बीच संपर्क बनाए रखने और संदेश पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम किया। उन्होंने महिलाओं को संगठित करने और आंदोलन को जीवित रखने में बड़ी भूमिका निभाई।

मातंगिनी हाजरा: 73 वर्ष की मातंगिनी हाजरा ने पश्चिम बंगाल में हजारों लोगों के जुलूस का नेतृत्व किया। पुलिस की गोली लगने के बाद भी उन्होंने तिरंगा नहीं छोड़ा और शहीद हो गईं। आज उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे साहसी महिला सेनानियों में गिना जाता है।

क्या इसी आंदोलन ने भारत की आजादी का रास्ता खोला?

इतिहासकारों का मानना है कि भारत छोड़ो आंदोलन भारत की आजादी का अकेला कारण नहीं था, लेकिन यह स्वतंत्रता की दिशा में सबसे निर्णायक मोड़ों में से एक जरूर था। इसके बाद आजाद हिंद फौज (INA) के मुकदमे, 1946 का रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक कमजोरी और भारत में लगातार बढ़ता जनदबाव, इन सभी कारणों ने मिलकर ब्रिटिश सरकार को सत्ता हस्तांतरण के लिए मजबूर किया। इसी वजह से कई इतिहासकार भारत छोड़ो आंदोलन को ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की आखिरी कीलों में से एक मानते हैं।
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