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Politics: आखिर नीतीश कुमार को लेकर क्यों मचा है इतना कोहराम, एनडीए और सुशासन कुमार के लिए बिहार अहम क्यों?

Sun, 07 Jan 2024 09:33 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Sun, 07 Jan 2024 09:33 PM IST
सार

लगभग सभी का मानना है कि आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में सबसे ज्यादा फायदा राजद को होगा। उसकी लोकसभा में कोई सीट नहीं है। सब मिलकर लड़ेंगे तो लोकसभा में सीटें होंगी। जद(यू) की 2019 की 16 सीटें फिर से आएंगी या नहीं, कहना मुश्किल है। एनडीए की भी घटेंगी। इसे लेकर सब असमंजस में हैं।

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Politics: Why is there so much uproar regarding Nitish Kumar why is Bihar important for NDA JDU INDIA
नीतीश कुमार व पीएम मोदी। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

देश में भजपा और एनडीए को 2019 में जीती 39 सीटों की तुलना में 2024 में सबसे बड़ा झटका बिहार से लगने की संभावना है। भाजपा इस झटके की संभावना से उबरना चाहती है, जबकि 2024 और विधानसभा चुनाव 2025 में नीतीश कुमार तीसरे नंबर की पार्टी से एक बार फिर बिहार की राजनीति के क्षितिज पर छा जाना चाहते हैं। बिहार से जुड़े कई नेताओं का कहना है कि नीतीश कुमार की इसी महात्वाकांक्षा को लेकर सबसे बड़ा कोहराम मचा है, जबकि नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव में कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई देती। शांत, संयत और अपने उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।

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लगभग सभी का मानना है कि आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में सबसे ज्यादा फायदा राजद को होगा। उसकी लोकसभा में कोई सीट नहीं है। सब मिलकर लड़ेंगे तो लोकसभा में सीटें होंगी। जद(यू) की 2019 की 16 सीटें फिर से आएंगी या नहीं, कहना मुश्किल है। एनडीए की भी घटेंगी। इसे लेकर सब असमंजस में हैं।
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सबसे ज्यादा नुकसान नीतीश को हुआ, क्या अब एनडीए को होगा?
राजेश ठाकुर राजनीति शास्त्र  से पीएचडी हैं। उनका ध्यान बिहार की राजनीति पर है। एक बड़े राजनेता के लिए काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि अभी जो स्थिति है, उसमें एनडीए 2024 में 39 सीटें नहीं पा सकती। जद(यू) की कितनी आएंगी, वह बाद की बात है। नीतीश का मुख्य ध्यान राज्य की नंबर वन पार्टी बनने और अपनी गिरती छवि को निखारने पर है। 

2010 में जद(यू) राज्य की सबसे बड़ी पार्टी (22.58 प्रतिशत वोट,115 सीट) थी। 2020 के विधानसभा में 15.39 प्रतिशत वोट के साथ तीसरे नंबर की पार्टी हो गई। 75 सीट और 23.11 प्रतिशत वोट के साथ राजद सबसे बड़ी, जबकि 19.46 और 74 प्रतिशत वोट के साथ भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी। 

राजेश कहते हैं कि 2024 के प्रस्तावित लोकसभा चुनाव में सबसे अधिक फायदा राजद को होना है। 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने 39 सीटें जीती थी। इस बार यह संख्या मिल पाना मुश्किल है। सबसे अधिक नुकसान एनडीए को होने की उम्मीद है। राजेश की सामाजिक आधार पर गणना के मुताबिक यदि नीतीश इंडिया गठबंधन और खासकर महागठबंधन से छिटक जाएं तो भाजपा को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद बढ़ जाएगी। वह कहते हैं कि जितना नीतीश की छवि और उनकी पार्टी कमजोर होगी, उसका एक अनुपात में लाभ भाजपा और आरजेडी दोनों को होगा। इस स्थिति से नीतीश कुमार वाकिफ हैं। 

राजेश ठाकुर कहते हैं कि नीतीश का सूचना तंत्र काफी तेज है। वह हवा भांपने में भी माहिर हैं। यही कारण है कि बिना पूर्ण बहुमत पाए वह दूसरे दलों के सहारे करीब दो दशक से सत्ता में हैं। नीतीश को यह भी पता है कि वह जिस दिन मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतरेंगे, उस दिन के बाद से उनकी साख तेजी से गिरेगी। उनकी पार्टी भी टूट का शिकार होगी। इसलिए वह इसको लेकर काफी संजीदा हैं। इसलिए नीतीश के लिए केन्द्रीय सत्ता में भागीदारी की तुलना में बिहार में अपना और पार्टी का वर्चस्व अधिक महत्वपूर्ण है।
 
बयानबाजियों का दौर
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलने का अवसर भर चाहिए। गिरिराज सिंह भविष्यवाणी कर चुके हैं कि नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर कुछ दिन के ही मेहमान हैं। नीरज कुमार जद(यू) के बड़े नेता हैं। साफ कहते हैं कि नीतीश कुमार के खिलाफ साजिश हो रही है। नीरज कुमार सवाल पूछते हैं कि आखिर नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन का संयोजक बनाने का प्रश्न कहां से आया? हमने तो कोई ऐसा आवेदन नहीं किया था? 

उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार को संयोजक इसलिए बनाने की साजिश रची जा रही है ताकि वह प्रधानमंत्री का चेहरा न बन पाएं? नीतीश की ही पार्टी के नेता और मंत्री मदन साहनी भी नीतीश को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने की मांग कर रहे हैं। जद(यू) में नीतीश का कोई और खास है तो वह बिहार सरकार में मंत्री विजय चौधरी हैं। चौधरी के मुताबिक सीटों का बंटवारा हो जाना चाहिए। नाराजगी के मुख्य कारण में वह इसी का संकेत कर रहे हैं। 

चुनाव रणनीतिकार से नेता बनने की जद्दोजहद कर रहे प्रशांत किशोर भी यह कहने से बाज नहीं आते कि इंडिया गठबंधन में कोई नीतीश को भाव नहीं दे रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इंडिया गठबंधन में संयोजक पद पर नीतीश कुमार से जुड़े सवाल को लेकर कहा कि यह कौन बनेगा करोड़पति जैसा है। खरगे ने कहा कि अगले 10-15 दिन में इंडिया गठबंधन में सभी पदों पर नियुक्तियां कर ली जाएंगी। खरगे के बयान से अभी कहीं नहीं लग रहा है कि गठबंधन में किसी तरह का कोई खतरा है।

इन अफवाहों के आखिर क्या हैं मायने?
ललन सिंह ने अभी जद(यू) नहीं छोड़ी है। जद(यू) के अध्यक्ष मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बन गए हैं। इसी सप्ताह नीतीश और ललन सिंह का तालमेल तब देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री उन्हें (ललन) को बुधवार को उनके घर छोड़ने गए। जद(यू) के सूत्र कहते हैं कि दोनों में हर रोज बात होती है, लेकिन ललन सिंह और नीतीश कुमार को लेकर मीडिया में बहुत कुछ आया। यहां तक कि ललन सिंह 12 विधायकों के साथ जद(यू) तोड़ने की तैयारी कर रहे थे? 

दो बातें सही हैं। पहली यह कि ललन सिंह भाजपा के जद(यू) में मुखर आलोचक हैं। उनके कारण उपेन्द्र कुशवाहा ने नीतीश का साथ छोड़ा। आरसीपी भी अलग हुए। दूसरा ललन सिंह, नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के बीच में एक अलग केमिस्ट्री है। कुछ ऐसी ही केमिस्ट्री भाजपा के सुशील मोदी के साथ भी है। इस केमिस्ट्री को लेकर अफवाह और सच में फासला कभी कभी इतना कम हो जाता है कि लोग भ्रमित हो जाते हैं। इसकी भाजपा में एक सजा सुशील मोदी भी भुगत रहे हैं। वह नीतीश कुमार पर सबसे तीखा हमला बोल देते हैं, लेकिन उन्हें नीतीश कुमार से संपर्क रखने वाला भी माना जाता है।
  
दूसरी तरफ बिहार भाजपा बयान देने में माहिर कुछ नेता उस समय चुप्पी साधने में भरोसा करते हैं, जब नीतीश कुमार के एनडीए में फिर से शामिल होने की खबरें चलने लगती हैं। 2022 में राजद के साथ जाने के बाद इस तरह की खबरें कई बार उड़ चुकी हैं। हर बार इस तरह का ट्रेंड दिखाई दिया। लेकिन जैसे ही इस तरह की अफवाह ठंडी होती है, फिर बिहार सरकार और नीतीश कुमार को लेकर बयान तेज हो जाते हैं। 

वरिष्ठ पत्रकार संजय वर्मा के मुताबिक दरसल यहां भाजपा का मकसद एक भ्रम को बनाए रखना होता है। ताकि नीतीश कुमार की सुशासन बाबू वाली छवि कमजोर होती रहे। संजय के मुताबिक, भाजपा के रणनीतिकारों को पता है कि जब नीतीश कुमार को अपनी और पार्टी की छवि पर असर पड़ता दिखाई देता है तो वह परेशान होते हैं। राजद के कुछ नेता के व्यवहार इसमें आग में घी का काम कर देते हैं। 

दरअसल, नीतीश कुमार को एक कला आती है। शरद पवार के वाक्य का इस्तेमाल किया जाए तो वह राजनीति की रोटी नहीं जलने देते। समय पर पलट लेते हैं। कीर्ति आजाद के साथ काम कर चुके सूत्र का कहना है कि 2020 में नीतीश मात खा गए थे। अमित शाह ने बहुत बारीक राजनीति की। नीतीश कुमार की पार्टी विधान सभा में 43 सीट पर आ गई। इसके बाद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन 43 सीट का दर्द अभी भी नहीं भूल पा रहे हैं। उन्हें यही संख्या ठीक करनी है।  

नीतीश कुमार का मकसद क्या देश का प्रधानमंत्री बनना है?
एचडी देवगौड़ा या राजनीति में इंद्र कुमार गुजराल जैसा अवसर मिल जाए तो कहना मुश्किल है। हालांकि, यह आसान नहीं है। यह नीतीश कुमार भी जानते हैं कि 17-20 लोकसभा सीटों पर लड़कर और दहाई के नीचे लोकसभा सदस्यों की संख्या पर उनके लिए 543 सदस्यीय लोकसभा में प्रधानमंत्री बनना मुश्किल है। वह भी इंडिया जैसे गठबंधन की सरकार में। 


पश्चिम बंगाल में भाजपा के पदाधिकारी रहे सूत्र का कहना है कि नीतीश कुमार राजनीति की बारीकी को समझते हैं। वह दुबारा लालू प्रसाद के साथ गए। ममता बनर्जी के पास आए। ओडिशा के मुख्यमंत्री से बात की। विपक्ष की एकता की कवायद की। नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के नेता ललन सिंह ने कहा था कि वह भाजपा को देश भर में 100 लोकसभा सीटों पर नुकसान पहुंचाएंगे। इसलिए संयोजक या प्रमुख भूमिका में रहकर नीतीश कुमार केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह का राजनीतिक गुरूर जरूर तोड़ना चाहते होंगे, लेकिन नहीं लगता कि वह प्रधानमंत्री बनने के लिए सब कुछ कर रहे थे। 

पश्चिम बंगाल के भाजपा नेता का कहना है कि मल्लिकार्जुन खरगे का राजनीतिक अनुभव और कद कहीं से भी नीतीश कुमार, शरद पवार से कमतर नहीं है। वह दलित भी हैं। इस नेता का कहना है कि फिलहाल तो उन्हें विपक्ष की कोशिश सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हराने की है।

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