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कानों देखी: आजम खान के बहाने योगी सरकार पर क्यों निशाना साध रही हैं मायावती?

Thu, 12 May 2022 08:44 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Thu, 12 May 2022 08:44 PM IST
सार

विधानसभा चुनाव 2022 में बसपा का वोट प्रतिशत गिरने के बाद मायावती ने इसका ठीकरा भी मुसलमान नेताओं पर फोड़ दिया था। अब वह बारी-बारी से सबकुछ साध रही हैं...

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political gossips: Why is Mayawati targeting Yogi government on the pretext of Azam Khan
मायावती और आजम खां - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बसपा प्रमुख मायावती भी सपा के कद्दावर नेता आजम खां की हमदर्द बनकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार पर निशाना साध रही हैं। दरअसल मायावती का इरादा एक तीर से कई निशाने साधकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के जले पर नमक छिड़कना है। आजम खां उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यकों में पैठ रखते हैं। विधानसभा चुनाव 2022 में बसपा का वोट प्रतिशत गिरने के बाद मायावती ने इसका ठीकरा भी मुसलमान नेताओं पर फोड़ दिया था। अब वह बारी-बारी से सबकुछ साध रही हैं। मायावती ने विधानसभा चुनाव से पहले ही अपना दुश्मन नंबर-1 समाजवादी पार्टी को बता दिया था। चुनाव बाद भी इसी लाइन पर कायम हैं। इसके मूल में यह है कि 2024 में लोकसभा चुनाव होना है और उससे पहले राजनीति में काफी कुछ जमीनी काम भी बाकी है। हालांकि मायावती का यह राजनीतिक दर्शन बसपा के ही पुराने कॉडरों को कम रास आ रहा है।

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पीके ने नहीं छोड़ा है कांग्रेस का हाथ, बने रहेंगे राहुल के साथ

चुनाव प्रचार अभियान के रणनीतिकार से नेता बनने की महत्वाकांक्षा पाले प्रशांत किशोर (पीके) ने अभी भी कांग्रेस का हाथ नहीं छोड़ा है। वह परोक्ष रूप से कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ-साथ बने रहेंगे। हालांकि पीके और कांग्रेस के रिश्तों को करीब से जानने वालों का मानना है कि पिछले महीने से चले घटनाक्रम और उसके परिणाम से पीके को कुछ झटका सा लगा है। कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व महासचिव का कहना है कि राजनीति में अक्सर लोग खुद में डूबकर यथार्थ को नहीं पहचान पाते हैं। यहीं से ट्रेजडी की शुरुआत हो जाती है। पीके भी इसी का शिकार हो गए, लेकिन अगस्त-सितंबर 2022 के बाद एक बार फिर पीके और कांग्रेस के बीच में सक्रियता बढ़ती दिखाई दे सकती है।

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ओम प्रकाश राजभर परेशान क्यों हैं?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 तक दमदारी का 'दंभ' भरने वाले ओम प्रकाश राजभर कुछ परेशान से चल रहे हैं। चुनाव के बाद से उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दया शंकर सिंह समेत कुछ नेताओं से दो-तीन बार मिल चुके हैं। भाजपा और उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को जानने वाले बताते हैं कि ओम प्रकाश राजभर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोई भाव नहीं देते। संगठन मंत्री सुनील बंसल भी आजकल थोड़ा शांत चल रहे हैं। चर्चा तो यह भी है कि बंसल का प्रमोशन हो सकता है। वह दिल्ली बुलाए जा सकते हैं। उत्तर प्रदेश की सरकार और राजनीति में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी अपनी भूमिका को बहुत संतुलित किया है। वहीं छवि के मामले में बुलडोजर बाबा योगी आदित्यनाथ काफी आगे निकल चुके हैं। ऐसे में ओमप्रकाश राजभर की परेशानी को सहज समझा जा सकता है।

गहलोत के 'काला जादू' के आगे बेबस सचिन पायलट

राजस्थान के युवा नेता सचिन पायलट के पास कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का कई दौर का भरोसा है। वह इस भरोसे को लेकर कई बार राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से मिल चुके हैं। दोनों की सचिन पायलट के साथ सहानुभूति है, लेकिन निर्णय तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लेना है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के आगे बेबस हैं। सचिन पायलट चाहते थे कि उदयपुर चिंतन शिविर से पहले कुछ तय हो जाए। उनको लेकर भूमिका बननी शुरू हो। इसके लिए वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से कई बार मिले। सचिन ने यह भी बताया कि किस कदर राज्य की जनता मुख्यमंत्री गहलोत की सरकार से त्रस्त है। लेकिन इन सबके बावजूद सचिन पायलट कांग्रेस अध्यक्ष को अपने साथ खड़े होने वाले तीन दर्जन विधायकों का भी भरोसा नहीं दे पाए। कांग्रेसी पंडित इसी को अशोक गहलोत का 'काला जादू' कहते हैं। इसी जादू का असर है कि भाजपा गहलोत सरकार के आगे पस्त हैं। भाजपा ही नहीं कांग्रेस के बागी भी पस्त हैं। कहते तो यहां तक हैं कि भाजपा आलाकमान को भी गहलोत की यह अभेद्य बाजीगरी ने काफी परेशान और हैरान कर रखा है।

क्या पवार के किले में सेंध लगेगी?

भाजपा के चाणक्य, देश के गृह मंत्री अमित शाह राजनीतिक सेंध लगाने में माहिर हैं। मराठा सरदार शरद पवार के पास भी दो कलाएं हैं। पहली वह सेंध लगा लेते हैं और दूसरी लगने वाली सेंध से सुरक्षा भी कर लेते हैं। पवार के प्रिय अनिल देशमुख, नवाब मलिक के साथ शुरू हुए अध्याय ने सबको चौंकाया था। शरद पवार के भतीजे अजीत पवार की घेरेबंदी को देखकर राजनीति के पंडित काफी कुछ उम्मीद करके चल रहे थे, लेकिन बताते हैं कि अपनी कुशलता से शरद दादा ने काफी कुछ मैनेज कर लिया है। शिवसेना को अपने साथ खड़ा रखने में वह सफल हैं। कांग्रेस ने भी महाराष्ट्र में महाराष्ट्र विकास अघाड़ी को न छेड़ने का मन बनाया है। शिवसेना के एक सांसद तो यहां तक कहते हैं कि शरद पवार के जिस्म में भले ही बहुत जान न हो, लेकिन उनके राजनीतिक कौशल को समझने के लिए अभी दो-तीन बार जन्म लेना पड़ेगा।

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