ब्रिक्स में पीएम मोदी का एजेंडा: पाक को कड़ा संदेश और निवेश पर जोर
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गोवा में 15-16 अक्टूबर को आयोजित हो रहे ब्रिक्स सम्मेलन में भागीदारी करने के साथ-साथ पीएम मोदी भारत के सामरिक और आर्थिक मजबूती के लिए अलग-अलग देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात भी करेंगे। भारत की कोशिश है कि भले ही सम्मेलन के दौरान सभी सदस्य देश एक स्वर से सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ न बोलें, मगर अलग-अलग इसके खिलाफ बोल कर पाकिस्तान को कड़ा संदेश जरूर दें। यही कारण है कि रूस और पाकिस्तान के संयुक्त युद्घाभ्यास और सैन्य सहयोग पर भारत अपने राजदूत के माध्यम से मास्को में गहरी नाराजगी जता चुका है।
भारत इस क्रम में दूसरे सदस्य देशों ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के भी संपर्क में है। माना जा रहा है कि ये देश सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त बयान जारी करने पर राजी हैं। यह पीएम मोदी का कूटनीति का ही परिणाम माना जा रहा है। आपको बता दें कि 2011 में ब्रिक्स समूह का गठन हुआ था, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका शामिल हैं। इसका मकसद अपने आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव से पश्चिम के आधिपत्य को चुनौती देना है। देखा जाए तो भारत के अलावा अन्य सभी ब्रिक्स देश आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
यह सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत का अमेरिका और यूरोप की ओर हाथ बढ़ाने की कोशिश से ब्रिक्स का भविष्य अंधकार में नजर आ रहा था।
ब्रिक्स में सीमा पार आतंकवाद पर चर्चा कर सकते हैं पीएम मोदी
भारत की कोशिश इस मंच पर भी सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ ब्रिक्स के सदस्य देशों को एकजुट करने की है। हालांकि, समिट में भाग लेने से पहले ही चीन ने आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद के मुखिया मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने की भारत के प्रयास को झटका दिया है।
चीन के अलावा रूस व अन्य देश आतंकवाद पर भारत की हां में हां मिला रहे हैं। रूस ने तो भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक का भी समर्थन किया हुआ है और समय-समय पर पाकिस्तान को आतंकवाद पर फटकार भी लगाता रहता है। हालांकि, रूस की इस्लामाबाद से रक्षा मसलों को लेकर बढ़ती नजदीकियां भी भारत के लिए चुनौती से कम नहीं होंगी। समस्या बने चीन को साधने के लिए मोदी की कूटनीति की परीक्षा होगी।
ब्रिक्स से निवेश पाने की कोशिश में मोदी
ब्रिक्स देशों का कुल अनुमानित सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 160 खरब है। इस समूह ने वॉशिंगटन स्थित इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड और विश्व बैंक की टक्कर में अपना खुद का बैंक स्थापित किया है। साथ ही जी-7 की तर्ज पर यह अपना एक शिखर सम्मेलन भी आयोजित करता है।
इस लिहाज से यह देश व्यापार में एक दूसरे के बड़े सहयोगी हैं। दुनिया की लगभग 53 फीसदी आबादी वाले ब्रिक्स देश वैश्विक मांग में कमी और कमोडिटी के गिरते दाम की मार झेल रहे हैं। जिस चीन की अर्थव्यवस्था को दुनिया में सबसे चमकता सितारा माना जा रहा था दरअसल उसकी चमक फीकी पड़ी है।
रूस, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील की अर्थवयवस्था में भी कोई खास उछाल नहीं है, लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था इस समय दुनिया की सबसे उभरती अर्थव्यवस्था है। यहां तक कि विश्व बैंक ने भी भारत की अर्थव्यवस्था की तारीफ की है। ऐसे में पीएम मोदी की भारत में निवेश बढ़ाने की हर संभव कोशिश होगी।
ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना सिटी की झलक दिखाकर निवेश पाने की कोशिश की जाएगी। ब्रिक्स से निवेश पाने के लिए छह राज्य उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, गोवा, पंजाब और हरियाणा दिल्ली के प्रगति मैदान में अपने इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारियों को प्रदर्शित कर रहे हैं।
सीमा सुरक्षा व रक्षा सौदा
सीमा पार से लगातार बढ़ते आतंकवाद से परेशान भारत ने सितंबर 2018 तक सीमा सील करने का निर्णय लिया है। भारत के इस फैसले से न केवल पाकिस्तान बल्कि चीन भी नाराज है। फिलहाल भारत अपने फैसले पर अडिग है। सीमा सुरक्षा मजबूत करने में लगा भारत ब्रिक्स देशों से सहयोग की मांग कर सकता है।
वहीं, रक्षा सौदे की बात करें तो रूस इसमें सबसे आगे है। पुतिन 17वें भारत-रूस शिखर सम्मेलन व ब्रिक्स में शिरकत करने के लिए चार दिन की भारत यात्रा पर हैं। भारत-रूस के राजनयिक संबंधों के 70 वर्ष पूरो होने के उपलक्ष्य में कई अहम समझोते हो सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक भारत रूस के साथ एक अरब डॉलर के रक्षा सौदे पर मुहर लगा सकता है।
सौदे के तहत 5वीं जनरेशन के 200 कामोव 226टी हेलीकाप्टरों के भारत में निर्माण करने पर सहमति हो सकती है। इसके साथी ही म्यांमार की विदेश मंत्री आंग सान सू की भी भारत यात्रा पर हैं। विदेश मंत्री बनने के बाद से यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी।
गोवा में होने वाले ब्रिक्स-बिम्सटेक सम्मेलन में भाग लेने के अलावा वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी चर्चा करेंगी। दोनों नेताओं के बीच कारोबार बढ़ाने और भारत-म्यांमार सीमा पर उग्रवादी गतिविधियों के बारे में भी चर्चा होने की संभावना है।