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Pensioners: 'पेंशन' को लेकर ऐसा क्या था, जिससे टेंशन में आए करोड़ों पेंशनर, क्यों बुलानी पड़ी जेसीएम की बैठक

Mon, 31 Mar 2025 07:56 PM IST
राहुल कुमार डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: राहुल कुमार Updated Mon, 31 Mar 2025 07:56 PM IST
सार

'वित्त' विधेयक पेश होने के बाद केंद्रीय कर्मचारी संगठन/पेंशनर 'टेंशन' में आ गए। धीरे-धीरे इस विधेयक को लेकर विभिन्न राज्यों के सरकारी कर्मचारी और पेंशनर भी परेशान हो उठे। कर्मचारियों की राष्ट्रीय परिषद 'जेसीएम' की बैठक बुलानी पड़ी है।

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Pensioners: Crores of pensioners got tensed, JCM meeting had to be called
पेंशन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पिछले सप्ताह जब संसद में 'वित्त' विधेयक पेश किया गया तो एकाएक केंद्रीय कर्मचारी संगठन/पेंशनर 'टेंशन' में आ गए। धीरे-धीरे इस विधेयक को लेकर विभिन्न राज्यों के सरकारी कर्मचारी और पेंशनर भी परेशान हो उठे। कर्मचारियों की राष्ट्रीय परिषद 'जेसीएम' की बैठक बुलानी पड़ी। 29 मार्च को सचिव (पेंशन) को जेसीएम के सदस्यों के सामने अपना पक्ष रखना पड़ा। साथ ही उन्होंने यह भरोसा दिलाया कि इस बाबत जल्द ही स्पष्टीकरण जारी होगा। इससे पहले संसद में जब वित्त विधेयक को मंजूरी दी गई, तब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा था कि सत्यापन नियमों से मौजूदा पेंशन में कोई बदलाव नहीं होगा। दूसरी तरफ कर्मचारी नेताओं को अब भी यह यकीन नहीं हो पा रहा है कि इस सरकार उक्त वित्त विधेयक के जरिए खुद को ऐसी शक्ति से लैस कर लेगी, जिसके माध्यम से पेंशनरों के बीच में 'भेद' किया जा सकता है। केंद्र सरकार, ऐसा कोई भी कदम न उठाए, इसके लिए 'जेसीएम' के सदस्यों ने सचिव (पेंशन) से आग्रह किया है कि इस मांग को आठवें केंद्रीय वेतन आयोग की 'टर्म ऑफ रेफरेंस' में शामिल किया जाए। 
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स्टाफ साइड की तरफ से जेसीएम की बैठक में शिव गोपाल मिश्रा, गुमान सिंह, सी.श्रीकुमार, भौसले, शंकर राव और रूपक सरकार ने भाग लिया था। श्रीकुमार के मुताबिक, वित्त विधेयक को लेकर 'पेंशनरों' के मन में भय है, सरकार को उसे दूर करना चाहिए। इसके लिए नोटिफिकेशन जारी करे। आठवें केंद्रीय वेतन आयोग की घोषणा के बाद, सरकार को सीसीएस पेंशन नियमों में इन संशोधनों के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहिए था। वजह, सरकार को कार्यान्वयन की तिथि के बाद भूतपूर्व/मौजूदा पेंशनभोगियों और भावी पेंशनभोगियों के बीच समानता या असमानता तय करने और भूतपूर्व/मौजूदा पेंशनभोगियों के लिए भावी वेतन आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन की तिथि के बारे में निर्णय लेने का अधिकार मिल जाता है। यह अधिकार नहीं होना चाहिए।
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बतौर श्रीकुमार, यह पेंशनभोगियों के अधिकारों पर हमला है। वित्त विधेयक ने सरकार को सीसीएस पेंशन नियमों में हस्तक्षेप करने का अनियंत्रित अधिकार दिया है। यह कदम अन्यायपूर्ण, अनुचित और पूरी तरह से अमानवीय है। सरकार को अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े पेंशनभोगियों को परेशान करने के बजाय सीसीएस पेंशन नियमों में संशोधन करने का निर्णय वापस लेना चाहिए। वरिष्ठ नागरिकों को शांतिपूर्ण और तनाव मुक्त सेवानिवृत्त जीवन जीने की अनुमति देनी चाहिए। आठवें वेतन आयोग के बाद सेवानिवृत्त और वेतन आयोग से पहले सेवानिवृत्त लोगों के बीच पेंशन में समानता रहे।
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वित्तीय विधेयक में सेक्शन 149 को डाला गया है। इसके जरिए पेंशन नियमों के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केन्द्र सरकार को सामान्य सिद्धांत के रूप में पेंशनभोगियों के बीच अंतर स्थापित करने का अधिकार मिल जाएगा। केन्द्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए, तथा केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित ऐसे मानदंडों, सिद्धांतों और पद्धति के अधीन रहते हुए, पेंशनभोगियों के बीच अंतर किया जा सकता है या बनाए रखा जा सकता है, जो केन्द्रीय वेतन आयोगों की स्वीकृत सिफारिशों से उत्पन्न हो सकता है।

विशेष रूप से पेंशनभोगी की सेवानिवृत्ति की तारीख या केन्द्रीय वेतन आयोग की स्वीकृत सिफारिश के लागू होने की तारीख के आधार पर अंतर किया जा सकता है। केन्द्र सरकार समय-समय पर केन्द्रीय वेतन आयोगों की सिफारिशों को स्वीकार करने के संबंध में ऐसे मानदण्ड, सिद्धांत और पद्धति निर्धारित कर सकती है, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ पेंशनभोगियों के बीच अंतर भी शामिल है, जो ऐसी सिफारिश को स्वीकार करने से उत्पन्न हो सकता है। विशेष रूप से पेंशन दावे और देयताएं, आदि के संबंध में। किसी विशेष केन्द्रीय वेतन आयोग की स्वीकृत सिफारिशों के अनुसार पेंशन संशोधन के मानदंड, सिद्धांत और पद्धति, केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित तारीख से प्रभावी होंगे और ऐसी स्वीकृत सिफारिश का लाभ पहले की तारीख से प्रभावी नहीं होगा।

कर्मचारी नेताओं के अनुसार, पांचवें व छठे वेतन आयोग में पहले रिटायर होने और उनके लागू होने के बाद में रिटायर होने वालों के बीच भेदभाव था। उस वक्त सरकार ने भी यह बात स्वीकार की थी। तब कुछ नहीं किया गया। अब सरकार उसे वेलिडेट करने की बात कह रही है। 

कर्मचारी कहते हैं, अब वह मामला खत्म हो गया। सातवें वेतन आयोग ने पेंशनरों में कोई भेद नहीं किया। अब एकाएक, वेलिडेट करने की क्या जरुरत आ गई। इस विधेयक के जरिए सरकार के पास ऐसी शक्ति होगी कि वह पेंशनरों के बीच में अंतर कर सकती है। अंतर करने का आधार डेट ऑफ रिटायरमेंट हो सकता है। यानी सरकार यह तय कर सकती है कि वेतन आयोग का लाभ किस प्रकार के पेंशनरों को दिया जाए (जैसे केवल एक निश्चित तिथि के बाद रिटायर होने वाले लोगों के लिए)। सरकार, भावी वेतन आयोग की सिफारिश स्वीकार करने के दौरान उक्त आधार का इस्तेमाल कर सकती है। जेसीएम के सदस्यों का कहना है कि अगर सरकार का मन साफ है तो पेंशन 'सचिव' ने जो बोला है, उसे नोटिफिकेशन के जरिए बताए। दो पेंशनरों के बीच अंतर नहीं हो सकता, क्योंकि यह अनुच्छेद 14 में 'समानता के अधिकार' के तहत प्रतिबंधित है।

अनुच्छेद 14, जो कि एक मूल अधिकार है, कहता है कि कोई भी समान रूप से स्थित व्यक्तियों के समूह में भेदभाव नहीं कर सकता। सभी पेंशनर एक ही श्रेणी में आते हैं, और वह है 'पेंशनर'। उनमें किसी को ज्यादा वरियता या कम वरियता देना, भेदभाव की श्रेणी में आता है। यह अनुच्छेद 14 के तहत पूरी तरह प्रतिबंधित है। एआईडीईएफ के महासचिव और जेसीएम के सदस्य सी. श्रीकुमार के मुताबिक, वेतन आयोग की कार्यान्वयन तिथि से पहले सेवानिवृत्त होने वाले पेंशनभोगियों और वेतन आयोग की कार्यान्वयन तिथि के बाद सेवानिवृत्त होने वाले पेंशनभोगियों के बीच, समानता केंद्र सरकार के पेंशनभोगियों की एक लंबित मांग है। 

एक कर्मचारी या अधिकारी, जिसने किसी विशेष पद पर 8 साल तक सेवा की और वह वेतन आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन की तिथि से पहले सेवानिवृत्त हो गया और उसी पद पर 8 साल सेवा करने वाले किसी अन्य कर्मचारी या अधिकारी के बीच पेंशन में कोई असमानता नहीं होनी चाहिए। अन्यथा वरिष्ठ व्यक्ति को उसी पद के कनिष्ठ व्यक्ति से कम पेंशन मिलेगी। इस तरह की असमानता को सर्वोच्च न्यायालय ने इस आधार पर खारिज कर दिया था कि ऐसी असमानता संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का स्पष्ट उल्लंघन होगी। इस पृष्ठभूमि में सरकार ने वित्त विधेयक के माध्यम से जो किया है, वह अवांछित और अनुचित था।

संसद ने जब वित्त विधेयक को मंजूरी दी, तब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, सत्यापन नियमों से मौजूदा पेंशन में कोई बदलाव नहीं होगा।  एक जनवरी 2016 से पहले और बाद में रिटायर हुए सभी सरकारी पेंशनर्स को समान पेंशन मिल रही है। नए नियमों के तहत किसी भी पेंशनर की मौजूदा पेंशन राशि में कोई बदलाव नहीं किया गया है। रक्षा पेंशनर्स पर भी इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि उनके लिए अलग नियम लागू होते हैं। वित्त मंत्री ने बताया कि 6वें वेतन आयोग ने 1 जनवरी 2006 से पहले और बाद में रिटायर हुए कर्मचारियों के पेंशन में फर्क रखा था। तब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। 


कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने गत सप्ताह यह दावा किया था कि वित्त विधेयक, 2025 में संशोधन के माध्यम से पेंशनभोगियों के बीच अंतर करने के सरकार के प्रयास के पीछे एक 'छिपा हुआ एजेंडा' है। वेणुगोपाल ने कहा कि वे इन 'छिपे हुए एजेंडों' को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के ध्यान में लाना चाहते हैं। उन्होंने सरकार से वित्त विधेयक में प्रस्तावित संशोधन के पीछे अंतर्निहित उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिए कहा, जिसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार के पास सामान्य सिद्धांत के रूप में पेंशनभोगियों के बीच अंतर स्थापित करने का अधिकार होगा। उन्होंने कहा कि इस निर्णय के दूरगामी निहितार्थ स्पष्ट स्पष्टीकरण की मांग करते हैं, खासकर इसलिए क्योंकि इसे वित्त विधेयक में शामिल करने के बजाय एक अलग संशोधन के रूप में पेश किया गया है। यह गोल-मोल दृष्टिकोण क्यों है। सरकार को विस्तृत स्पष्टीकरण देना चाहिए।
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