Simla Agreement: क्या है शिमला समझौता जिसे पाकिस्तान ने किया रद्द, कैसे, कब और कहां हुआ? जानें सबकुछ
पाकिस्तान द्वारा शिमला समझौता रद्द करने के एलान के बाद यह एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। इसे 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक निर्णायक युद्ध के बाद शांति बहाल करने के लिए दोनों देश ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
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भारत की ओर से लिए गए इन कड़े फैसलों के बाद पाकिस्तान ने गुरुवार को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक की। जिसमें पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि रोकने के भारत के फैसले को युद्ध जैसा कृत्य बताया है। इसके साथ ही पाकिस्तान ने शिमला समझौते समेत द्विपक्षीय समझौते स्थगति करने की भी बात कही है। पहलगाम हमले के बाद दोनों देशों के बीच जारी तनाव के चलते एक बार फिर शिमला समझौता चर्चा में है।
1971 में भारत-पाक युद्ध के बाद उनके 90 हजार से ज्यादा सैनिकों को युद्ध बंदी बनाया गया था। इसके बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार, पाक युद्ध बंदियों को छुड़ाने की कवायद शुरू हुई। फिर दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध के लिए 2 जुलाई 1972 को शिमला में एक समझौता हुआ।
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- दोनों देशों ने 17 सितंबर 1971 को युद्ध विराम के रूप में मान्यता दी। तय हुआ कि इस समझौते के 20 दिनों के अंदर दोनों देशों की सेनाएं अपनी-अपनी सीमा में चली जाएंगी।
- यह भी तय हुआ कि दोनों देशों/सरकारों के अध्यक्ष भविष्य में भी मिलते रहेंगे। संबंध सामान्य बनाए रखने के दोनों देशों के अधिकारी बातचीत करते रहेंगे।
- दोनों देश सभी विवादों और समस्याओं के शांतिपूर्ण समाधान के लिए सीधी बातचीत करेंगे। तीसरे पक्ष द्वारा कोई मध्यस्थता नहीं की जाएगी।
- यातायात की सुविधाएं स्थापित की जाएंगी। ताकि दोनों देशों के लोग आसानी से आ-जा सकें।
- जहां तक संभव होगा, व्यापार और आर्थिक सहयोग फिर से स्थापित किए जाएंगे।
- अगर दोनों देशों के बीच किसी समस्या का अंतिम निपटारा नहीं हो पाता है और मामला लंबित रहता है, तो दोनों पक्ष में से कोई भी स्थिति में बदलाव करने की एकतरफा कोशिश नहीं करेगा।
- दोनों पक्ष ऐसे कृत्यों के लिए सहायता, प्रोत्साहन या सहयोग नहीं करेंगे जो शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने में हानिकारक हैं।
- दोनों देश एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करेंगे। समानता एवं आपसी लाभ के आधार पर एक-दूसरे के आंतरिक मामले में दखल नहीं देंगे।
- दोनों सरकारें अपने अधिकार के अंदर ऐसे उग्र प्रॉपेगेंडा को रोकने के लिए हर संभव कदम उठाएंगी जिनके निशाने पर दोनों में से कोई देश हों। दोनों देश इस तरह की सूचनाएं आपस में साझा करने को प्रोत्साहन देंगे।
- संचार के लिए डाक, टेलीग्राफ सेवा, समुद्र, सीमा डाक समेत सतही संचार माध्यमों, उड़ान समेत हवाई लिंक बहाल करेंगे।
- शांति की स्थापना, युद्धबंदियों और शहरी बंदियों की अदला-बदला के सवाल, जम्मू-कश्मीर के अंतिम निपटारे और राजनयिक संबंधों को सामान्य करने की संभावनाओं पर काम करने के लिए दोनों पक्षों के प्रतिनिधि मिलते रहेंगे और आपस में चर्चा करेंगे।
- दोनों देशों के बीच सहमति बनी कि जहां तक संभव होगा आर्थिक और अन्य सहमति वाले क्षेत्रों में व्यापार और सहयोग बढ़ेगा।
- विज्ञान और संस्कृति के मैदान में आदान-प्रदान को बढ़ावा देने की सहमति बनी।
दो जुलाई 1972 को हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में बार्नेस कोर्ट में हुई बैठक में दोनों देश समझौते पर सहमत हुए थे। इस समझौते पर भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए थे। इसीलिए इसे शिमला समझौता कहा जाता है। बार्नेस कोर्ट वर्तमान में राजभवन है। राजभवन में आज भी शिमला समझौते की निशानियां मौजूद हैं। इस समझौते में दोनों देशों ने शांतिपूर्ण तरीकों और बातचीत के जरिए अपने मतभेदों का समाधान करने की प्रतिबद्धता जताई थी।
1972 में हुए शिमला समझौते में दोनों देशों ने बातचीत के जरिए समस्याओं को हल करने पर सहमति जताई थी, लेकिन पाकिस्तान ने 1999 में शिमला समझौते का उल्लंघन किया था, जब पाकिस्तानी सैनिक जम्मू और कश्मीर के भारतीय क्षेत्र में घुस गए थे। इसके बाद भारत ने पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ने के लिए ऑपरेशन शुरू किया था, इसे कारगिल युद्ध के तौर पर जाना जाता है।
शिमला समझौते का प्रभाव और इसकी सीमाएं
शिमला समझौता अपने आप में एक महत्वपूर्ण पहल था, जिसका उद्देश्य भारत और पाकिस्तान के बीच स्थायी शांति स्थापित करना था। बावजूद इसके, समय के साथ दोनों देशों के संबंधों में गिरावट आती रही। 1980 के दशक में सियाचिन ग्लेशियर को लेकर हुआ टकराव, 1999 का कारगिल युद्ध, और कश्मीर को लेकर लगातार जारी तनाव इस गिरावट के प्रमुख उदाहरण हैं। वर्ष 1984 में भारत ने "ऑपरेशन मेघदूत" के अंतर्गत सियाचिन क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया, जिसे पाकिस्तान ने शिमला समझौते का उल्लंघन माना, क्योंकि उस क्षेत्र की सीमा रेखा समझौते में स्पष्ट रूप से अंकित नहीं थी।