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नोटबंदी के फैसले की श्रेणी में न गिन लिया जाए बिना तैयारी के लॉकडाउन का निर्णय?

Sun, 24 May 2020 10:10 PM IST
गौरव पाण्डेय शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: गौरव पाण्डेय Updated Sun, 24 May 2020 10:10 PM IST
सार

  • केंद्र की भाजपा सरकार के रणनीतिकारों के मुंह पर तालाबंदी
  • डॉ. हर्षवर्धन और डॉ. विनोद के पॉल, सब दे रहे हैं सफाई
  • महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी उठा दिया सवाल
  • सबसे पहले सोनिया गांधी ने तालाबंदी पर उठाया था सवाल

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Opposition parties are saying that Lockdown in India failed but Central Government is calling it successful
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई

विस्तार

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार द्वारा तालाबंदी (लॉकडाउन) का निर्णय जल्दबाजी में लिए जाने का आरोप लगाते हुए सवाल उठाया था। सोनिया ने पहले लॉकडाउन के बाद मार्च के आखिरी सप्ताह में ही उठा दिया था। अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी सोनिया गांधी जैसा आरोप केंद्र पर लगाया है। 

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दिलचस्प यह है कि उद्धव ठाकरे का यह आरोप पिछले दिनों में कई बार केंद्र सरकार प्रवक्ताओं द्वारा लॉकडाउन को सफल बताने के बाद आया है। अमर उजाला ने भी केंद्र सरकार के रणनीतिकारों में बन रहे भ्रम को लेकर 11 मई को ही लॉकडाउन पर सवाल उठने की आशंका जाहिर की थी।

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'नोटबंदी जैसा ही है 25 मार्च का लॉकडाउन का निर्णय'

कांग्रेस पार्टी के एक बड़े नेता हैं। राज्यसभा सदस्य हैं। उन्हें अभी लॉकडाउन पर मुंह खोलना अच्छा नहीं लग रहा है, लेकिन समय आने पर सरकार से पूछेंगे। वह कहते हैं कि कोविड-19 संक्रमण के बाबत लॉकडाउन का निर्णय 2016 में बिना तैयारी के लिए गए नोटबंदी के निर्णय जैसा है। उद्धव ठाकरे ने सवाल उठा दिया है।

एक और राज्य के मुख्यमंत्री जल्द ही सवाल उठाने वाले हैं। उनका मानना है कि लॉकडाउन तो जरूरी था, लेकिन इसे तैयारी के साथ लागू किया जाना था। केंद्र ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का एलान किया और 25 मार्च को अचानक सब बंद। बताते हैं कि इसकी सबसे बड़ी मार मिडल क्लास और गरीब क्लास पर ही पड़ी है। 

मैक्स, वैशाली के डॉ. अश्विन चौबे भी मानते हैं कि सरकार ने तालाबंदी करने में लापरवाही की। वह तो कहते हैं कि यह तालाबंदी फरवरी के दूसरे सप्ताह में ही होनी चाहिए थी। देश में, खासकर शहरों में जगह-जगह हाथ धोने के लिए साबुन की व्यस्था, कार्यालयों में सैनिटाइजेशन आदि अपनाया जाना चाहिए था। 

केरल सरकार का मॉडल अपनाना चाहिए था। फरवरी के पहले सप्ताह में ही अंतरराष्ट्रीय उड़ान सेवा रोक देनी चाहिए थी। बताते हैं केरल ने यही किया था। जनवरी में उसके पास कोई मरीज नहीं था, तभी राज्य सरकार ने सावधानी बरतनी शुरू कर दी थी। इसके तीन दिन बाद वहां कोविड-19 का पहला मरीज आया था।

सरकार के रणनीतिकारों के मुंह पर तालाबंदी

नीति आयोग के सदस्य विनोद के पॉल अभी इस विषय में कुछ नहीं बोलना चाहते। आईसीएमआर की एडवाइजरी बॉडी में शामिल प्रो. वी रामगोपाल राव कहते हैं कि बीमारी नई है। स्वास्थ्य आपातकाल स्थिति पैदा होने पर हड़बड़ी में ऐसा हो जाता है। नीति आयोग, स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्र भी इस बारे में चुप ही हैं। 

वहीं, एम्स के एक वरिष्ठ चिकित्सक का कहना है कि उन्हें कई कदमों में खामी दिखाई दे रही है, लेकिन यह समय आलोचना का नहीं है। दिल्ली के एक बड़े सरकारी मेडिकल कालेज के विभागाध्यक्ष का कहना है कि केंद्र सरकार कोविड-19 संक्रमण का सामना करने जा रही है, लड़ने का जनता को संकल्प बता रही है। 

वह सवाल उठाते हैं कि इसके बावजूद 15 अप्रैल के बाद तक सरकारी अस्पताल के डॉक्टर, नर्स, पैरा स्टाफ पीपीई किट आदि की तंगी रही। यह कैसी तैयारी थी? उनका कहना है कि आज भी वेंटिलेटर की भारी कमी है। अस्पताल से ज्यादा लोग घरों में क्वारंटीन हैं। बचे तो भाग्य और चले गए तो सरकार उन्हें पहले ही भावभीनी श्रद्धांजलि दे चुकी है।

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व्यावहारिक स्थिति ने कर दिया सरकार को मजबूर

गरीब प्रवासी मजदूर, रिक्शा, ठेला चलाने वाले, कामगार समेत अन्य एक छोटे से कमरे में आठ से दस की संख्या में रहते हैं। महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख, शिवसेना के सांसद विनायक राऊत के अनुसार मुंबई की कई चालों में दिन में भी रोशनी नहीं आती। वहां छोटे-छोटे कमरों (खोली) में शिफ्टवाइज लोग रहते थे। 

इनके लिए लॉकडाउन बिताना, खर्चा, खाना-पीना पूरा कर पाना काफी मुश्किल हो गया था। दिल्ली सरकार के एक बड़े अफसर ने माना कि काम धंधा बंद होने से मजदूर, कामगार कोविड-19 से ज्यादा अपने भविष्य को लेकर डर गए। राज्य सरकारें संसाधन का रोना रोती रही और केंद्र सरकार अपनी चाल चलती रही। 

यही वजह है कि मजदूर पैदल घर के लिए निकल पड़ा। मजदूर जाने लगा तो एमएसएमई और उद्योगों को अपना भविष्य सताने लगा। यहां से सरकार के स्तर पर प्रबंधन की खामी साफ दिखाई देने लगी। वहीं राज्य और केन्द्र सरकार के बीच में तालमेल की कमी ने इस समस्या को और बढ़ा दिया। 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छात्रों और मजदूरों को लाने की पहल और अन्य राज्यों द्वारा उसके अनुसरण ने कोविड-19 को गंभीर रूप दे दिया है। 

केंद्र सरकार के एक सचिव स्तर के अधिकारी के अनुसार स्पेशल श्रमिक ट्रेन चलाने में देरी, कुप्रबंधन, राज्यों द्वारा मांग किए जाने के निर्णय, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करा पाने में असफलता ने बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। अब तो कोविड-19 के पॉजिटिव गांव, ब्लॉक, तहसील में मिलने लगे हैं।

क्या थी सरकार की योजना?

विभिन्न रणनीतिकारों से बातचीत के आधार पर जो तथ्य निकलकर आया, चौंकाने वाला है। बताते हैं कोविड-19 से मुकाबले के लिए सरकार के अभियान में तेजी मार्च के तीसरे सप्ताह से आनी शुरू हुई। 25 मार्च को पहला लॉकडाउन लागू होने के बाद वेंटिलेटर, पीपीई किट, एन-95 मास्क, क्वारंटीन सेंटर, कोविड केयर सेंटर, कोविड डेडिकेटेड हास्पिटल, कोविड-19 संक्रमण की जांच आदि की गाइड लाइन अंतिम रूप ले पाई। 

केंद्र सरकार के रणनीतिकारों को लग रहा था कि 15 अप्रैल से रैपिड टेस्टिंग किट आदि मिल जाएगी, तमाम संसाधन आ जाएंगे और लॉकडाउन में सरकार इलाज की प्रकिया शुरू कर देगी। सूत्र बताते हैं कि इसी आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोविड-19 को हराने की प्रतिबद्धता बार-बार दोहरा रहे थे। लेकिन इस योजना को पलीता लग चुका है। चीन से आई रैपिड टेस्ट किट के फेल होने के बाद सरकार की योजना को काफी बड़ा झटका लगा। 

मजदूरों के पलायन, राज्यों द्वारा लॉकडाउन का पालन करा पाने में कमजोरी ने मर्ज का दायरा काफी बड़ा कर दिया है और केंद्र सरकार के रणनीतिकार कहते हैं कि सरकार कोविड-19 के संक्रमण के बाबत हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।

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