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रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती के बाद भी ईएमआई में पर्याप्त राहत नहीं

Fri, 07 Oct 2016 12:12 AM IST
शिशिर चौरसिया/अमर उजाला, नई दिल्ली
शिशिर चौरसिया/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 07 Oct 2016 12:12 AM IST
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No relief after The Reserve Bank cut interest rates
आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा बीते मंगलवार को नीतिगत दरों में 25 आधार अंकों की कटौती के बावजूद लोन लेने वाले ग्राहकों के ईएमआई में कोई खास कमी नहीं आई है। दरअसल, वाणिज्यिक बैंक कोष जुटाने की औसत लागत के आधार पर ब्याज दरें तय करने की प्रणाली (एमसीएलआर) का हवाला दे कर लोन पर ब्याज दर कम करने से बच रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि अधिकतर बैंकों के फंसे कर्ज (एनपीए) की मात्रा इस समय इतनी अधिक है कि वे चाह कर भी ग्राहकों को ज्यादा राहत नहीं दे पा रहे हैं।

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रिजर्व बैंक के नए गवर्नर उर्जित पटेल ने बीते मंगलवार को अपनी पहली नीतिगत दरों की घोषणा की जिसमें मुख्य दरों में 0.25 फीसदी की कटौती की गई। इस कटौती के बाद रेपो रेट 6.5 फीसदी से घटकर 6.25 फीसदी हो  गया है। इसका मतलब ये है कि अब बैंकों को आरबीआई से सस्ता कर्ज मिल सकेगा और  उम्मीद की जा सकती है कि वो उसका फायदा ग्राहकों तक भी पहुंचाएंगे। 
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लेकिन इसके बाद जिन बैंकों ने अपने नए एमसीएलआर की घोषणा की, उनकी औसत कटौती पांच आधार अंकों की ही थी। अभी तक पंजाब एंड सिंध बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक आफ इंडिया, सिंडिकेट बैंक, आइसीआईसीआई बैंक आदि ने नई एमसीएलआर की घोषणा कर दी है।

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आरबीआई की ही सख्ती पड़ रही है भारी

No relief after The Reserve Bank cut interest rates

एक अन्य सरकारी बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि एमसीएलआर प्रणाली में कोष जुटाने की लागत के आधार पर लोन की ब्याज दर तय की जाती है। इसलिए बैंक जमाओं पर ब्याज दर में जितनी कटौती करेंगे, उतनी या उससे थोड़ी कम राहत ही लोन पर वसूली जाने वाली ब्याज दर में दे पाएंगे। ऐसा इसलिए, क्योंकि बैंक चलाने का खर्च भी तो इसी कारोबार से निकालना है।

एक सरकारी बैंक के अवकाश प्राप्त चेयरमैन व प्रबंध निदेशक (सीएमडी) का कहना है कि एनपीए और सब-स्टैंडर्ड लोन को सामने लाने का रिजर्व बैंक का फॉर्मूला और सख्ती ग्राहकों पर भारी पड़ रही है। इस नियम का पालन करने के बाद बैंकों के एनपीए की राशि बढ़ रही है और उन्हें इसके लिए बड़ी राशि का प्रावधान करना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति बनने से बैंक कर्ज की ब्याज दरों में पर्याप्त कमी नहीं कर पा रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष जनवरी के बाद से करीब डेढ़ साल के दौरान रिजर्व बैंक ने प्रमुख उधारी दर यानी रेपो रेट में 1.5 फीसदी की कटौती की थी। लेकिन बैंक औसतन 0.56 फीसदी की ही राहत ग्राहकों को दे पाए थे। इसके बाद अभी फिर से मुख्य नीतिगत दरों में चौथाई फीसदी की कटौती की गई है, लेकिन बैंक अपने एमसीएलआर में औसतन 0.05 फीसदी की ही कटौती कर रहे हैं। इस तरह की आरबीआई की मुख्य दरों में जहां 1.75 फीसदी कटौती हुई है, वहीं वाणिज्यिक बैंकों की दरों में महज 0.61 फीसदी ही कटौती हुई है।

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