एनआरसी के मौजूदा स्वरूप से कोई भी खुश नहीं, न मांग करने वाले न विपक्ष, भाजपा भी नहीं
- हिंदू बाहुल्य जिलों से अधिक और मुस्लिम बाहुल्य सीमांत जिलों से कम लोग हटाए गए: भाजपा
- असम गण परिषद और अखिल असम छात्र संघ ने की थी एनआरसी की मांग, पर खुश नहीं
- कांग्रेस ने इस सूची से बाहर रह गए लोगों के दावों का दोबारा परीक्षण करने की अपील की है
विस्तार
असम में नेशनल सिटीजनशिप रजिस्टर (एनआरसी) के अंतिम स्वरूप से 19 लाख लोगों के बाहर होने से कोई भी खुश नहीं है। ना असम गण परिषद (अगप) और ना ही अखिल असम छात्र संघ (आसू) जिन्होंने इसकी मांग की थी और ना ही भाजपा, जिसने इसका समर्थन किया। यही नहीं कांग्रेस भी इससे खुश नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एनआरसी तैयार की गई जिसमें 3.11 करोड़ लोगों को असम का वैध नागरिक माना गया जबकि 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया। अगप और आसू का मानना है कि इस सूची से ऐसे ढेर सारे लोग छूट गए हैं जो 1971 के बाद भारत आए। असम गौरव के मुद्दे पर राजनीति करने वाले इन संगठनों का मानना है कि असम में सिर्फ असमिया को ही रहना चाहिए जबकि आज वहां गैर-असमियों का बोलबाला है।
कांग्रेस का मानना है कि बहुत सारे भारतीय नागरिकों के नाम भी सूची से बाहर रह गए हैं। इनमें काफी लोग ऐसे हैं जो उत्तर प्रदेश और बिहार से दशकों पहले असम के चाय बागानों में काम करने आए थे लेकिन उनके पास पूरे कागजात नहीं होने के कारण उन्हें भारत का नागरिक नहीं माना जा रहा है। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने सूची से बाहर रह गए लोगों के दावों का दोबारा परीक्षण करने की अपील की है।
हिंदुओं के हटने से भाजपा दुखी
भाजपा इस सूची से ढेर सारे हिंदुओं के बाहर होने पर दुखी है। असम सरकार के वरिष्ठ मंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट को सीमांत जिलों के इस सूची में शामिल लोगों में से कम से कम 20 प्रतिशत लोगों का और अन्य जिलों के 10 प्रतिशत लोगों का पुनरीक्षण कराए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मांग को खारिज कर चुका है लेकिन भाजपा एक बार फिर अपील करने जा रही है।
घबरायें नहीं अभी और वक्त मिलेगा : राम माधव
उत्तर पूर्व भारत के लिए भाजपा के महासचिव राम माधव ने भी लोगों से न घबराने की अपील की है। उन्होंने कहा, सूची से बाहर हुए लोगों के पास चार माह का समय है। वे ट्रिब्यूनल और उसके बाद कोर्ट में उचित दस्तावेज पेश कर अपनी नागरिकता साबित कर सकते हैं।
नहीं बन पाया नागरिकता कानून
भाजपा का मानना है कि यदि कुछ हिंदू इस सूची से बाहर रह भी जाते हैं तो उन्हें नागरिकता कानून के तहत देश का नागरिक मान लिया जाएगा। लेकिन समस्या यह है कि अभी यह कानून बन ही नहीं पाया है। लोकसभा से सिटीजनशिप विधेयक आठ जनवरी को पारित हो गया था। लेकिन राज्यसभा से पारित न होने के कारण यह कानून में नहीं बदल पाया।
नई लोकसभा के गठन के बाद सरकार को इसे दोनों सदनों से दोबारा पारित कराना होगा। इस कानून के तहत पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यक हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, सिख जैसे धर्म के लोगों को वहां परेशान किया जाता है इसलिए यदि वे भारत में प्रवेश कर यहां की नागरिकता लेना चाहते हैं तो उन्हें इस कानून के तहत भारत का नागरिक माना जाएगा।