स्थानीय लोगों ने 'लाल आतंक' से बनाई दूरी तो दूसरे राज्यों के युवाओं को बरगला रहे नक्सली
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लाल आतंक पर एक तरफ सुरक्षा बलों का शिकंजा कसता जा रहा है तो दूसरी ओर स्थानीय लोग नक्सलियों से दूरी बनाने लगे हैं। नतीजा, नक्सल प्रभावित क्षेत्र में लाल आतंक को आगे बढ़ाने के लिए युवा नहीं मिल रहे हैं। नक्सलियों के सामने नई भर्ती का संकट खड़ा हो गया है।
झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में पहले से मौजूद नक्सली समूह अपने नेटवर्क का विस्तार नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में अब नक्सलियों ने दूसरे राज्यों में अपने पांव पसारने शुरू कर दिए हैं। वे आसपास के राज्यों में युवाओं को बरगला कर उन्हें लाल आतंक का हिस्सा बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
बता दें कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, केरल, मध्यप्रदेश, उड़ीसा और तेलंगाना में नक्सलियों ने स्थानीय लोगों के बल पर ही अपने पैर जमाए थे। अगर कोई ग्रामीण नक्सलियों की बात नहीं मानता तो उसे प्रताड़ित किया जाता। यहां तक कि कई बार इनकी बात न मानने वालों को जान से भी हाथ धोना पड़ता था।
स्थानीय लोगों को रहती थी नक्सलियों के प्लान की जानकारी
सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला कब होगा या आमने-सामने की लड़ाई का कोई प्लान है, यह सब जानकारी स्थानीय लोगों को होती थी। वे इस जानकारी को सुरक्षा बलों के साथ साझा नहीं करते थे। नतीजा, सुरक्षा बलों को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ता था। खासतौर से, आईईडी (इंप्रोवाइस्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) कहां लगाई गई है, सुरक्षा बलों के पास यह सूचना न होने के कारण उन्हें जान-माल की भारी चोट लगती थी।
नक्सली जहां भी आईईडी लगाते, इस बाबत गांव के कुछ लोगों को बता देते थे कि फलां जगह पर आज अपने पशु न ले जाएं। कई बार तो वह रास्ता ही बंद कर दिया जाता था, जहां आईईडी दबाई जताई थी। ग्रामीणों को यह सब जानकारी होने के बावजूद वे उसे सुरक्षा बलों के साथ साझा नहीं करते थे।
इसी तरह से कई नक्सली इलाके जैसे, छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र, यहां 'गौंडी' भाषा बोली जाती है। इसके बलबूते पर नक्सली सुरक्षा बलों पर भारी पड़ रहे थे। वजह, सुरक्षा बलों में पांच फीसदी स्टाफ भी ऐसा नहीं है, जो 'गौंडी' को समझता हो। नतीजा, सुरक्षा बलों को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ता था।
सुरक्षा बलों के सिविक एक्शन प्रोग्राम ने बदली स्थिति
नक्सल प्रभावित करीब 90 जिलों में कुछ इलाकों में सिविक एक्शन प्रोग्राम शुरू किया गया है। इसके तहत केंद्र से विशेष सहायता दी जाती है, जैसे 2018-19 में आंधप्रदेश के 1 जिले में 25 करोड़, बिहार के चार जिलों को 110 करोड़, छत्तीसगढ़ के आठ जिलों को 200 करोड़, झारखंड के 13 जिलों को 340 करोड़, महाराष्ट्र के एक जिले को 25 करोड़, उड़ीसा के दो जिलों को 50 करोड़ और तेलंगाना के एक जिले को 25 करोड़ रुपये की मदद दी गई है।
कुल मिलाकर नक्सल प्रभावित 30 जिलों में 775 करोड़ रुपये के सिविक एक्शन कार्यक्रम शुरू हो चुके हैं। इस राशि से स्कूल बनवाना, सड़कों की मरम्मत, पीने के पानी की व्यवस्था करना, स्वास्थ्य सेवाएं और दूसरी तरह से ग्रामीणों को मदद पहुंचाना शामिल है। जब ये कार्यक्रम शुरू हुए तो अर्धसैनिक बलों ने इसमें अपना खास योगदान दिया। वे ग्रामीणों के मित्र बन गए। नतीजा, लोगों ने नक्सलियों की बात न मानकर सुरक्षा बलों का साथ देना शुरु कर दिया।
हालांकि इसका खामियाजा ग्रामीणों को भुगतना पड़ा है। पिछले साल आईईडी विस्फोट या घात लगाकर हमलों में सौ से ज्यादा पशु और साठ से अधिक लोग मारे गए। स्थिति को भांपकर नक्सलियों ने भी अब ग्रामीणों को आईईडी लगाने की जानकारी देना बंद कर दिया है। इससे लोगों के पशु मारे जा रहे हैं और जान का नुकसान भी उठाना पड़ रहा है।
'लाल आतंक' की विंग खड़ी करने के लिए कर रहे दूसरे राज्यों का रुख
सीआरपीएफ के डीआईजी इंटेलीजेंस एम दिनाकरण का कहना है कि अर्धसैनिक बलों के सिविक एक्शन प्रोग्राम ने ग्रामीणों में एक विश्वास पैदा कर दिया है। वे स्थिति को समझ रहे हैं कि नक्सलवाद लंबा नहीं चलेगा। उन्हें नए साथी नहीं मिल पा रहे हैं। स्थानीय ग्रामीण अब नक्सलियों से दूर होते जा रहे हैं।
यही वजह है कि अब नक्सली दूसरे राज्यों का रुख करने लगे हैं। वे युवाओं को बरगला कर अपने समूह में शामिल करने का प्रयास करते हैं। हालांकि अभी उन्हें इस मुहिम में खास सफलता नहीं मिल पा रही है। सुरक्षा बलों के अलावा लोकल पुलिस भी इस पर नजर रखे है।