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नासा का अध्ययन: चार दशक में खोई एक लाख करोड़ मीट्रिक टन बर्फ, ग्रीनलैंड में अनुमान से 21 फीसदी अधिक बर्फ पिघली

Wed, 24 Jan 2024 06:26 AM IST
यशोधन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: यशोधन शर्मा Updated Wed, 24 Jan 2024 06:26 AM IST
सार

अध्ययन के अनुसार, ग्रीनलैंड के ग्लेशियरों का बनना बिगड़ना एक प्राकृतिक चक्र से जुड़ा है जो लंबे समय से चला आ रहा है। आमतौर पर ग्लेशियर सर्दियों में बढ़ते हैं और फिर गर्मियों में बर्फ के पिघलने से सिकुड़ जाते हैं, जिससे संतुलन बना रहता है।

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NASA study One trillion metric tons ice lost four decades 21 percent more ice melted Greenland than estimated
नासा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ग्रीनलैंड चार दशकों में अनुमान से 21 फीसदी ज्यादा बर्फ खो चुका है। नासा की जेट प्रोपल्शन प्रयोगशाला से जुड़े शोधकर्ताओं के मुताबिक, 1985 से 2022 के बीच यहां 1 लाख 14 हजार करोड़ मीट्रिक टन बर्फ में कमी आई है। अध्ययन के अनुसार, ग्रीनलैंड के ग्लेशियरों का बनना बिगड़ना एक प्राकृतिक चक्र से जुड़ा है जो लंबे समय से चला आ रहा है। आमतौर पर ग्लेशियर सर्दियों में बढ़ते हैं और फिर गर्मियों में बर्फ के पिघलने से सिकुड़ जाते हैं, जिससे संतुलन बना रहता है। हालांकि, नए अध्ययन से पता चलता है कि 21वीं सदी में इस बर्फ का पिघलना और ग्लेशियरों का पीछे हटना इसके बढ़ने की तुलना में कहीं ज्यादा तेज हो गया है, जिससे यह संतुलन बिगड़ रहा है।

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समुद्री धाराओं पर पड़ सकता है असर
उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि ग्रीनलैंड में मौजूद ज्यादातर ग्लेशियर बहुत पीछे हट गए हैं और हिमखंड तेजी से समुद्र में गिर रहे हैं। हालांकि, बर्फ को हुए इस अतिरिक्त नुकसान से सीधे तौर पर समुद्र के बढ़ते जल स्तर पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है, लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह भविष्य में समुद्री धाराओं को प्रभावित कर सकता है।
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207 में से 179 ग्लेशियर पीछे हटे, अध्ययन में शामिल 207 में से 179 ग्लेशियर 1985 के बाद से काफी पीछे हट गए हैं। 27 स्थिर हैं और एक ग्लेशियर थोड़ा आगे बढ़ गया है। अध्ययन के अनुसार, जो ग्लेशियर पूरे सीजन में सबसे बड़ा बदलाव दर्शाते हैं वे सबसे अधिक पिघलते हैं।

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