क्यों नासा के लिए चिंता बना भारतीय एंटी-सैटेलाइट परीक्षण का मलबा, क्या वाकई है यह खतरनाक
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पिछले हफ्ते भारत के पहले एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण के बाद, जब अमेरिका समेत दुनिया की अन्य सरकारों ने बहुत सीमित तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराई, सोमवार को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के प्रमुख ने पहली बड़ी अंतरराष्ट्रीय आलोचना की। नासा प्रमुख जिम ब्रिडेनस्टाइन ने कहा कि परीक्षण से पैदा हुए मलबे ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के लिए जोखिम बढ़ा दिया है। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि यह जोखिम तुलनात्मक रूप से छोटा और कम समय के लिए है, उन्होंने कहा कि यह देशों के लिए "भयानक, भयानक बात" है जो अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के करीब "ऐसे काम करते हैं जिससे मलबा पैदा होता है।"
तो असल में नासा दुखी क्यों है?
27 मार्च को भारत ने जमीन से मिसाइल दागकर पृथ्वी की निचली कक्षा में 300 किलोमीटर की रेंज पर मौजूद एक सैटेलाइट को मार गिराने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया था। जिसके बाद भारत ऐसी क्षमता वाला चौथा देश बन गया। परीक्षण में इस्तेमाल किया गया उपग्रह भारत का था और परीक्षण के बाद इसके हजारों टुकड़े हो गए थे।
सोमवार को ब्रिडेनस्टाइन ने कहा कि नासा ने मलबे से कम से कम 400 टुकड़ों की पहचान की है और 60 को ट्रैक कर रहा था जो आकार में 10 सेमी से बड़े थे। उन्होंने कहा कि इन 60 में से 24 टुकड़े आईएसएस के नजदीक पहुंच गए थे, जिससे टकराव का संभावित खतरा पैदा हो गया।
आईएसएस अंतरिक्ष में दुनिया की एकमात्र स्थायी प्रयोगशाला है। यह बहुत विशाल है, एक फुटबॉल मैदान की तुलना में थोड़ी बड़ी ही है, और इसका वजन 400 टन से ज्यादा है। आईएसएस पृथ्वी की सतह से करीब 400 किलोमीटर ऊपर स्थित है और इसका बुनियादी ढांचा बेहद महंगा है।
आईएसएस में एक समय में तीन से चार अंतरिक्ष यात्री इसकी सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह अंतरिक्ष में कई तरह के वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए एक अनोखा स्थान है, खासतौर पर जिनमें शून्य-गुरुत्वाकर्षण की स्थितियों की जरूरत होती है। यह नई अंतरिक्ष प्रणालियों और प्रौद्योगिकियों के परीक्षण के लिए भी विशेष स्थान है।
छोटे टुकड़े क्या खतरा पैदा कर सकते हैं?
इतने बड़े पैमाने के बुनियादी ढांचे के लिए छोटे टुकड़े क्या खतरा पैदा कर सकते हैं?
टुकड़ों का आकार और वजन दीगर बात है। महत्वपूर्ण यह है कि ये टुकड़े बहुत तेज गति से चलते हैं। पृथ्वी की निचली कक्षा में जहां भारतीय उपग्रह पर परीक्षण किया गया, वहां वस्तुएं अपनी कक्षाओं में रहने के लिए आमतौर पर लगभग 8 मीटर प्रति सेकंड या 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैं।
इतनी रफ्तार में करीब 100 ग्राम की एक छोटी वस्तु भी टकराने पर उतना ही प्रभाव पैदा करेगी जितना कि लगभग 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाला 30 किलो का पत्थर टकराने पर करता है। नष्ट किए गए भारतीय उपग्रह से निकलने वाला मलबा आमतौर पर इतनी ही रफ्तार से आगे बढ़ेगा। अगर इसे नष्ट नहीं किया गया तो, अंतरिक्ष में किसी भी अन्य उपग्रह से टकराने पर वह उस उपग्रह को बेकार बना सकता है।
लेकिन अंतरिक्ष में पहले से मौजूद मलबे को देखते हुए, क्या आईएसएस को वैसा भी खतरा नहीं है?
इस मामले के लिए आईएसएस या किसी भी अन्य उपग्रह को अंतरिक्ष के मलबे से लगातार खतरा है। अंतरिक्ष मलबे या इन टुकड़ों के आगे बढ़ते के रास्ते के आधार पर इस तरह का जोखिम बढ़ता है या घटता है। नासा की विशिष्ट एजेंसियां सभी महत्वपूर्ण बड़े टुकड़ों को ट्रैक करती हैं, जिनकी संख्या 23,000 से अधिक है।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी भी यह काम करती है। ये दोनों एजेंसी लगातार अंतरिक्ष में जोखिम का मूल्यांकन करते हैं और यदि आवश्यक हो तो जमीन पर मौजूद कंट्रोल स्टेशन उचित कार्रवाई करते हैं।
हर दिन आईएसएस के प्रक्षेपवक्र (ट्रेजेक्ट्री) की कम से कम तीन बार जांच की जाती है। यदि किसी वस्तु का ऐसा मूल्यांकन किया जाता है कि वह आईएसएस के आसपास 25 किमी × 25 किमी × 4 किमी (ऊंचाई) के आकार के एक अंतरिक्ष बॉक्स के दायरे में आ सकता है, तो इसे संभावित खतरा माना जाता है।
टकराव की संभावना की गणना की जाती है और यदि जरूरी हुआ हुआ तो आईएसएस को उसके सामान्य प्रक्षेपवक्र से दूर कर दिया जाता है। इस तरह के नेविगेशन को मलबे से बचाव युद्धाभ्यास या डैम कहा जाता है। 1999 के बाद से आईएसएस 25 बार डैम से गुजर चुका है। आखिरी बार ऐसा 2015 में किया गया था।
भारतीय उपग्रह के मलबा से खतरा कैसे?
उस स्थिति में भारतीय उपग्रह का मलबा एक विशेष जोखिम कैसे पेश करता है?
यह आईएसएस के लिए कोई विशेष खतरा पेश नहीं करता है। 24 अतिरिक्त टुकड़े आईएसएस के लिए जोखिम हो सकते हैं। गौरतलब है कि, हालांकि नासा प्रमुख ने कहा कि पिछले 10 दिनों में आईएसएस के लिए जोखिम 44 फीसदी बढ़ गया था।
यह देखते हुए कि भारतीय परीक्षण केवल पांच दिन पहले किया गया था, नासा प्रमुख के बयान से स्पष्ट पता चलता है कि केवल भारतीय उपग्रह का मलबा इस जोखिम के लिए जिम्मेदार नहीं था। ब्रिडेनस्टाइन ने यह भी कहा कि भारतीय उपग्रह के मलबे के कारण आईएसएस के लिए डैम का उपयोग करने की संभावना "बहुत कम" है।
लेकिन क्या भारत ने यह नहीं कहा कि उसने मलबे की समस्या को रोकने के लिए ध्यान रखा है?
भारत ने कहा था कि चूंकि परीक्षण पृथ्वी की सतह से लगभग 300 किमी की दूरी पर पृथ्वी की निचली कक्षा में किया गया था, इसलिए मलबा हफ्तों में धरती पर वापस गिर जाएगा। लगभग 300 किमी की दूरी पर पृथ्वी की निचली कक्षा में वायु-मंडल और गुरुत्वाकर्षण दोनों हैं, हालांकि यह काफी कमजोर होते हैं।
भारतीय उपग्रह के टुकड़ों के वायुमंडल के खिंचाव की वजह से रफ्तार खत्म होने की उम्मीद है और फिर गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी की ओर गिरेंगे, और संभवतः हवा के घर्षण के कारण जल जाएंगे।