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कानों देखी: क्या नाराज चल रहे हैं नंदगोपाल नंदी और शरद पवार के बयान पर सियासत क्यों? जानें सब कुछ
सार
पिछले दो साल से एनसीपी प्रमुख शरद पवार की राजनीतिक परीक्षा चल रही है। आम तौर पर मीडिया में प्रचार को लेकर संतुलन बनाकर चलने वाले शरद पवार इन दिनों थोड़ा उदार होकर अखबारों में छप रहे हैं। शरद पवार के साथ-साथ भतीजे अजित पवार भी अच्छा स्पेस ले रहे हैं।
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सियासत की खबरें।
- फोटो : Social Media
विस्तार
उत्तर प्रदेश के कबीना मंत्री नंदगोपाल नंदी जी नाराज हो गए हैं। नाराजगी की दो वजह सामने आ रही है। पहली तो यह कि पत्नी को प्रयागराज से महापौर का टिकट नहीं मिला। दूसरी वजह रईस शुक्ला के भाजपा ज्वाइन करने की है। प्रयागराज के संघ और भाजपा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में उनके लिए सब ठीक नहीं चल रहा है। माफिया डॉन अतीक अहमद और उसके भाई की हत्या के बाद से नंद गोपाल नंदी का थोड़ा चिंतित रहना स्वाभाविक है। नंदी के बारे में कहा जाता है कि वह समय रहते सब साध लेते हैं। हालांकि, अभी उनका दांव कम चल रहा है। ऐसे में यह तंज भी जायज है कि भला अब नंदी जी नाराज रहने लगे हैं।
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क्या शरद पवार फिर कुछ करवट ले रहे हैं?
पिछले दो साल से एनसीपी प्रमुख शरद पवार की राजनीतिक परीक्षा चल रही है। आम तौर पर मीडिया में प्रचार को लेकर संतुलन बनाकर चलने वाले शरद पवार इन दिनों थोड़ा उदार होकर अखबारों में छप रहे हैं। शरद पवार के साथ-साथ भतीजे अजित पवार भी अच्छा स्पेस ले रहे हैं। खबर है कि जब से इस तरह की हवा है, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की भीतर भीतर छटपटाहट बढ़ रही है। इस छटपटाहट पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस निगाह गड़ाए बैठे हैं। मामला यहीं खत्म नहीं हो रहा है। इससे पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी खुश हैं। उनके सिपहसालार राज्यसभा सांसद संजय राऊत का बयान भी खूब टीआरपी बटोर रहा है। राज्य के वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री बड़ी बेसब्री से कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे का इंतजार कर रहे हैं। फिलहाल कांग्रेस के एक पूर्व मुख्यमंत्री का अनुमान भी यही है। वह कहते हैं कर्नाटक का नतीजा आने तक राजनीति की जमीन पककर तैयार हो जाएगी। आपको कुछ नया देखने को मिलेगा, क्योंकि राजनीति के धुरंधर शरद पवार करवट ले रहे हैं। बताते हैं अपने घर पर चाय की पार्टी में जब उन्होंने शरद पवार के करवट लेने का जिक्र किया तो कई लोग स्तब्ध रह गए थे।
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मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के पास दबने का कोई कारण नहीं
चमकदार कुर्ते में जिसने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को देखा है, वह कहते हैं कि वह तभी से धुन के पक्के हैं। यही धुन का पक्का होना कहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मजबूती है तो कहीं पार्टी के नेता इसे उनका हठी स्वभाव मानकर मुंह बिचका लेते हैं। सहजनवा से लेकर गोरखपुर के तमाम धुरंधर कहते हैं कि बाबा के पास दबने का तो कोई कारण नहीं होता। यह जिक्र इसलिए कर रहे हैं कि दिल्ली और लखनऊ की डबल इंजन की सरकार का ट्रैक कई मामले में अलग पटरी पर चल रहा है। पिछले साल से ही सूबे में डीजीपी की पोस्ट पर मामला लटका है। मुकुल गोयल को पद से हटाने और चौहान की तैनाती के बाद काफी कुछ सतह पर आ गया था। अवनीश अवस्थी की मुख्यमंत्री के सलाहकार के रूप में नियुक्ति भी कई राज समेटे है।
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वर्तमान कार्यवाहक डीजीपी राजकुमार विश्वकर्मा अपना कार्यकाल खत्म होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जबकि एसटीएफ के प्रमुख अमिताभ यश का बोलबाला है। आईपीएस प्रशांत कुमार की पूरी धमक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि योगी आदित्यनाथ की सरकार है। इस कड़ी में गाजीपुर के संजय शेरपुरिया की एसटीएफ द्वारा गिरफ्तारी भी काफी अहम है। भूमिहार संजय शेरपुरिया के गिरफ्तार किए जाने के बाद से जहां दिल्ली का लुटियन जोन स्तब्ध है, वहीं लखनऊ के राजनीति के पारे में नई हवा बह रही है। इस गिरफ्तारी का जिक्र इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि संजय शेरपुरिया कोई आम आदमी नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ प्रमुख मोहन भागवत, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सभी के प्रिय हैं। अयोध्या में मंदिर निर्माण में व्यस्त एक नेता की माने तो मुख्यमंत्री कुछ संदेश दे रहे हैं। लोगों को इसे सुन लेना चाहिए।
क्या विपक्ष को बड़े दिन बाद एकता की बात समझ में आ गई है?
पूर्व राज्यसभा सांसद आनंद शर्मा विपक्ष की एकता की बात करने पर मुस्कराकर शांत हो जाते हैं। वहीं, विपक्ष के तमाम प्रोग्रेसिव नेताओं को लग रहा है कि अभी नहीं तो कभी नहीं। बिहार के मुख्यमंत्री दिल्ली आए थे, तो बड़ी जमीन तैयार करने की भूमिका बनाकर लौटे हैं। हालांकि, प्रशांत किशोर ने उनकी तुलना एनडीए के संयोजक चंद्र बाबू नायडू से कर दी है। लेकिन जदयू के अध्यक्ष ललन सिंह ऐसी बातों को बहुत वजन नहीं देना चाहते।
विपुल गुप्ता कहते हैं कि मामला सिर्फ इतना है कि ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल क्या सोचते हैं? विपुल कहते हैं कि दोनों को अपने अस्तित्व के लिए विपक्ष की ताकत का बनना जरूरी दिखाई दे रहा है। इसे कांग्रेस भी समझ रही है और यूपी की समाजवादी पार्टी भी। इसलिए न केवल विपक्षी एकता बनेगी, बल्कि आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष की सीटों की संख्या में अच्छा इजाफा होने के आसार हैं।
'जब 2024 की बात आएगी तो आपसे चर्चा कर लेंगे?'
भाजपा के एक दिग्गज नेता से मिलने उनके आवास पर एक युवा मंत्री जी पहुंचे। युवा मंत्री जी थोड़ा उनके मुंह लगे हैं। यूपी में आजकल काफी सक्रिय रहते हैं। बताया गया कि मंत्री जी ने अपने राज्य की सरकार के कामकाज पर चर्चा की। लगे हाथ वह 2024 के आम चुनाव को लेकर चिंतित होने लगे। नेता जी को उन्होंने कर्नाटक, बंगाल, बिहार की चिंता दिखाते हुए यूपी में बढ़ रही चुनौतियों पर अपना दर्द बताया। बताते बताते कह बैठे कि इन राज्यों में होने वाले संभावित नुकसान को पार्टी कैसे 'कंपनसेट' कर पाएगी। बताते हैं आम तौर पर दूसरों को सुनने वाले नेता जी से रहा न गया। उन्होंने धीरे से कहा कि आपकी चाय खत्म हो गई हो तो जा सकते हैं? जब बात 2024 की आएगी तो आपको बुलाकर चर्चा कर लेंगे। अनुमान है कि मंत्री जी के बारे में आप भले न समझ पाए हों लेकिन नेता जी के बारे में अंदाजा तो लग ही गया होगा।