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20 साल में तीन लाख से अधिक अन्नदाताओं ने मौत को लगाया गले

Sat, 01 Dec 2018 01:48 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Sat, 01 Dec 2018 01:48 AM IST
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More than three lakh farmers have been commit suicide in twenty years
मध्यप्रदेश किसान आंदोलन - 10 दिनों में की 16 किसानों ने आत्महत्या - फोटो : the week

दिल्ली में एक फिर किसान सडक़ पर उतर कर अपना दर्द बयां कर रहे हैं। वह बताना चाहते हैं कि वह परेशान हैं। किसानों की यह परेशानी राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े भी बताते हैं। लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार हर साल औसतन 12 हजार अन्नदाता मौत को गले लगा ले रहा है। पिछले बीस साल में करीब तीन लाख किसानों ने तंगहाली में अपनी जान दे दी है। पहले पंजाब, उ.प्र. जैसे राज्यों के किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाने से बचते थे, लेकिन अब वहां से भी इस तरह की खबरे बढ़ने लगी हैं।

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20 साल में करीब तीन लाख किसानों ने की आत्महत्या

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले 20 साल में करीब तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 1997-2006 के बीच के आंकड़ों पर गौर करें तो करीब 1, 66,304 किसानों ने आत्महत्या की है। आत्महत्या का यह मामला देश में उदारीकरण लागू होने के बाद यानी 1991 से बढ़ा है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2008 में 16,196,2009 में 17 हजार368 किसानों ने आत्महत्या की है। 2004 के बाद से हालात ज्यादा खराब हुए। किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश जैसे राज्य प्रमुखता से हैं। 2001 की जनगणना एक और चौकाने वाला खुलासा करती है। इसके मुताबिक पिछले दस वर्षों के दौरान करीब 71 लाख किसानों ने खेती-बाड़ी का सौदा मानकर खेती-खलिहानी करना ही छोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामें में केन्द्र सरकार ने माना है कि हर साल करीब 12,602 किसान आत्महत्या कर ले रहे हैं। इनमें से 8007 उत्पादक किसान हैं और 4,595 के करीब खेतिहर मजदूर आदि हैं। 2014 में 12360, 2015 में 12,602 और 2016 में 11,370 किसानों ने आत्महत्या की।

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अन्न दाता परेशान है

किसान नेता पुष्पेन्द्र चौधरी के अनुसार देश का अन्नदाता परेशान है। उसे भौतिक चकाचौंध की दुनिया में कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। उसे न तो अपने उत्पाद का सही दाम न मिल रहा है और न ही वह मौजूदा दौर में खेतीबारी करके ढंग का जीवन बसर कर पा रहा है। बनारस के किसान नेता विनोद सिंह का कहना है कि किसान जब बाजार में खुद दाल खरीदने जाता है तो उसे कई गुणा मंहगा मिलता है, लेकिन जब वह अपना अनाज बेचने जाता है तो काफी सस्ता बेचकर आता है। किसान 10 हजार का लोन लेकर जब नहीं चुका पाता तो जेल चला जाता है और बड़े-बड़े उद्योगपति लाखों करोड़ रुपये डकारकर बैठे हैं। विनोद सिंह जंतर मंतर पर किसान के प्रदर्शन में हिस्सा लेने आए हैं। उनका कहना है कि अन आर्गनाइज्ड सूद-ब्याज पर मजबूरी में किसान ऋण लेता है और महाजन को ही पैसा चुकाते तबाह हो जाता है। मेरठ से आए वीरेन्द्र चौधरी का कहना है कि हम फसल मानसून को देखकर बोते हैं। पूरा रिस्क उठाते हैं, लेकिन मानसून धोखा दे जाता है तो हमारे हाथ में मायूसी के सिवा कुछ नहीं होता। गन्ना किसानों का भुगतान सालों तक बड़ी समस्या रही है। आलू के सही भाव नहीं मिलते। वीरेन्द्र कहते हैं कि किसान की नकदी की फसल जब चौपट हो जाती है तो उसके पास हिम्मत हार जाने के सिवा कोई जारा नहीं होता।

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क्या दोगुनी हुई आमदनी ?

किसानी के मामले पर गहरी पकड़ रखने वाले किसान नेता बीएम सिंह का कहना है कि लुटा किसान साढें चार साल में और लुट गया। बीएम सिंह का कहना है कि किसान की लागत कम, आय दोगुनी करने को कौन कहे, मोदी सरकार के राज में डीजल, बिजली, खाद ने किसान की लागत को 60 प्रतिशत तक बढ़ा दिया। इसके सामानांतर उसकी आय 40 फीसदी तक कम हो गई। फसल बीमा योजना तो पूरी तरह से घोटाला है। यह सरकार बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए लाई थी। ऊपर से सरकार के निर्देश पर पिछले दो साल से राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने किसानों की आत्महत्या के मामले दर्ज करना ही बंद कर दिया है। बीएम सिंह का कहना है कि सरकार भले ही धान की फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1700 घोषित कर दे, लेकिन किसान का धान 1100-1200 रुपये क्विंटल में ही जा रहा है।

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