किसान रैली: दिल्ली पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव की सफाई के बावजूद नहीं मिले कई सवालों के जवाब
- नहीं बता सके कि पुलिस ने खुफिया सूचनाओं को गंभीरता से आखिर क्यों नहीं लिया?
- नहीं बता सके कि केवल किसान संगठनों के नेताओं के आश्वासन को ही क्यों माना मूलमंत्र?
- क्या किसान नेताओं पर आरोप लगाकर जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ रही दिल्ली पुलिस?
विस्तार
दिल्ली पुलिस के कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने 26 जनवरी को प्रदर्शनकारियों द्वारा की गई हिंसा पर बुधवार को सफाई दी। उन्होंने बताया कि 394 पुलिसकर्मी इस हिंसा में घायल हुए, कई आईसीयू में अपना इलाज करा रहे हैं। श्रीवास्तव ने अनुशासित और बेहद कड़क अंदाज में कहा कि दिल्ली पुलिस जांच पड़ताल कर रही है। सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है। विश्लेषण चल रहा है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। कमिश्नर ने कहा कि किसान नेताओं से भी पूछताछ होगी और कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी, लेकिन इसके साथ जिम्मेदार पुलिस कमिश्नर कई अनसुलझे सवाल छोड़ गए।
एसएन श्रीवास्तव ने एक सवाल के जवाब में स्वीकार किया कि पाकिस्तान से 308 ट्विटर हैंडल को ऑपरेट करने की जानकारी थी। यह भी माना कि दिल्ली पुलिस के पास पर्याप्त खुफिया इनपुट थे। पुलिस को सब जानकारी थी, लेकिन उन्होंने (दिल्ली पुलिस) किसान संगठनों के नेताओं के साथ हुए समझौते पर भरोसा किया। एसएन श्रीवास्तव ने चार किसान नेताओं (सतनाम सिंह पुन्नू, दर्शन पाल सिंह, बूटा सिंह और राकेश टिकैत) का नाम लिया और इन्हें हिंसा भड़काने का दोषी पाया। हालांकि इसमें वह लाल किले पर किसान संगठन और निशान साहिब का झंडा फहराने वाले दीप सिद्धू का नाम तक नहीं लिया।
क्या दिल्ली पुलिस कमिश्नर अपनी मुख्य जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते नहीं नजर आ रहे हैं?
दिल्ली पुलिस के पास राजधानी के आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी है। राजधानी लंबे समय से आतंकी संगठनों के निशाने पर है। गणतंत्र दिवस इस दृष्टि से संवेदनशील समारोह है। हर बार इसके बाबत सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद रहती है। ऐसे में सवाल है कि आतंकवादी, उपद्रवियों, असमाजिक तत्वों के षडयंत्र को अच्छी तरह समझने वाली दिल्ली पुलिस ने किसान संगठन के नेताओं से मिले आश्वासन, समझौते पर क्यों भरोसा कर लिया?
ऐसे में सवाल यह है कि क्या एक पुलिस कमिश्नर सुरक्षा व्यवस्था के बाबत सिर्फ आंदोलनकारी संगठनों के नेताओं से समझौता पर भरोसा को ही इतिश्री बता सकता है? क्या खुफिया सूचनाओं को हल्के में लेकर जिम्मेदारी पूरी संभव है। दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने सिंघु बार्डर से मुकरबा चौक, टीकरी से नांगलोई, गाजीपुर से आईटीओ की तरफ बढ़े किसानों के उपद्रवी जत्थे का जिक्र किया।
वो सवाल जिनके जवाब जरूरी हैं
- जब किसान नेता 10-20 किमी दूर भड़काऊ भाषण दे रहे थे और उनके साथ की भीड़ आंदोलित होने लगी तो सुरक्षा उपाय के तौर पर कौन से स्टैडर्ड आपरेटिंग प्रोसीजर अपनाए गए?
- दीप सिद्धू, लक्खा सिधाना और एक अन्य के बारे में जानकारी होने के बाद भी दिल्ली पुलिस ने एहतियातन कौन से कदम उठाए?
- दीप सिद्धू को लेकर गुरुनाम सिंह चढ़ूनी, योगेन्द्र यादव समेत तमाम नेताओं ने आरोप लगाए। उन्हें आंदोलन से अलग भी रखा, लेकिन दिल्ली पुलिस ने ध्यान क्यों नहीं दिया?
- क्या दिल्ली पुलिस ने कतरे को भांपकर केन्द्रीय अर्ध सैनिक बलों की मांग की थी?
- क्या दिल्ली पुलिस ने अपने ही जवानों को लाचार नहीं बना दिया?
- जब उपद्रवियों के हाथ में धारदार हथियार थे और ट्रैक्टर को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे तो दिल्ली पुलिस ने कौन सा कदम उठाया?
इस तरह के कई सवाल हैं जो दिल्ली पुलिस के कमिश्नर की जिम्मेदारी पर प्रश्न उठा रहे हैं। अभी इनके जवाब आने बाकी है।