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यौन उत्पीड़न साबित करने के लिए शरीर पर चोट होना जरूरी नहीं: मद्रास हाईकोर्ट

Sun, 20 Oct 2019 03:40 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई Published by: संजीव कुमार झा Updated Sun, 20 Oct 2019 03:40 AM IST
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Madras high court says Body injury is not necessary to prove sexual harassment
सांकेतिक तस्वीर

मद्रास हाईकोर्ट ने शनिवार को कहा, यौन उत्पीड़न की शिकार नाबालिग पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान नहीं हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि उससे ज्यादती नहीं हुई। इसके साथ ही निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट ने दोषी को 10 वर्ष सश्रम कारावास और पॉक्सो कानून के तहत सात साल सश्रम कैद की सजा कायम रखी।

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जस्टिस एस वैद्यनाथन ने आरोपी की इस दलील को खारिज कर दिया कि शारीरिक हिंसा के मामले में चोट का होना जरूरी है। उसके वकील ने कहा था कि चूंकि पीड़िता के शरीर पर चोट का निशान नहीं है इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि यौन उत्पीड़न हुआ। वहीं, जज ने कहा, यह गलत दलील है।
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नाबालिग लड़की को यह पता नहीं रहा होगा कि उसे किस मंशा से खींचा गया और क्यों छुआ गया। संभव है कि पीड़िता ने बचने के लिए जोर नहीं लगाया, जिससे उसे चोट नहीं आई। जज ने कहा, चोट न होने का मतलब यह नहीं कि यौन उत्पीड़न नहीं हुआ। जबकि फोरेंसिक रिपोर्ट में पीड़िता के कपड़ों पर सीमेन मिला है। इसके साथ ही कोर्ट ने दोषी की अपील खारिज कर निचली अदालत की सजा बरकरार रखी।

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ऐसा नहीं लगाता की पीड़िता झूठ बोल रही है

जस्टिस वैद्यनाथन ने कहा, नाबालिग ने इरोड के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान में अपने साथ हुई ज्यादती बताई है। उसने बताया कि जब आरोपी ने उसे छुआ तो उसके कपड़ों पर कुछ तरल पदार्थ गिरा। जिसे देखकर वह घर से बाहर भाग गई। जज ने कहा, पीड़िता के बयान से नहीं लगता कि उसे किसी ने कुछ सिखाया है।

2016 का मामला

पीड़िता की मां ने 27 मई 2016 को शिकायत की थी कि प्रकाश उनकी 12 साल की बेटी को अपने घर ले गया और यौन उत्पीड़न किया। सुनवाई के बाद निचली अदालत ने प्रकाश को दोषी करार देते हुए आईपीसी के तहत दस साल सश्रम कारावास और पॉक्सो कानून के तहत सात साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ चलनी हैं।

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