मुलायम सिंह यादव: बेटे से बेरुखी और झल्लाहट में गुजरती राजनीतिक सफर की शाम
अखाड़ा छोड़ राजनीति के दंगल में दांवपेच आजमाने उतरे मुलायम नौ महीने बाद 81 साल के हो जाएंगे। उम्र के इस पड़ाव में भी वह सक्रिय राजनीति में बने हुए हैं। उन्होंने एक लंबी सियासी पारी खेली है। अब जब राजनीतिक मशाल, एक हाथ से दूसरे में देने का वक्त है तो वक्त खराब हो चला है। पिछले दो सालों से, बात-बेबात बेटे अखिलेश को लेकर उनका दर्द छलक ही पड़ता है। मुलायम, सरेआम बेटे के खिलाफ गुस्सा भी जता देते हैं, विरोध भी दर्ज कर देते हैं और बेटे के साथ खड़े भी दिखते हैं।
अखाड़े की मिट्टी से समाजवादी राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे मुलायम, राजनीति के हर उस दांव-पेच में माहिर हैं जो मंझे सियासतदान को भी उलझाकर रख दें। उनके बयान उनकी राजनीति की दृष्टि तय करते हैं। साल 2016 में बेटे अखिलेश के हाथों में समाजवादी पार्टी की कमान सौंपी, कार्यकर्ताओं के सामने नाराजगी जताई, भाई के प्रति अथाह अनुराग दिखाया और बेचारगी झलक गई-
मैं अब सिर्फ पार्टी का संरक्षक हूं, क्या कर सकता हूं?
जब गुस्सा शांत हुआ तो वापस बेटे के समर्थन में आ गए। मुलायम की इस मुलायमियत से भाई शिवपाल यादव भी चारों खाने चित हो गए। उन्होंने कभी नेता जी की तारीफ की, कभी उपेक्षित करने का आरोप लगाया और आखिर में खुद ही नई पार्टी बना ली।
दर्द पुराना, झल्लाहट नई
2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर जब बेटे ने बुआ के साथ गठबंधन किया तो एक बार फिर मुलायम का दर्द छलक उठा। यहां तक कह डाला-
'अपने ही लोगों ने अपनी पार्टी को तोड़ दिया।'
अपने पुराने दिनों को याद करते हुए मुलायम, अखिलेश पर जमकर बरसे। मुलायम यह कहने में भी नहीं हिचके- ''पार्टी को अपने ही लोग खत्म कर रहे हैं।'' ये अपने लोग कौन? क्या मुलायम बेटे अखिलेश पर पार्टी को तोड़ने और खत्म करने का आरोप लगा रहे थे। मुलायम एक ही साथ दो तरह की बातें करने में माहिर हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं से जहां कहा कि सूबे में उनकी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी से है, वहीं चुनाव की बेहतर तैयारी के मामले में भाजपा की तारीफ भी कर डाली। दरअसल, इस बार मुलायम का दर्द यह था कि बसपा से गठबंधन करते वक्त बेटे ने उनकी राय नहीं ली।
किसी जमाने में इतनी मजबूत पार्टी बनी थी। अकेले सरकार बनाई तीन बार और तीनों बार हम मुख्यमंत्री रहे। हम राजनीति नहीं सच्ची बात कह रहे हैं।
मुलायम बोल उठे मुझसे बिना पूछे मायावती से गठबंधन कर लिया। आधी सीटें देने का आधार क्या? इसी के साथ ही मुलायम बीते दिनों में चले गए और अपने जमाने को याद कर डाला।
कोई न जाने पिता-पुत्र का समाजवादी द्वंद्व!
पिता-पुत्र का यह समाजवादी द्वंद्व काफी पुराना है। एक वक्त था जब सपा में तीन गुट सक्रिय थे। एक धड़े का नेतृत्व मुलायम के हाथों में तो दूसरे गुट को अखिलेश चला रहे थे। तीसरा गुट चाचा शिवपाल का था। यह वह दौर था जब अखिलेश युवाओं का समाजवाद लाने की कोशिश में जुटे थे और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को खफा करते जा रहे थे। गायत्री प्रजापति को साइड किया तब भी पिता भड़के। अमर सिंह के खिलाफ खबर प्लांट करने का आरोप लगाया तो मुलायम का दिल पसीज गया। पुराने दोस्त के साथ खड़े हो गए।
चार साल पहले मैनपुरी में मुलायम ने अखिलेश को उस वक्त डांटा, जब अखिलेश के कंधों पर सूबे की जिम्मेदारी थी। इसके बाद लखनऊ में भी डांट लगाई। यह वह वक्त था जब मुलायम बेमौसम बारिश को लेकर बेटे की सरकार की तरफ से पहुंचाई मदद का जिक्र कर रहे थे। मुलायम भाषण दे रहे थे और अखिलेश मंच पर बैठकर लोगों से बातचीत कर रहे थे। मुलायम ने सरेआम मंच से अखिलेश को डांटा। उन्होंने पहले कहा मुख्यमंत्री जी बात करने में लगे हैं और फिर अखिलेश को जोरों की डांट लगाते हुए कह डाला- आ गया है बात करने....एक दौर वह भी था जब पिता-पुत्र के बीच बहस और चाचा के साथ धक्का मुक्की का वीडियो मीडिया में खूब सुर्खियां बटोर रहा था।
2016 में मुलायम ने कह डाला-हम खड़े हो जाएंगे तो सरकार की ऐसी तैसी हो जाएगी।
घुमावदार रहा मुलायम सिंह यादव का सफर
मुलायम गांव से निकले। इटावा से ग्रेजुएशन किया और राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए आगरा पहुंचे। छात्र राजनीति में सक्रिय हुए। राममनोहर लोहिया की समाजवादी विचारधारा से प्रभावित हुए और पहली बार उस वक्त लोहिया का सानिध्य उन्हें मिला जब 1966 में लोहिया इटावा पहुंचे थे। 1967 में लोहिया की पार्टी से चुनाव लड़ा और जीत का ताज पहना। लोहिया की मौत के बाद मुलायम ने चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल का दामन लिया। आपातकाल में मीसा में गिरफ्तार हुए और जेल हो गई। 1979 में चौधरी चरणसिंह ने जब लोकदल की स्थापना की तो मुलायम उधर हो लिए। 1989 का दौर आया तो जनता पार्टी ज्वॉइन कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
कार सेवकों पर गोली चलाकर 'राष्ट्रीय नेता' बन गए मुलायम...!
4 अक्तूबर 1992 को मुलायम ने समाजवादी पार्टी की स्थापना की। तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मुलायम 1967 में पहली बार विधायक बने। कांग्रेस विरोध के दौर में 1977 में मंत्री बने और इसके बाद अयोध्या मुद्दे ने मुलायम को राजनीति के शिखर पर पहुंचाया दिया। यह 1990 का दौर था और भारत की राजनीतिक लड़ाई मंदिर-मस्जिद के फेर में आ गई थी। मुलायम उस वक्त सूबे के मुख्यमंत्री थे और बाबरी मस्जिद के लिए कार सेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। यही वह दौर था जब भाजपा के हिंदू शिखर पुरुष आडवाणी, रथ लेकर निकले थे। सोमनाथ से अयोध्या तक माहौल को हिंदुत्वादी करने का दौर था। सत्ता में वीपी सिंह बैठे थे और आडवाणी की रथ यात्रा उनके माथे पर बल खींच रही थी। आडवाणी को रोकने का भारी दबाव था।
जब 23 अक्टूबर को बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी हुई उसके सात दिन बाद ही 30 अक्टूबर को मुलायम ने कार सेवकों पर गोल चलाने का आदेश दे दिया। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 30 कार सेवकों की जान गई, लेकिन आंकड़ों की सच्चाई संदिग्ध ही रही।
मुख्यधारा की सियासत से तकरीबन दूर जा रहे मुलायम सिंह के लिए राजनीतिक अनुभवों से गुजरी एक भरी-पूरी दुनिया है। जिसमें सबसे बड़े सूबे यूपी के 3 बार सीएम होने से लेकर देश के रक्षा मंत्रालय को संभालने का हिसाब-किताब है। 17वीं लोकसभा के चुनाव में मुलायम की सियासत बयानों के इर्द-गिर्द सिमटती दिखाई दे रही है। बयान, जिनमें प्रधानमंत्री की तारीफ भी शामिल है। अगर किन्हीं वजहों से सपा-बसपा का गठबंधन यूपी में संभावित कमाल नहीं कर पाता तो अखिलेश को मुलायम के पास वापस लौटना ही होगा। कुछ सबक फिर हासिल करने होंगे। जमीनी तजुर्बे को भीतर उतारना होगा।