2019 का महासंग्राम: क्या फिर पाला बदलने की तैयारी में हैं नीतीश कुमार?
आखिरी और सातवें चरण के मतदान से पहले बिहार में जदयू के रुख ने सियासी गलियारों और एनडीए में हलचल मचा दी है। जदयू के इस बयान ने बिहार में सियासी पारा और चढ़ा दिया है। पार्टी ने मतदान से ऐन पहले बिहार की विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग दोहरा दी है। दोबारा एनडीए में शामिल होने के बाद जदयू की ओर से विशेष राज्य का दर्जा देने वाले बयान के नए मतलब निकाले जा रहे हैं।
नीतीश कुमार की पार्टी की तरफ से अगस्त 2017 में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई गई थी। ये वो दौर था जब जदयू और राजद के संबंध बिगड़ने लगे। फिर हालात ऐसे बने कि दोनों दल अलग हो गए और नीतीश कुमार दोबारा एनडीए में शामिल हो गए। इसके बाद से जदयू की ओर से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग भी मंद पड़ गई।
देश और बिहार में छह दौर का मतदान पूरा हो चुका है। आखिरी दौर में 19 मई को यहां आठ सीटों पर मतदान होना है। ऐसे में विशेष राज्य के दर्जे की मांग वाले बयान ने सबका ध्यान खींचा है। विरोधी कह रहे हैं कि नीतीश कुमार फिर से पाला बदलने की फिराक में हैं। इसे लेकर तेजस्वी यादव ने तीखा तंज भी कसा है। नीतीश का सियासी इतिहास देखें तो इस बात को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता है।
बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने संबंधी बयान पार्टी महासचिव के सी त्यागी की तरफ से आया है। उन्होंने बिहार से साथ साथ ओडिशा और आंध्र प्रदेश को भी विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की है। उन्होंने सोमवार को एक बयान जारी कर कहा कि साल 2000 में बिहार के विभाजन के बाद राज्य से प्राकृतिक संसाधनों के भंडार और उद्योग छिन गए। राज्य का विकास जैसे होना चाहिए था, नहीं हुआ। अब समय आ गया है कि केंद्रीय वित्त आयोग इस मुद्दे पर फिर से विचार करे।
भाजपा के लिए असहज स्थिति
जदयू की यही मांग एनडीए और भाजपा के लिए मुसीबत का सबब बन सकती है। बिहार में 40 सीटों पर एनडीए और महागठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला है। इस बार यहां कि सियासी फिजा बता रही है कि पलड़ा किसी का भी भारी पड़ सकता है। त्यागी के बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है और तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं।
जदयू की ये मांग भाजपा को असहज कर सकती है। क्योंकि करीब दो साल पहले नीतीश कुमार ने इसी को मुद्दा बनाकर भाजपा से किनारा किया था। इसी मुद्दे पर भाजपा की बड़ी सहयोगी रही टीडीपी ने भी एनडीए और भाजपा का साथ छोड़ा है। चंद्रबाबू नायडू लगातार मोदी सरकार से आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहे थे। जब उनकी ये मांग नहीं मानी गई तो वह भाजपा से सबसे बड़े विरोधी बन गए हैं। अब वह पीएम मोदी को सीधे निशाने पर लेते हुए उनपर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हैं।
अब नायडू, ममता बनर्जी और दूसरे नेताओं के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा के गठन की कवायद में नजर आते हैं। पहले यही नायडू हर मंच पर पीएम मोदी के साथ नजर आते थे। इसके ठीक उलट पहले नीतीश कुमार पीएम मोदी पर हर मंच से निशाना साधते थे, अब दोनों बिहार की रैलियों में साथ नजर आते हैं।
वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले ही साफ कर चुके हैं कि मौजूदा व्यवस्था में किसी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देना संभव नहीं है। जो राज्य किसी कारणवश पिछड़ गए हैं, उन्हें वित्तीय सहायता जरूर मुहैया कराई जा सकती है। यही बात उन्होंने चंद्रबाबू नायडू तक भी पहुंचाई थी। लेकिन नायडू नहीं माने और एनडीए छोड़ दिया।
बिहार में कांटे की लड़ाई
बिहार में एनडीए इस बार कांटे की लड़ाई में फंसा है। बिहार में कुल 40 विधानसभा सीटें हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 22 और उसके सहयोगी लोजपा को छह और रालोसपा को तीन सीटें मिली थीं। हालांकि, अब रालोसपा एनडीए से अलग हो गई।
इस बार कांग्रेस और आरजेडी एक साथ हैं। इनके साथ कई छोटे दल भी हैं। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी का ग्राफ बेहतर हुआ है। 2015 विधानसभा चुनाव के नतीजों ने आरजेडी और कांग्रेस के प्रदर्शन से लगता है कि बिहार में महागठबंधन बीजेपी-जदयू को ठीक-ठाक चुनौती देगा। सवाल उठ रहा है कि क्या इसी सियासी मिजाज को भांपकर नीतीश कुमार की ओर से पुराना राग फिर छेड़ा गया है? क्या वह फिर पाला बदलेंगे?
नीतीश कुमार का सियासी इतिहास भी बताता है कि वह हालात देखकर रणनीति तय करते हैं। कभी अकेले, कभी भाजपा तो कभी राजद के साथ हो लेते हैं। 2009 में जदयू ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन 2014 में अपने बूते चुनाव लड़ा। लेकिन अब 2019 में जदयू, भाजपा और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही है।