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लॉकडाउन: करोड़ों नौकरियां गईं, सामाजिक और आर्थिक असमानता बढ़ी, खोया मानसिक सुकून

Tue, 23 Mar 2021 06:24 AM IST
Amit Mandal अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Tue, 23 Mar 2021 06:24 AM IST
सार

कोरोना वायरस संक्रमण के कारण एक साल पहले देशव्यापी लॉकडाउन ने जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया था। बसों और ट्रेनों के पहिए अचानक थम गए। जो जहां था वहीं फंस गया। उद्योग-धंधे ठप से हो गए और प्रवासी मजदूरों के सामने जीने का संकट पैदा हो गया। प्रवासी मजदूर हजारों किलोमीटर दूर अपने घरों की ओर पैदल ही कूच करने लगे। ऐसे नजारे दिखे दो इससे पहले कभी देखे नहीं गए थे। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये रही कि इसने समाज पर व्यापक प्रभाव डाला। करोड़ों नौकरियां गईं, धंधे ठप हो गए, स्कूल बंद होने से सीखने-पढ़ने का अहसास जाता रहा, सामाजिक-आर्थिक असमानता में भारी इजाफा हुआ। लॉकडाउन के चलते देश में क्या-क्या हुआ आइए जानते हैं।
 

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Lockdown: Million of people lost jobs, social and economic inequality increased, lost mental peace
कोरोना वायरस - फोटो : PTI

विस्तार

करोड़ों नौकरियां गईं, हर चौथा व्यक्ति हुआ बेरोजगार
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  • 25 मई तक देश में औसत बेरोजगारी दर 24.5% रही। शहरों में 26.3% तो गांवों में 23.7% लोग बेरोजगार हो गए। महिलाओं को बेरोजगारी का दंश ज्यादा झेलना पड़ा। 
  • सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के एमडी और सीईओ महेश व्यास ने बताया, लॉकडाउन में बेरोजगारी दर 24 फीसदी के आसपास रही। अप्रैल-जून तिमाही में -जीडीपी भी रसातल में पहुंच गई। निर्माण 50 फीसदी तो विनिर्माण क्षेत्र 40 फीसदी घटा। कई लोग आधी या कम सैलेरी पा रहे हैं। 2.1 करोड़ बेरोजगार हुए। 
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  • ऑक्सफैम के मुताबिक, अप्रैल में हर घंटे 1.70 लाख लोगों की नौकरियां गईं। रोजगार खोने वालों में से 75 फीसदी असंगठित क्षेत्र से जुड़े थे। 

सीखने-पढ़ने का अहसास छूट गया 
  • यूनिसेफ के मुताबिक, लॉकडाउन सेे 2020 में 15 लाख स्कूल बंद रहे। इससे 24.7 करोड़ प्राथमिक व सेकंडरी छात्रों की पढ़ाई ठप हो गई। ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा मिला, पर देश में डिजिटल डिवाइस और इंटरनेट तक पहुंच न होने से चार में से तीन बच्चों की ऑनलाइन लर्निंग नहीं हो पाई। 
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  • रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना से पहले 24 फीसदी घरों में ही इंटरनेट था। भारत के सबसे गरीब 20 फीसदी परिवारों में से सिर्फ तीन फीसदी के पास ही कंप्यूटर और सिर्फ नौ फीसदी के पास ही इंटरनेट की पहुंच थी।

बढ़ा दी सामाजिक और आर्थिक असमानता
  • लॉकडाउन ने गरीब-अमीर से लेकर महिला-पुरुष पर अलग-अलग असर डाला है। 24 मार्च की रात से एक ओर जहां शहरी लोग अपने घरों में कैद हो गए तो प्रवासी अपने घर लौटने के लिए सड़कों पर आ गए। शहरों में जहां कामकाजी लोगों के एक वर्ग को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा मिल गई, वहीं गांव के लोगों के पास आजीविका से समझौता करने के अलावा विकल्प नहीं था। लॉकडाउन में एक ओर करोड़ों भारतीय बेरोजगार हुए तो दूसरी ओर अरबपतियों की संपत्ति में 35 फीसदी का इजाफा हुआ। लॉकडाउन के चलते दशकों बाद सबसे ज्यादा आर्थिक असमानता पैदा हुई। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, मार्च 2020 के बाद की भारत के 100 अरबपतियों की संपत्ति 12,97,822 करोड़ रुपये बढ़ी। अगर यह 13.8 करोड़ सबसे गरीब लोगों में बांट दी जाए तो हर व्यक्ति को 94,045 रुपए मिल सकते हैं।

खोया मानसिक सुकून, जीवन में स्थिरता नहीं रही
  • लॉकडाउन में महामारी के भय के साथ मानसिक तकलीफों का वायरस भी घरों में प्रवेश कर गया। भागती-दौड़ती जिंदगी पर अचानक ब्रेक लग गए। लोग कल की चिंता, संक्रमण के डर, अकेलेपन और अनिश्चितता भरे माहौल से दिन-रात जूझने लगे। टीवी चैनलों में हर वक्त कोरोना व खराब आर्थिकी की खबरों से मानसिक सुकून छिन गया। खासतौर पर जिन लोगों पर परिवार की निर्भरता थी, उनकी नौकरियां जाने से तो घरों में उथल-पुथल मच गई। नौजवानों को अवसाद और तनाव से ज्यादा जूझना पड़ा। 

अन्य रोगों से पीड़ित मरीजों का बढ़ा संकट
  • लाखों मरीज जरूरी इलाज से दूर हो गए। संक्रमण के भय के मारे डायलिसिस से लेकर कई थेरैपी और दवाएं लेने वाले मरीजों ने डॉक्टरों का रुख तक नहीं किया। अधिकांश डॉक्टरों ने भी परामर्श बंद कर दिया। मनोचिकित्सकों के एक सर्वे में सामने आया कि लॉकडाउन में चेकअप और फॉलोअप कराने वाले मरीज घट गए। पिछले जून में ऑपरेशनों की संख्या एक तिहाई (4.24 लाख) रह गई।




 
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