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चिट्ठियां : महंगाई की ये शक्ल अजीब सी है...
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 23 Sep 2018 07:07 PM IST
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जिंदगी के अर्थशास्त्र और व्यापार के गणित के बीच महंगाई खड़ी मिलती है। आम आदमी कीमतों को लेकर लगातार परेशान है। पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों से परेशानी और बढ़ती जा रही है और इसमें राहत की कोई उम्मीद दिख नहीं रही। ऐसे में आम आदमी के सामने एक ही सवाल रह जाता है कि वह करे तो क्या करे। सीमित आमदनी में असीमित खर्चे उसके जीवन के हर पहलू पर असर डालते हैं।
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चिट्ठी-1 : बात सिर्फ तेल की नहीं है
अमेरिकी चेतावनी के चलते भारत ने ईरान से तेल आयात आधा करने का फैसला लिया है। इससे देश में डीजल और पेट्रोल के दामों में राहत की उम्मीद न के बराबर है। इसे अमेरिका की दादागिरी नहीं तो क्या कहेंगे? परमाणु समझौते से अलग होने के बाद अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए और भारत समेत दुनिया भर के सभी देशों से नवंबर तक ईरान से तेल आयात शून्य करने को कहा है। चेतावनी को नजरअंदाज करने वालों के खिलाफ कड़े प्रतिबंध की धमकी दी गई, जिसके तहत भारत यह कदम उठाने को मजबूर हुआ। इस चेतावनी के कारण भारत को भविष्य में कई समस्याओं से रूबरू होना पड़ सकता है। पहला तो ईरान से तेल का आयात कम होने पर अमेरिका अपने तेल की बिक्री मनमानी कीमतों पर करेगा, जिससे भविष्य में तेल की कीमतों में और ज्यादा उछाल आने की संभावना है।
दूसरा ईरान अपने तेल को दूसरे सबसे बड़े आयातक देश चीन के साथ नजदीकियां बढ़ाकर भारत के लिए खतरा खड़ा कर सकता है। सही मायने में अमेरिका दूसरे देशों पर रौब झाड़ने के लिए अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रहा है। इसके साथ ही वह अन्य देशों के अंदरूनी मामलों में भी दखलंदाजी करने से बाज नहीं आ रहा है, जैसा कि उसने भारत सरकार द्वारा किसानों को गेहूं और धान पर दी जाने वाली सब्सिडी का अपनी संसद में कड़ा विरोध कर उसे विश्व व्यापार के विपरीत बताया। असल में अमेरिका चाहता ही नहीं है कि तेल और हथियारों की बिक्री में कोई अन्य देश उसके समकक्ष खड़ा हो, जिससे विश्व बाजार में उसका एकाधिकार बना रहे। बाहर से खुद को भारतीय नीति और मोदी समर्थक दिखाने वाली ट्रंप सरकार सही मामले में दोगली नीति चल रही है।
एक तरफ तो अमेरिकी सरकार पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता रोककर भारत के साथ घनिष्ठता बढ़ाने का नाटक कर रही है, तो दूसरी तरफ चेतावनी जारी कर भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप कर रही है। अब देखना यह है कि भारत और अमेरिका के बीच होने वाली टू प्लस टू वार्ता का दोनों देशों के व्यापार पर कितना असर पड़ेगा।
-अलीगढ़ से अनुपमा अग्रवाल
दूसरा ईरान अपने तेल को दूसरे सबसे बड़े आयातक देश चीन के साथ नजदीकियां बढ़ाकर भारत के लिए खतरा खड़ा कर सकता है। सही मायने में अमेरिका दूसरे देशों पर रौब झाड़ने के लिए अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रहा है। इसके साथ ही वह अन्य देशों के अंदरूनी मामलों में भी दखलंदाजी करने से बाज नहीं आ रहा है, जैसा कि उसने भारत सरकार द्वारा किसानों को गेहूं और धान पर दी जाने वाली सब्सिडी का अपनी संसद में कड़ा विरोध कर उसे विश्व व्यापार के विपरीत बताया। असल में अमेरिका चाहता ही नहीं है कि तेल और हथियारों की बिक्री में कोई अन्य देश उसके समकक्ष खड़ा हो, जिससे विश्व बाजार में उसका एकाधिकार बना रहे। बाहर से खुद को भारतीय नीति और मोदी समर्थक दिखाने वाली ट्रंप सरकार सही मामले में दोगली नीति चल रही है।
एक तरफ तो अमेरिकी सरकार पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता रोककर भारत के साथ घनिष्ठता बढ़ाने का नाटक कर रही है, तो दूसरी तरफ चेतावनी जारी कर भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप कर रही है। अब देखना यह है कि भारत और अमेरिका के बीच होने वाली टू प्लस टू वार्ता का दोनों देशों के व्यापार पर कितना असर पड़ेगा।
-अलीगढ़ से अनुपमा अग्रवाल
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चिट्ठी-2: महंगाई पर कब तक रोएंगे हम?
आजादी के बाद से लेकर आज तक महंगाई हर चुनाव में एक मुद्दा बनी रही है। हर बार देश के विकास की दुहाई देकर और विरोधियों की साजिश बताकर इस मुद्दे से लोगों को भटकाया गया। आजादी के समय एक डॉलर बनाम एक रुपया था, लेकिन आज एक डॉलर की कीमत 73 रुपये तक पहुंच गई है। कुछ साल पहले तक देश में गेहूं एवं अन्य अनाजों का आयात होता था, लेकिन आज गोदामों में अनाज रखने तक की जगह नहीं है। अनाज बारिश में भीगकर सड़ रहा है।
हमारी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के समक्ष एक ज्वलंत प्रश्न उत्पन्न होता है कि तमाम योजनाओं को क्रियान्वित करने के बाद भी कुपोषण की स्थिति भयावह क्यों है? यह देश के भविष्य को अपनी जद में खींचता जा रहा है, इस पर काबू क्यों नहीं पाया जा सका है? कृषि के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर उत्पादन के बावजूद क्यों देश के नौनिहालों को उचित मात्रा में पोषक पदार्थ नहीं मिल पाता? देश के राजनेताओं की रूचि नीतियों के सफल संचालन में कम और अपनी राजनीतिक बिसात साधने में अधिक है।
दूसरी तरफ मध्यम वर्ग का एकमात्र राष्ट्रीय धर्म टैक्स देना और महंगाई को झेलना रह गया है। महंगाई के इस बढ़ते ग्राफ को नीचे लाने की जरूरत है, जिसके लिए हमें स्वयं ही प्रयास करना होगा। हमें ऐसे प्रत्याशी को चुनना होगा, जो जनता के लिए कार्य करे, न कि स्वयं के लिए।
-पंचकुला से अंजू जुनेजा
हमारी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के समक्ष एक ज्वलंत प्रश्न उत्पन्न होता है कि तमाम योजनाओं को क्रियान्वित करने के बाद भी कुपोषण की स्थिति भयावह क्यों है? यह देश के भविष्य को अपनी जद में खींचता जा रहा है, इस पर काबू क्यों नहीं पाया जा सका है? कृषि के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर उत्पादन के बावजूद क्यों देश के नौनिहालों को उचित मात्रा में पोषक पदार्थ नहीं मिल पाता? देश के राजनेताओं की रूचि नीतियों के सफल संचालन में कम और अपनी राजनीतिक बिसात साधने में अधिक है।
दूसरी तरफ मध्यम वर्ग का एकमात्र राष्ट्रीय धर्म टैक्स देना और महंगाई को झेलना रह गया है। महंगाई के इस बढ़ते ग्राफ को नीचे लाने की जरूरत है, जिसके लिए हमें स्वयं ही प्रयास करना होगा। हमें ऐसे प्रत्याशी को चुनना होगा, जो जनता के लिए कार्य करे, न कि स्वयं के लिए।
-पंचकुला से अंजू जुनेजा