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Lebanon: अमेरिकी धमकियां कब तक बांधे रखेंगी ईरान के हाथ, इस्राइल को निशाना बना सकते हैं हूती और हिज्बुल्ला

Wed, 18 Sep 2024 10:07 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Wed, 18 Sep 2024 10:07 PM IST
सार

Lebanon: सीरिया और इराक के विद्रोही गुट, लेबनान में हिज्बुल्ला के लड़ाके और यमन के हूती विद्रोही, फलस्तीन का हमास ईरान के इशारे पर चल रहे हैं। ईरान इन आतंकी संगठनों के जरिए मध्य पूर्व एशिया में प्राॉक्सी युद्ध का योजनाकार माना जाता है। इस फ्रेमवर्क का गॉड फादर ईरान के अमेरिकी हमले में शहीद हुए मेजर जनरल सुलेमानी को माना जाता है। ईरान पिछले काफी समय से इस्राइल से बदला लेने के लिए बेताब है।

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Lebanon: How long will US threats keep Iran's hands tied, Houthi and Hezbollah can target Israel
पश्चिम एशिया में हिंसक संघर्ष - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

लेबनान में पेजर विस्फोट ने मध्य-पूर्व एशिया का तापमान फिर बढ़ा दिया है। इस बार ईरान अपने अंदाज में प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है। जबकि लेबनान का संगठन हिज्बुल्ला पेजर विस्फोट का बदला लेने की बात कह रहा है। भारत समेत दुनिया के देशों को इस घटनाक्रम पर हूती की सीमित प्रतिक्रिया सता रही है। माना जा रहा है कि इस हमले के बाद तेल अवीव (इस्राइल) जहां अधिक सर्तकता बरत रहा है, वहीं अमेरिका को मध्य-पूर्व एशिया में शांति बनाए रखने के लिए फिर ईरान को धमकाने वाली भाषा का सहारा लेना पड़ सकता है।

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वायु सेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह इस समय यूरोप की यात्रा पर हैं। बताते हैं लेबनान में पेजर विस्फोट की हलचल यूरोप में भी है। रूस के राष्ट्रपति के सचिवालय ने भी इस हमले को बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का कारण बताया है। दरअसल, लेबनान में पेजर विस्फोट ने इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद की तरफ शक की सुई को घुमा दिया है। अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने पहले इस तरह के किसी विस्फोट की जानकारी होने से किनारा कर लिया है। अमेरिका ने कहा कि वह इस बारे में जानकारी जुटा रहा है।
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क्या है खतरा?
सीरिया और इराक के विद्रोही गुट, लेबनान में हिज्बुल्ला के लड़ाके और यमन के हूती विद्रोही, फलस्तीन का हमास ईरान के इशारे पर चल रहे हैं। ईरान इन आतंकी संगठनों के जरिए मध्य पूर्व एशिया में प्राॉक्सी युद्ध का योजनाकार माना जाता है। इस फ्रेमवर्क का गॉड फादर ईरान के अमेरिकी हमले में शहीद हुए मेजर जनरल सुलेमानी को माना जाता है। ईरान पिछले काफी समय से इस्राइल से बदला लेने के लिए बेताब है। अंतरराष्ट्रीय मामले को जानकारों और सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान के पास अकेले इस्राइल से लड़कर पार पाने की क्षमता नहीं है। इसलिए ईरान की योजना इराक और सीरिया के विद्रोहियों, यमन के हूती संगठन, फलस्तीन के हमास, लेबनान में हिज्बुल्ला के लड़ाकों के साथ मिलकर बदला लेने की है। भारतीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों का मानना है कि ऐसा चौतरफा हमला इस्राइल की परेशानी बढ़ा सकता है। हालांकि इस्राइल की सुरक्षा में क्षेत्र में डटे अमेरिका ने इस बदला लेने वाली स्थिति को ईरान के हाथ बांधकर रोक रखा है। अमेरिका इसके लिए लगातार ईरान को धमका रहा है।
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मध्य पूर्व में  तैनात है अमेरिकी युद्धक बेड़ा
भूमध्य सागर में अमेरिका ने काफी बड़ा सैन्य जमावड़ा कर रखा है। यूएसएस अब्राहम लिंकन स्ट्राइक ग्रुप भूमध्य सागर में पहुंच चुका है। इस पर करीब 100 फाइटर जेट, हेलीकाप्टर, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, यूएवी, इंटेलीजेंस यूनिट, इलेक्ट्रानिक वॉर फेयर में सक्षम साजो सामान तैनात हैं। इसके अलावा क्षेत्र में दो विध्वंसक पोत लगातार हालात की निगरानी कर रहे हैं। परमाणु ईंधन से संचालित परमाणु पनडुब्बी भी भूमध्य सागर में किसी भी चुनौती से निपटने के लिए तैनात की गई हैं। ईरान में हमास के नेता इस्माइल हानिया की हत्या के बाद से ही अमेरिका ने क्षेत्र में सैन्य सर्तकता काफी बढ़ा दिया है। इसके अलावा अमेरिका के राजनयिक, सुरक्षा अधिकारी तथा कूटनीतिक वार्ताकार लगातार मध्य पूर्व के देशों का दौरा करके क्षेत्र में ईरान की धार को भोथरी करने की कोशिशों में जुटे हैं।

लेकिन इस्राइल है कि मानता नहीं.....कर देता है रह रहकर धमाका
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन चाहते हैं कि मध्य पूर्व एशिया में शांति बहाल हो जाए। इस्राइल का बाल भी बांका न हो। इसके लिए राष्ट्रपति बाइडन इस्राइल की रक्षा और ईरान को चेतावनी देने में जरा भी संकोच नहीं करते। लेकिन इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद और उसके सुरक्षा बल कोई न कोई बड़ा धमाका कर देते हैं। मोसाद के कई अभियानों ने ईरान की राष्ट्रीय संप्रभुता को तार-तार किया है। हमास के पॉलिटिकल ब्यूरो के प्रमुख इस्माइल हानिया को भी इस्राइल के सूत्रधारों ने निशाने पर ले लिया था। हानिया को मारने के लिए उपयोग में लाई गई तकनीक और पूरा अभियान हतप्रभ कर देने वाला है। इससे पहले मोसाद ईरान में वैज्ञानिकों पर हमले, परमाणु संयंत्र में हमले समेत तमाम बड़े अभियानों को अंजाम दे चुका है। ईरान के परमाणु वैज्ञानिक मोहसेन फखरीजादेह पर हमला भी मोसाद की ईरान में घुसपैठ को बताने के लिए काफी है।



ईरान के पीछे क्यों पड़े हैं अमेरिका और इस्राइल
मध्य पूर्व एशिया के देशों में ईरान अपनी अलग पहचान रखता है। इसका एक कारण इसकी भू-राजनीतिक स्थिति है। ईरान में ईंधन तेल, खनिज, गैस का अथाह भंडार है। इसके समानांतर ईरान के पास इसके प्रचुर उपयोग की तकनीक नहीं है। तकनीक के मामले में अमेरिका और इस्राइल का कोई सानी नहीं है। ईरान की सीमा इराक, सीरिया, तुर्की, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से मिलती है। एक तरफ से कह सकते हैं कि मध्य पूर्व में ईरान दुनिया के एक बड़े खजाने के ढेर पर बैठा है। मध्य पूर्व एशिया में ईरान ही एक मात्र ऐसा देश बचा है जो अमेरिका को सीधे चुनौती देता है। इस्राइल से बदला लेने के लिए बेताब है। अमेरिका और इस्राइल इसके लिए सीधे तौर पर ईरान पर हमला करने से बचते हैं। लेकिन एक बड़ा प्रॉक्सी युद्ध चल रहा है। इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद के एजेंट के बारे में कहा जाता है कि वह पूरे ईरान में फैले हैं। अमेरिका, इस्राइल के प्रॉक्सी युद्ध के जवाब में ईरान ने भी इराक, सीरिया, लेबनान, यमन, फलस्तीन में प्रॉक्सी युद्ध का नेटवर्क खड़ा कर रखा है। लाल सागर में हूती विद्रोही लगातार खतरा बने रहते हैं। इस्राइल को हमास, हिज्बुल्ला लगातार अपने हमले से सिरदर्द देते रहते हैं।

अमेरिका, इस्राइल के अलावा कौन है इस क्षेत्र में बड़ा खिलाड़ी
अमेरिका, इस्राइल का मध्य पूर्व एशिया में प्रॉक्सी युद्ध इस समय तुर्की को अखर रहा है। इसके अलावा, चीन की नजर भी इस क्षेत्र के ऊर्जा सुरक्षा के अथाह भंडार पर टिकी है। चीन इस क्षेत्र से अंतरराष्ट्रीय बाजार के अपने हित जोड़ता है। रूस, अजरबैजान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से ईरान की सीमा जुड़ी होने के कारण राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी अपने राष्ट्रीय हित देखते हैं। यही वजह है कि अमेरिका के तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को थोपे जाने के बाद भी रूस ईरान से संबंध को दांव पर नहीं लगाता। रूस के यूक्रेन में सैन्य संघर्ष के दौरान ईरान भी रूस की खुलकर सहायता कर रहा है। लेबनान में पेजर विस्फोट के बाद रूस के राष्ट्रपति के सचिवालय से आए बयान को भी इससे जोड़कर देखा और महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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