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Judicial Activism : ज्यूडिशियल एक्टिविज्म कानून मंत्री रिजिजू बोले- न्यायपालिका भटके तो सुधार का कोई उपाय नहीं

Tue, 18 Oct 2022 12:24 AM IST
योगेश साहू एएनआई, अहमदाबाद।
एएनआई, अहमदाबाद। Published by: योगेश साहू Updated Tue, 18 Oct 2022 12:24 AM IST
सार

Judicial Activism : कानून मंत्री किरने रिजिजू ने कहा कि हमारे पास विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ये तीन स्तंभ हैं... मुझे लगता है कि कार्यपालिका और विधायिका अपने कर्तव्यों में बंधे हैं और न्यायपालिका उन्हें सुधारती है।

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law minister kiren rijiju said no way to bind or Improve judiciary, judicial activism, judiciary goes astray
किरेन रिजिजू - फोटो : ANI

विस्तार

Judicial Activism : विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ये भारत में लोकतंत्र के तीन स्तंभ हैं। कार्यपालिका और विधायिका अपने कर्तव्यों में बंधे हैं और न्यायपालिका उन्हें सुधारती है। लेकिन जब न्यायपालिका भटक जाती है तो उन्हें सुधारने का कोई उपाय नहीं है। यह बात देश के कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने सोमवार को अहमदाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में कही। 

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केंद्रीय कानून मंत्री रिजिजू ने कहा कि जब न्यायपालिका को नियंत्रित करने का कोई तरीका नहीं होता है, तो 'ज्यूडिशियल एक्टिविज्म' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। कई न्यायाधीश मामलों पर टिप्पणियां करते हैं, जो कभी भी उनके दिए गए निर्णय का हिस्सा नहीं होती हैं... एक न्यायाधीश के रूप में आप व्यावहारिक कठिनाइयों, वित्तीय सीमाओं को नहीं जानते हैं। यह टिप्पणियां एक तरीके से उनकी सोच उजागर करती हैं।
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उन्होंने कहा कि हमारे पास विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका ये तीन स्तंभ हैं... मुझे लगता है कि कार्यपालिका और विधायिका अपने कर्तव्यों में बंधे हैं और न्यायपालिका उन्हें सुधारती है। लेकिन मुद्दा यह है कि जब न्यायपालिका भटक जाती है, तो उन्हें सुधारने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है।

न्यायपालिका में मतभेद-गुटबाजी पारदर्शिता भी नहीं : कानून मंत्री
देश के कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने न्यायपालिका में मतभेदों को उजागर करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति करने वाले कॉलेजियम में गुटबाजी होती है। इसमें पारदर्शिता भी नहीं है। कॉलेजियम प्रणाली की वजह से न्याय करने के बदले हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश आधा समय इसी में व्यस्त रहते हैं कि किसे जज बनाएं।

रिजिजू सोमवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पत्रिका पांचजन्य के ‘साबरमती संवाद’ में बोल रहे थे। उन्होंने कहा, संविधान देश का सबसे पवित्र दस्तावेज है। कार्यपालिका व विधायिका रास्ते से भटकते हैं, तो न्यायपालिका इसी से उसे सुधारती है। पर, न्यायपालिका भटकती है, तो उसे सुधारने की व्यवस्था नहीं है। हमारा लोकतंत्र जीवंत है, इसमें कई बार तुष्टीकरण की राजनीति भी होती है। कोई दल नहीं चाहता कि वह न्यायपालिका के खिलाफ दिखे।

सांसदों के लिए एथिक्स कमेटी, जजों के लिए नहीं
रिजिजू ने कहा, सांसद व जज, दोनों के पास विशेषाधिकार होते हैं। लेकिन संसद में एथिक्स कमेटी या स्पीकर किसी सांसद के असंसदीय शब्दों को कार्यवाही से हटाते हैं, उसकी निंदा होती है। प्रेस पर भी प्रेस काउंसिल नजर रखती है। पर, न्यायपालिका जब कोई ऐसा निर्णय दे, जो समाज के अनुकूल नहीं है, तो इसे देखने की कोई अंदरूनी व्यवस्था नहीं है।

जज ही जज की नियुक्ति करें, ऐसा विश्व में कहीं नहीं
जज ही अपनी बिरादरी के जजों की नियुक्ति करें, ऐसी व्यवस्था विश्व में कहीं नहीं है। राजनीति में जो उथल पुथल होती है, वह तो सभी को दिखती है, लेकिन जजों की नियुक्ति में जो उथल-पुथल हो रही है, वह किसी को नहीं दिख पा रही। -किरेन रिजिजू


अंकल जज सिंड्रोम : परिवार, परिचित, करीबी ही बनते हैं जज
रिजिजू ने ‘अंकल जज सिंड्राेम’ का खुलकर उल्लेख किया। कहा, जज भी उसी को जज चुनते हैं, जिसे वे जानते हैं। यह नैसर्गिक है। इसमें आश्चर्य क्या? आप उसे थोड़े ही चुनेंगे, जिसे नहीं जानते। जज के लिए करीबी, परिवार के लोगों, जानने वालों में से नाम की सिफारिश व चयन होता है। जज बनाने के लिए मेरे पास जो टिप्पणियां आती हैं, उसमें जज खुलकर लिखते हैं, मैं इसे जानता हूं, वो मेरी कोर्ट में आते हैं, इसका चरित्र अच्छा है, इसके काम से मैं खुश हूं।

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