साथ-साथ चुनाव हों, मगर नागरिकों के अधिकारों के साथ समझौता न हो : विधि आयोग
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
देश में एक राष्ट्र, एक चुनाव या साथ-साथ चुनाव कराने की बहस के जोर पकड़ने के बीच गुरुवार को विधि आयोग ने इस विषय पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। 171 पन्नों की रिपोर्ट में आयोग ने साफ तौर पर कहा है कि साथ-साथ चुनाव कराने में कोई संवैधानिक दिक्कत नहीं हैं।
बशर्ते, इस प्रक्रिया में किसी भी तरह से नागरिकों के अधिकारों के साथ कोई समझौता न हो। विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में चाणक्य द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ की पंक्तियों का हवाला दिया है। आयोग ने लिखा है... प्रजासुखेसुखम राज्ञ: प्रजानांतुहितेहितम...
ध्यान रहे कि लोकतंत्र में निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव प्रभावित न हो- विधि आयोग
विधि आयोग का कहना है कि सरकार भले ही लोकसभा-विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए, लेकिन उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र में निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव की परिभाषा दूषित न हो। हर लिहाज से इस अवधारणा को बनाए रखना होगा। वोट देना और चुनाव लड़ना, ये संवैधानिक अधिकार हैं, इन्हें बनाए रखना होगा।
अगर यह सब हो पाता है तो साथ-साथ चुनाव कराने में कोई बुराई नहीं है। आयोग ने यह भी साफ कर दिया है कि इस प्रक्रिया से संविधान के ढांचे पर कोई असर नहीं पड़ेगा। जनता में यह भ्रांति है कि अगर यह हुआ तो संवैधानिक ढांचा चरमरा जाएगा, हालाँकि ऐसा नहीं है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि संघात्मक ढांचा पहले की भांति मजबूत रहे। संविधान की सातवीं अनुसूची में तीनों सूचियां केंद्र, राज्य एवं समवर्ती सूची पर असर न हो।
विधि आयोग ने सरकार से सवाल भी किए हैं
- साथ साथ चुनाव कराने से कौन कौन से बड़े बदलाव संभावित हैं
- इस विषय पर मीडिया में जमकर आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चलेगा, इससे सरकार कैसे निपटेगी।हालांकि इस सवाल का जवाब भी आयोग ने खुद ही यह कर दे दिया कि एक बार नियम बनने के बाद ये सवाल खुद-ब-खुद शांत हो जाएंगे।
- जो भी नियम बने, उनका संवैधानिक आधार बरकरार रखने की चुनौती सरकार ले सकेगी या नहीं
- क्या केंद्र सरकार और राज्य सरकारें स्थायी रह सकेंगी, इसका जवाब तो हमारे संवैधानिक आधारभूत ढांचे में ही मौजूद है
- संसद या विधानसभा का तय कार्यकाल, क्या सरकार इस बाबत यह भरोसा दिला सकेगी कि इस राह में कोई दिक्कत नहीं आएगी।
- राष्ट्रपति, राज्यपाल और स्पीकर की भूमिका बढ़ जाएगी।विकट हालात में इन्हें नियमानुसार फ़ैसला लेना होगा।
- यह सवाल भी उठ रहा है कि बजट पर हार से मध्यावति चुनाव को कैसे टाला जाए, जवाब है किे पार्टियों की आपसी सहमति से यह सम्भव हो सकता है।
नीति आयोग और राष्ट्रपति के भाषण का जिक्र...
विधि आयोग का कहना है कि जनवरी 2017 में नीति आयोग ने एक पेपर तैयार किया था '...साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया का विश्लेषण: क्या, क्यों और कैसे...' इस पेपर में कहा गया था कि ये सम्भव है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 26 जनवरी 2017 को कहा था कि आजादी के बाद साथ साथ चुनाव कराने के लिए अब एक रचनात्मक बहस की जरूरत है।
इस दिशा में चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियों से बात कर कोई सर्वमान्य हल निकाल सकता है। वर्तमान राष्ट्रपति राम नाथ कोबिंद ने संसद के संयुक्त सत्र में कहा था कि मेरी सरकार लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराने के विषय पर एक रचनात्मक बहस का स्वागत करेगी।