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कुरुक्षेत्र: भ्रष्टाचार बनाम सियासी अत्याचार, मोदी बनाम मुद्दों पर सिमटता जा रहा है चुनाव

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Mon, 08 Apr 2024 06:08 PM IST
सार

2019 में चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए से अलग राह पकड़ी और उन्होंने कांग्रेस के साथ समझौता करके चुनाव लड़ा।लेकिन कामयाबी वाईएसआर कांग्रेस को मिली।भाजपा को तब इस दक्षिणी राज्य में एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली और उसका मत प्रतिशत भी कोई उल्लेखनीय नहीं था।  

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Kurukshetra: Lok Sabha Election is being reduced to like corruption and political atrocities, Modi vs issues
कुरुक्षेत्र। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों के नामांकन शुरु हो चुके हैं और साथ ही 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए होने वाली खेमेबंदी लगभग पूरी हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ताधारी एनडीए गठबंधन में विपक्षी इंडिया गठबंधन के दो क्षत्रप नीतीश कुमार और जयंत चौधरी के शामिल होने के साथ भाजपा को भरोसा है कि बिहार और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने सियासी किले सेंधमारी का जो खतरा था, उसे रोकने में पार्टी को कामयाबी मिल गई। उधर नीतीश और जयंत के पाला बदल से लडखड़ाया इंडिया गठबंधन शुरुआती झटकों के बाद अब फिर खड़ा होकर मैदान में मुकाबले के लिए डट गया है। आम आदमी पार्टी के सांसद और जुझारू नेता संजय सिंह की जमानत होने और उनके जेल से बाहर आने से भी विपक्ष को राहत और नई ताकत मिली है। इसी दौरान कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र जिसे पार्टी ने न्याय पत्र का नाम दिया है, अपने पांच न्याय के जरिए 25 गारंटियों के वादे के साथ जनता के सामने नए सपने रखे हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गारंटियों का जवाब माना जा सकता है।

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारियों ने विपक्षी गठबंधन के घटक दलों जो कुछ दिनों तक आपस में ही सिर फुटौव्वल में जुटे थे, को एकजुट कर दिया है। इसका सबसे बड़ा सबूत और संकेत 31 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई इंडिया गठबंधन की सफल रैली है। इस रैली में इंडिया गठबंधन के सभी नेताओं ने सरकार पर विपक्ष पर अत्याचार और प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए कहा कि सत्तारूढ़ भाजपा एकतरफा चुनाव चाहती है। इसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के मेरठ में अपनी पहली चुनावी रैली में विपक्षी नेताओं को निशाने पर लेते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम जारी रहेगी और कोई भी भ्रष्टाचारी बचेगा नहीं। इस तरह दोनों ही खेमों ने लोकसभा चुनाव के अपने अपने केंद्रीय मुद्दे तय कर लिए हैं। जहां सत्ता पक्ष विपक्षी नेताओं को भ्रष्टाचारी बताते हुए उनके कथित भ्रष्टाचार को केंद्रीय मुद्दा बना रहा है तो वहीं विपक्षी गठबंधन अपने नेताओं के खिलाफ होने वाली ईडी सीबीआई आयकर कार्रवाई और गिरफ्तारियों को विपक्ष पर सरकार के कथित अत्याचार को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाकर जनता की सहानुभूति जुटाने की कोशिश में जुट गया है। जेल से बाहर आते ही जिस तरह आप नेता संजय सिंह सक्रिय हुए हैं और उन्होंने मीडिया के जरिए भाजपा और मोदी सरकार पर हमले तेज कर दिए हैं,उससे साफ जाहिर है कि जैसे जैसे चुनाव आगे बढेगा विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच लड़ाई और धारदार होती जाएगी।
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चुनाव आते ही नेताओं का दल बदलना आम बात है। लेकिन इस बार कांग्रेस के नेताओं का एक के बाद एक भाजपा में जाना सत्ता पक्ष की एक सुनियोजित रणनीति है। इसीलिए मध्य प्रदेश वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी, बाक्सर विजेंद्र सिंह, प्रखर प्रवक्ता गौरव वल्लभ और संजय निरुपम जैसे नेताओं का पार्टी से अलग होना और ज्यादातर का भाजपा में शामिल होना कांग्रेस को असहज तो करता ही है, लेकिन कांग्रेस ने भी भाजपा के तीन निवर्तमान सांसदों और अन्य कुछ महत्वपूर्ण नेताओं को कांग्रेस में शामिल करके जवाब देने की कोशिश की है।एनडीए और इंडिया गठबंधनों में शुरुआती खींचतान के बाद राज्यों में सीटों का बंटवारा लगभग हो गया है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश बिहार में अपने सहयोगी दलों के साथ सीटें बांट ली हैं तो कांग्रेस ने भी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, तमिलनाडु, झारखंड में अपने सहयोगी दलों के साथ सीटों के बंटवारे पर सहमति बना ली है, लेकिन महाराष्ट्र में अभी दोनों ही गठबंधनों के सामने सीट बंटवारे में पेंच हैं। नीतीश कुमार और जयंत चौधरी के जाने से इंडिया गठबंधन को जो झटका लगा था, उससे अब वह उबर चुका है क्योंकि इनके अलावा कोई और बडा सहयोगी गठबंधन से बाहर नहीं गया। यहां तक कि प.बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने वाली तृणमूल कांग्रेस ने भी खुद को इंडिया गठबंधन से अलग नहीं किया और न ही केरल व पंजाब में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ रहे वाम मोर्चे और आम आदमी पार्टी भी इंडिया गठबंधन में बने हुए हैं। इसका सबूत 31 मार्च को रामलीला मैदान में हुई विपक्ष की रैली में इंडिया गठबंधन के सभी घटक दलों के नेताओं का शामिल होना है। इस रैली ने विपक्ष को हौसला और हिम्मत दोनों दी है, लेकिन चुनाव प्रचार में भाजपा विपक्ष के मुकाबले खासी आगे है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, प.बंगाल, गुजरात, मघ्य प्रदेश के साथ साथ दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक के तूफानी दौरे लगातार कर रहे हैं।
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भाजपा की पूरी कोशिश है कि 2019 के चुनावों में जिन राज्यों में उसने शानदार प्रदर्शन किया था, उसे वह बरकरार रखते हुए उन राज्यों में जहां पिछली बार उसे कामयाबी नहीं मिली थी, वहां अपनी सीटों में इजाफा करे। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, झारखंड,प.बंगाल, उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, और पूर्वोत्तर के राज्यों तथा दक्षिण में कर्नाटक में भाजपा ने बेहतरीन प्रदर्शन किया था। उसके सामने इन राज्यों में पिछला प्रदर्शन बनाए रखने की चुनौती है। जबकि तमिलनाडु,केरल, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, तेलंगाना जैसे राज्यों में उसे अपनी सीटें बढ़ानी होंगी तब ही वह अपने घोषित लक्ष्य 370 के आसपास पहुंच सकेगी और एनडीए के चार सौ पार का नारा भी तभी फलीभूत हो सकता है जब भाजपा नीत एनडीए कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कोहिमा तक अपना परचम फहराए। इसलिए भाजपा का पूरा ध्यान दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु आंध्र प्रदेश केरल और तेलंगाना पर है। आंध्र प्रदेश में भाजपा ने पुरानी सहयोगी तेलुगू देशम के साथ चुनावी समझौता कर लिया है।

2019 में चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए से अलग राह पकड़ी और उन्होंने कांग्रेस के साथ समझौता करके चुनाव लड़ा।लेकिन कामयाबी वाईएसआर कांग्रेस को मिली। भाजपा को तब इस दक्षिणी राज्य में एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली और उसका मत प्रतिशत भी कोई उल्लेखनीय नहीं था। जबकि तेलंगाना में भाजपा के चार सांसद जीते थे। भाजपा की कोशिश चंद्रबाबू नायडू की मदद से आंध्र में लोकसभा की कुछ सीटें जीतने और तेलंगाना में अपनी सीटें बढ़ाने पर है। इसी तरह केरल में भाजपा मोदी के नाम और कुछ नामी गिरामी चेहरों को मैदान में उतारकर कुछ कमाल करना चाहती है। धुर दक्षिण के इस राज्य में भाजपा का मत प्रतिशत तो बढ़ सकता है लेकिन कोई सीट पार्टी जीत सकती है इसकी संभावना बेहद कम है। तमिलनाडु में पहली बार भाजपा अपने दम और कुछ आंचलिक दलों के साथ चुनाव मैदान में है। लंबे समय तक एनडीए में उसकी सहयोगी रही अन्ना द्रमुक के साथ इस बार उसका गठबंधन नहीं है। भाजपा के बेहद मुखर प्रदेश अध्यक्ष अन्ना मलाई की तेजी अन्ना द्रमुक को रास नहीं आ रही थी और जब उन्होंने द्रविड़ राजनीति के संस्थापक नेताओं के खिलाफ बयानबाजी की तो अन्ना द्रमुक जो पहले से ही सनातन को लेकर भाजपा की आक्रामक लाईन से असहज थी, ने एनडीए से नाता तोड़ लिया। तमिलनाडु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे पर लंबे समय से है।

इसीलिए जब दिल्ली में नए संसद भवन के शीर्ष पर अशोक चिन्ह स्थापित किया गया तो उस समारोह का अनुष्ठान दक्षिण भारत (तमिलनाडु) के आचार्यों ने संपन्न कराया। अपने संसदीय क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी ने काशी तमिल संगम का आयोजन करके भी तमिलनाडु को संबोधित किया। फिर संसद के नए भवन में तमिल गौरव के प्रतीक चोल साम्राज्य के राजेंद्र चोल के राजदंड सेंगोल को तमिल संतो की उपस्थिति में स्थापित किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से पहले रामेश्वरम से लेकर दक्षिण भारत के अनेक मंदिरों में दर्शन पूजन अर्चन करना भी दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु की जनभावनाओं को संतुष्ट करना था। हाल ही में अन्ना मलाई द्वारा सूचना अधिकार कानून के तहत निकलवाई गई जानकारी कि किस तरह 1974-75 में इंदिरा गांधी की सरकार ने कच्चाईतिवू द्वीप को श्रीलंका को सौप दिया, को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश भी प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा कर रही है। प्रधानमंत्री इसे भाजपा के राष्ट्रवादी एजेंडे से जोड़ कर कांग्रेस के साथ साथ तत्कालीन द्रमुक सरकार को भी जिम्मेदार ठहरा कर द्रमुक को भी घेर रहे हैं। हालांकि द्रमुक नेताओं ने इसका करारा जवाब देते हुए सवाल किया है कि मोदी के लिए अगर यह मुद्दा इतना अहम है तो पिछले दस साल से उनकी सरकार ने कच्चाईतिवू वापस लेने के लिए क्या किया। कांग्रेस ने भी कच्चाईतिवू के बदले भारत को हजारों समुद्री मील में मिले मछली शिकार अधिकार का हवाला देकर 2015 में इस मामले में आरटीआई के तहत विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी भी साझा करके जवाब दिया है।साथ ही कांग्रेस ने 2015 में भारत द्वारा बांग्लादेश को सीमा विवाद समाधान के लिए 50 एन्क्लेव के बदले 150 एन्क्लेव देने का मुद्दा भी उठाया है।

कुल मिलाकर कच्चाईतिवू का मुद्दा वैसा जोर नहीं पकड़ सका जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी को उम्मीद थी। इसलिए भाजपा को राष्ट्रवाद के मुद्दे से फिर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लौटना पड़ा है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो कि भाजपा के सुपर स्टार प्रचारक हैं और जिनकी लोकप्रियता और विश्वसनीयता भाजपा व एनडीए की सबसे बड़ी ताकत है, अपने हर भाषण में विपक्षी नेताओं को भ्रष्टाचारी बताते हुए कह रहे हैं कि वह जनता के पैसों की लूट का पूरा हिसाब लेंगे और किसी भ्रष्टाचारी को छोड़ेंगे नहीं। यह पहली बार है कि कोई सरकार विपक्ष पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है, वरना हमेशा हर चुनाव में सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन चुनाव बांड को अवैधानिक बताने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले और इनके जरिए हुए हजारों करोड़ रुपए के लेनदेन की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक नया हथियार मिल गया है। हालांकि भाजपा इसे यह कहकर चुनाव बांड का पैसा सबने लिया है, अपने ऊपर होने वाले हमलों की धार कुंद कर रही है, लेकिन विपक्ष ने चुनावी बांड के जरिए भाजपा को मिले चंदे के बदले चंदा देने वालों को दी गई राहत और लाभ का मुद्दा उठाकर सरकार को घेर रहा है। साथ ही विपक्ष लगातार भाजपा नेताओं और भाजपा के साथ आने वाले नेताओं के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को गिनाते हुए प्रधानमंत्री मोदी के तीखे हमलों का जवाब देने की कोशिश कर रहा है।इस घमासान से भ्रष्टाचार का मुद्दा चुनाव में केंद्रीय मुद्दा बनने की बजाय आरोप प्रत्यारोप का दलदल बन कर रह गया है।


इधर कांग्रेस ने बेहद महत्वाकांक्षी घोषणापत्र जारी किया जिसमें अपनी सरकार बनने पर पांच न्याय के तहत 25 गारंटियों के जरिए अनेक लोकलुभावन घोषणाएं की गई हैं। लेकिन कांग्रेस के घोषणा पत्र पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीधा हमला बोलते हुए इसपर आजादी के पहले वाली मुस्लिम लीग की छाप बताया है। इससे तिलमिलाई कांग्रेस ने भी जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी और मुस्लिम लीग के रिश्तों का इतिहास गिना दिया है। जिस तरह सत्ताधारी एनडीए गठबंधन का पूरा दारोमदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धुआंधार प्रचार पर केंद्रित होता जा रहा है, जबकि विपक्षी इंडिया गठबंधन व्यक्ति से ज्यादा मुद्दों पर जोर दे रहा है,उससे 2024 का लोकसभा चुनाव धीरे धीरे मोदी बनाम मुद्दे बनता जा रहा है। सत्ता पक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, विश्वसनीयता, उनकी वैश्विक छवि, भारत को विश्वगुरु बनाने और भारतीय अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर की करते हुए विश्व में तीसरे नंबर पर लाने का मोदी का सपना और मजबूत नेतृत्व पर विपक्ष को घेर रहा है तो वहीं विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की दशा, महिला सुरक्षा, जातीय जनगणना,अग्निवीर आदि मुद्दों को आगे करके सरकार पर हमलावर है।अब नतीजे बताएंगे कि जनता ने मोदी का चेहरा स्वीकार किया या फिर मोदी पर विपक्ष के मुद्दे भारी पड़े।

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