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Bihar Election: मुद्दों की धार और नेताओं के तेज की कसौटी बनेगा बिहार चुनाव; कुरुक्षेत्र में पढ़िए सारे समीकरण

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Sun, 13 Jul 2025 03:25 PM IST
सार

लोकतंत्र में हर मुद्दे की कसौटी जनता का फैसला है और इसी साल अक्तूबर नवंबर में बिहार विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। यानी चाहे ऑपरेशन सिंदूर हो या मतदाता सूची के पुनरीक्षण का चुनाव आयोग का विशेष अभियान दोनों को बिहार की जनता की अदालत की कसौटी पर ही कसा जाएगा।

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Kurukshetra: Bihar elections will be test of sharpness of issues and sharpness of leaders Know all equations
बिहार चुनाव से पहले सियासी घमासान - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

ऑपरेशन सिंदूर की गर्मी अभी पूरी तरह ठंडी नहीं हुई है और बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष अभियान (एसआईआर) से पैदा हुआ विवाद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। बिहार में जैसे जैसे चुनाव का वक्त नजदीक आ रहा है, सड़क से लेकर मीडिया तक सियासी घमासान तेज हो गया है। मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के विशेष अभियान को लेकर विपक्ष सड़कों पर है और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग की कवायद पर रोक लगाने की बजाय उसे सलाह दी है कि वह आधार कार्ड राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्रों को भी उन जरूरी दस्तावेजों में शामिल करने पर विचार करे जो मतदाता सूची में नाम आने के लिए जरूरी हैं। न्यायालय ने सुनवाई की अगली तारीख 28 जुलाई तय की है, जबकि चुनाव आयोग मतदाता फॉर्म जमा करने का काम 25 जुलाई तक पूरा कर लेगा। अदालत के रुख को दोनों ही पक्ष अपनी अपनी जीत बता रहे हैं।

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लोकतंत्र में हर मुद्दे की कसौटी जनता का फैसला है और इसी साल अक्तूबर नवंबर में बिहार विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। यानी चाहे ऑपरेशन सिंदूर हो या मतदाता सूची के पुनरीक्षण का चुनाव आयोग का विशेष अभियान दोनों को बिहार की जनता की अदालत की कसौटी पर ही कसा जाएगा। बिहार चुनाव में क्षेत्रीय और स्थानीय मुद्दों के अलावा जो ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दे होंगे, उनमें ये तीनों मुद्दे सबसे प्रमुख होंगे। पहलगाम की आतंकवादी हिंसा के बाद पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर किए गए भारतीय वायुसेना के हमलों और उसके बाद अचानक हुए संघर्ष विराम को देश के जनमानस ने किस रूप में लिया है बिहार चुनाव का नतीजा इसका संकेत होगा। क्योंकि पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा की गई निर्दोष पर्यटकों की हत्या के तत्काल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली जनसभा बिहार में ही की थी, जिसमें उन्होंने घोषणा की थी कि इस हमले के दोषी दुनिया के किसी भी कोने में छिपे हों उन्हें छोड़ा नहीं जाएगा और ऐसी सजा दी जाएगी कि उनकी रूह कांपेगी।
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ऑपरेशन सिंदूर की कामयाबी को भाजपा और एनडीए प्रधानमंत्री के इस संकल्प के पूरा होने का दावा कर सकते हैं और करेंगे भी। लेकिन विपक्ष यानी कांग्रेस राजद वामदलों का महागठबंधन सेना की शानदार कामयाबी के बाद अचानक युद्धविराम क्यों हुआ और क्या भारत ने ऐसा अमेरिका के दबाव में किया जैसा कि दावा राष्ट्रपति ट्रंप लगातार कर रहे हैं और इस लड़ाई में भारत का भी क्या नुकसान हुआ, इसे मुद्दा बना एक सत्ता पक्ष को घेरेंगे। जहां भाजपा जद(यू) लोजपा और हम के गठबंधन वाला सत्ताधारी एनडीए विपक्ष के आरोपों को पाकिस्तान की भाषा कह कर कठघरे में खड़ा करेंगे, वहीं विपक्ष ट्रंप के बयानों, सिंगापुर में सीडीएस के बयान और इंडोनेशिया में भारतीय नौसेना के कैप्टन के बयान का हवाला देकर सरकार पर हमला करेगा। अब जनता दोनों पक्षों के आरोप प्रत्यारोपों को कैसे लेती है इसका संकेत चुनाव नतीजे देंगे।
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दूसरा बड़ा मुद्दा बिहार में चुनाव आयोग के मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान एसआईआर है। ये ऐसा मुद्दा है जो अगर पूरी तरह अमल में आ गया तो भी चुनाव को प्रभावित करेगा और अगर अमल में नहीं आ सका तो भी इसका असर चुनाव पर पड़ेगा। अमल में आने पर जिनके नाम मतदाता सूची से बाहर होंगे, उन्हें लेकर विपक्ष चुनावी मुद्दा बनाएगा और अगर अमल में कोई कमी रह गई तो विपक्ष इसे अपनी जीत के रूप में प्रचारित करके उसका चुनावी लाभ लेने की कोशिश करेगा। वहीं सत्ता पक्ष इस अभियान को फर्जी मतदाताओं और घुसपैठियों के खिलाफ एक शुद्धीकरण अभियान बताकर इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगा। अभी जब यह अभियान 25 जुलाई तक पूरा होने जा रहा है और सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाने इनकार करते हुए मतदाताओं की पहचान के लिए मांगे जाने वाले 11 दस्तावेजों के साथ आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को भी शामिल करने की सलाह चुनाव आयोग को दी है।

अब ये चुनाव आयोग पर है कि वह इन्हें शामिल करता है या नहीं। अगर आयोग ने इन्हें शामिल कर लिया तो काफी हद तक विपक्ष का यह आरोप कि इस अभियान से करीब पौने दो करोड़ लोग मतदाता सूची से बाहर हो जाएंगे जो उनके मताधिकार की खुली अवहेलना होगी, भोथरा हो जाएगा बल्कि तब ज्यादा लोगों के मतदाता सूची से बाहर होने की आशंका भी खत्म हो जाएगी। विपक्ष इसे अपनी जीत के रूप में प्रचारित कर सकता है। लेकिन अगर चुनाव आयोग ने इसे नहीं माना तो विपक्ष उसकी सत्तापक्ष से साठगांठ का आरोप लगाते हुए इसे सर्वोच्च न्यायालय के अपमान का भी मुद्दा बनाएगा। इसे भी बिहार की जनता किस रूप में लेगी इसका पता चुनाव नतीजों से ही लगेगा। क्या चुनाव आयोग का विशेष अभियान बिहार में मतदाताओं के कथित फर्जीवाड़े को रोककर पारदर्शी चुनाव कराएगा जिसका फायदा क्या सत्ता पक्ष को मिल सकता है या इसे लेकर होने वाली परेशानी बिहार में एक नया मुद्दा बनकर विपक्ष की राह आसान करेगी।

बिहार चुनाव का तीसरा बड़ा मुद्दा खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं।उनके स्वास्थ्य को लेकर चलने वाली चर्चाओं के साथ ही उनकी उम्र और लंबी पारी भी एक मुद्दा है। नीतीश कुमार करीब 20 साल से बिहार की सत्ता पर काबिज हैं। बीच के एक छोटे काल खंड को छोड़कर भाजपा उनके साथ सत्ता में साझीदार रही है। नीतीश कुमार और भाजपा हर चुनाव में लालू राज के जंगल राज की याद दिलाकर बिहार की जनता का भयादोहन करती रही है, लेकिन इधर जिस तरह बिहार में अचानक अपराधों हत्या लूट आदि में तेजी आई है और उसे लेकर खुद भाजपा के नेता तक परेशान हैं। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान तो खुलकर कानून व्यवस्था पर चिंता जताने लगे हैं। जबकि उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा पुलिस तंत्र को इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं और दूसरे उपमुख्यमंत्री नित्यानंद राय इसका दोष रेत माफिया और शराब माफिया पर मढ़ रहे हैं। उधर राजद ने कानून व्यवस्था को लेकर सीधे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को घेरा है।

कुल मिलाकर नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव में जाना भाजपा की मजबूरी भी है और समस्या भी। सरकार की हर नाकामी की जिम्मेदारी जद(यू) के साथ भाजपा की भी है और अगर राज्य की कानून व्यवस्था का यही हाल रहा तो हर बार की तरह एनडीए का जंगल राज वाला ब्रह्मास्त्र इस बार कमजोर हो सकता है। दूसरा बड़ा सवाल है कि सीट बंटवारे में जद(यू) सौ से कम सीटें नहीं लड़ेगा और अगर उसके जीत का स्ट्राईक रेट पिछली बार से भी कम रह गया तो एनडीए को बहुमत का आंकड़ा पाना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि भाजपा भी सौ से ज्यादा सीटें नहीं लड़ पाएगी। बाकी 43 सीटें चिराग पासवान जीतनराम मांझी उपेंद्र कुशवाहा के दलों के बीच बंटेगीं। ऐसे में अगर विधानसभा त्रिशंकु हो गई तो भले ही तोड़ फोड़ करके एनडीए सरकार बना ले, लेकिन यह उसकी नैतिक हार होगी।

सवाल यह भी है कि चुनाव के बाद सरकार बनने की स्थिति में क्या एनडीए फिर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाएगा या महाराष्ट्र की तरह चुनाव तो उनके नेतृत्व में लड़ेगा, लेकिन बाद में अपने किसी विधायक को मुख्यमंत्री भाजपा बनाएगी। ये सारे सवाल विपक्ष की तरफ से एनडीए पर दागे जाने शुरु हो गए हैं और इन्हें लेकर फिलहाल भाजपा जद(यू) बचाव की मुद्रा में हैं। हालांकि, अभी चुनाव में तीन से चार महीने का समय है और एनडीए को प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे से बड़ी उम्मीद है कि वह आखिर में बिहार का परिदृश्य बदल सकते हैं।


वहीं विपक्ष राजद कांग्रेस वाम गठबंधन में भी तेजस्वी की आक्रामकता राहुल गांधी का सामाजिक न्याय और वाम दलों की संगठन की ताकत की भी परीक्षा होगी, क्योंकि जहां राजद ने तेजस्वी को अपना चेहरा घोषित कर रखा है, वहीं कांग्रेस ये तो कह रही है कि गठबंधन के नेता तेजस्वी हैं, लेकिन सरकार बनने पर मुख्यमंत्री का फैसला चुनाव बाद होगा। उधर राहुल गांधी लगातार अपने संविधान बचाओ सम्मेलनों के जरिए सामाजिक न्याय के अपने नारे को बुलंद कर रहे हैं और कांग्रेस की कोशिश दलित और ईबीसी मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की है। मुसलमानों का बहुमत को इंडिया गठबंधन के साथ है, इसका उन्हें पूरा भरोसा है। इसलिए बिहार चुनाव में मुद्दों के साथ ही नीतीश मोदी राहुल और तेजस्वी के तेज की भी परीक्षा होगी।

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