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महिलाओं के लिए हथियार है धारा 498-ए, जानिए कैसे करना है इस्तेमाल?

Fri, 14 Sep 2018 06:30 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 14 Sep 2018 06:30 PM IST
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Know about IPC Constitutional Article 498-A, How to apply

हमारे समाज में लड़कियों और महिलाओं को लेकर कई कानून बनाए गए हैं। इसी में से एक है कानून की धारा 498-ए। जिसके बारे में जानकारी होना हर महिला के लिए जरूरी है। क्योंकि ये कानून महिलाओं के लिए सुरक्षा कवच प्रदान करता है। आइये जानते हैं क्या कहती है धारा 498-ए? 

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ऐसा पाया गया कि परिवार नाम के दायरे के अंदर महिलाओं के खिलाफ हिंसा की प्रमुख वजहों में से एक दहेज भी है। इसी के चलते महिला आंदोलन के दबाव में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में '498-ए' वजूद में आया। धारा 498-ए यानी किसी महिला पर पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता करने की हालत में बचाने वाला कानून। यह कानून क्रूरता की परिभाषा भी बताता है।
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क्या है धारा 498-ए? 

जब आईपीसी में धारा 498-ए को शामिल किया गया था तो समाज ने, विशेषकर वैसे परिवारों ने राहत महसूस की जिनकी बेटियां दहेज के कारण ससुराल में पीड़ित थीं या निकाल दी गई थीं। लोगों को लगा कि विवाहिता बेटियों के लिए सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है।
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इससे दहेज के लिए बहुओं को प्रताड़ित करने वालों परिवारों में भी भय का वातावरण बना। शुरू में तो कई लोग कानून की इस धारा से मिलने वाले लाभों से अनभिज्ञ थे, लेकिन धीरे-धीरे लोग इसका सदुपयोग भी करने लगे। पर कुछ ही समय बाद इस कानून का ऐसा दुरुपयोग शुरू हुआ कि यह वर पक्ष के लोगों को डराने वाला शस्त्र बन गया।

Know about IPC Constitutional Article 498-A, How to apply
क्या है कानून में प्रावधान?

दहेज प्रताड़ना से बचाने के लिए 1986 में आईपीसी की धारा 498-ए का प्रावधान किया गया है। इसे दहेज निरोधक कानून कहा गया है। अगर किसी महिला को दहेज के लिए मानसिक, शारीरिक या फिर अन्य तरह से प्रताड़ित किया जाता है तो महिला की शिकायत पर इस धारा के तहत केस दर्ज किया जाता है।

इसे गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। 
साथ ही यह गैर जमानती अपराध है। 
दहेज के लिए ससुराल में प्रताड़ित करने वाले तमाम लोगों को आरोपी बनाया जा सकता है।


दहेज प्रताड़ना और ससुराल में महिलाओं पर अत्याचार के दूसरे मामलों से निपटने के लिए कानून में सख्त प्रावधान किए गए हैं। महिलाओं को उसके ससुराल में सुरक्षित वातावरण मिले, कानून में इसका पुख्ता प्रबंध है। 

ये है सजा का प्रावधान

इस मामले में दोषी पाए जाने पर अधिकतम 3 साल तक कैद की सजा का प्रावधान है। वहीं अगर शादीशुदा महिला की मौत संदिग्ध परिस्थिति में होती है और यह मौत शादी के 7 साल के दौरान हुआ हो तो पुलिस आईपीसी की धारा 304-बी के तहत केस दर्ज करती है।

1961 में बना दहेज निरोधक कानून रिफॉर्मेटिव कानून है। दहेज निरोधक कानून की धारा 8 कहता है कि दहेज देना और लेना संज्ञेय अपराध है। दहेज देने के मामले में धारा-3 के तहत मामला दर्ज हो सकता है और इस धारा के तहत जुर्म साबित होने पर कम से कम 5 साल कैद की सजा का प्रावधान है। धारा-4 के मुताबिक, दहेज की मांग करना जुर्म है। शादी से पहले अगर लड़का पक्ष दहेज की मांग करता है, तब भी इस धारा के तहत केस दर्ज हो सकता है।
 

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राहत का दायरा

महिला का पति हो या अन्य ससुराली, अगर किसी महिला के साथ क्रूरता का सुलूक करते हैं तो वे तीन साल तक की सजा और जुर्माना के भागीदर होंगे। हिंसा सहने वाली महिलाओं को इससे हिफाजत मिलने की उम्मीद जगी। यही नहीं, वह संविधान, महिलाओं के साथ भेदभाव और हिंसा दूर करने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौतों के दायरे में भी महिलाओं के मामले देखेगी।

2015 की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले सालों के बकाया मामलों को मिलाकर पुलिस ने 498-ए के तहत एक लाख 12 हजार 107 मामलों की पड़ताल की और 7458 मामलों में केस झूठ पाया। यानी पुलिस ने 2015 में जितने मामले जांच किए उनमें से सिर्फ 6.65 झूठ पाए गए। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाओं के लिए ये कानून कितना मददगार साबित हो रहा है। ये धाराएं सात साल से कम सजा की हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सीधे गिरफ्तारी से मना किया है व दोनों पक्षों पर पहले सुलह समझौते के तहत मामला सुलझाने का अवसर दिया गया है।
 
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