Defence Attache Explained: जानें डिफेंस अताशे के बारे में, कैसे भारत में बने हथियारों का विश्व में बजेगा डंका?
लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (रिटायर्ड) ने अमर उजाला को खास बातचीत में बताया कि भारत के किसी भी दूतावास या उच्चायोग में कई क्षेत्रों के विशेषज्ञ होते हैं, जो उस क्षेत्र में विशेष सलाह और भारत के हितों को देखते हुए उच्चायुक्त की मदद करते हैं।
विस्तार
भारत सरकार अब चीन को कूटनीतिक तौर पर टक्कर देने के लिए दुनिया के बाकी देशों के साथ अपनी साझेदारी को बढ़ावा दे रही है। हाल ही में भारत सरकार ने एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया। केंद्र सरकार रणनीतिक संबंधों और रक्षा सहयोग में मजबूती लाने के लिए कई देशों में डिफेंस अताशे की नियुक्ति करने जा रही है। ये नियुक्तियां अफ्रीकी देशों, पोलैंड और फिलीपींस समेत कई देशों में की जानी हैं। अफ्रीका और दक्षिण चीन सागर में चीन का बढ़ता सैन्य प्रभाव इसकी वजह मानी जा रही है। श्रीनगर में तैनात 15 कॉर्प्स के जीओसी रह चुके लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (रिटायर्ड) ने अमर उजाला को खास बातचीत में बताया कि डिफेंस अताशे की तैनाती बड़ा कदम है। ये न केवल दूसरे देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाएंगे, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के तहत देश में बन रहे हथियारों के लिए नया बाजार भी उपलब्ध कराएंगे।
भारत में 70 देशों के लगभग 120 से ज्यादा डिफेंस अताशे तैनात हैं, जिनकी संख्या में बढ़ोतरी करने की सिफारिशें दूसरे देशों की तरफ से लगातार भारत के पास आती रही हैं। वहीं भारत भी अब पहली बार सेना, नौसेना और वायुसेना से 15-16 नए डिफेंस अताशे तैनात करने जा रहा है, जो पोलैंड, आर्मेनिया, तंजानिया, मोजाम्बिक, जिबूती, इथोपिया, आइवरी कोस्ट और फिलीपींस जैसे देशों में भेजे जाएंगे। सरकार की तरफ से बताया जा रहा है कि यह कदम नए सिरे से पैदा हो रहे भू-राजनीतिक तनाव के चलते लिया गया है। वहीं भारत की कोशिश है कि मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत स्वदेशी हथियारों के लिए नया बाजार तैयार किया जाए। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि पिछले कुछ सालों में भारत का रक्षा निर्यात तेजी से बढ़ा है, जो 2014 में 1,000 करोड़ रुपये से बढ़कर वर्तमान में 16,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। जिसके 2028-29 तक 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना है।
क्या होते हैं डिफेंस अताशे?
लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (रिटायर्ड) ने अमर उजाला को खास बातचीत में बताया कि भारत के किसी भी दूतावास या उच्चायोग में कई क्षेत्रों के विशेषज्ञ होते हैं, जो उस क्षेत्र में विशेष सलाह और भारत के हितों को देखते हुए उच्चायुक्त की मदद करते हैं। किसी भी डिप्लोमेटिक मिशन में सांस्कृतिक अताशे, राजनीतिक मामलों के अताशे, व्यापार अताशे आदि तैनात होते हैं। इसके अलावा रक्षा अताशे भी होते हैं, जो सैन्य कूटनीति से संबंधित सभी मामले देखते हैं। वे रक्षा सहयोग, जिसमें संयुक्त प्रशिक्षण, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, हथियारों की आपूर्ति और ट्रेनिंग और कॉम्बैट डेवलपमेंट जैसे कार्य शामिल होते हैं। वह कहते हैं कि मिशन में एक रक्षा अताशे की मौजूदगी से मिशन प्रमुख को दूसरे विदेशी मिशन के साथ नजदीकी संबंध बनाने में मदद मिलती है।
18 अप्रैल, 1961 के कूटनीतिक संबंधों पर वियना कन्वेंशन के तहत, डिप्लोमेटिक मिशन में राजनयिकों को उनकी रैंक के अनुसार इम्यूनिटी मिलती है। वहीं अनुच्छेद 7 में डिफेंस अताशे को भी इम्यूनिटी के तहत डिप्लोमेटिक मिशन का सदस्य माना गया है। किसी खतरे की स्थिति में डिफेंस अताशे सैन्य खुफिया जानकारी भी एकत्र करते हैं। वे राजनयिकों और सेना के बीच एक कड़ी होते हैं। इसके अलावा डिफेंस अताशे दो देशों के बीच युद्धाभ्यास के अलावा डिफेंस एक्सपो के आयोजन में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
कैसे होती है डिफेंस अताशे की नियुक्ति?
लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (रिटायर्ड) के मुताबिक अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे महत्वपूर्ण देशों के लिए केवल फ्लैग रैंक अफसरों का ही चयन किया जाता है (मतलब वन स्टार रैंक ब्रिगेडियर और वायुसेना और नौसेना में जो इस पद के समकक्ष हों)। अन्य देशों में इस पद पर कर्नल या उसके समकक्ष की तैनाती होती है। चयन की एक कठिन प्रक्रिया है, जिसके बाद सैन्य राजनयिक की जिम्मेदारी लेने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है। अफसरों का सैन्य मामलों में बेहद कुशल होने के साथ उनकी उस क्षेत्र में विशेषज्ञता भी होनी चाहिए। यह पोस्टिंग तीन साल के लिए होती है, जिसमें जॉइंट ट्रेनिंग, रक्षा उपकरणों, हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति से जुड़े रक्षा सहयोग, जैसे कार्य शामिल होते हैं।
दूसरे मिशनों से होगी कटौती
ऐसे में जब 10 नए देशों में डिफेंस अताशे की तैनाती होने वाली है, तो उसके लिए 15-16 अताशे की आवश्यकता होगी। रक्षा सूत्रों के मुताबिक इसके लिए सरकार ने रूस, ब्रिटेन और फ्रांस में बड़े मिशनों पर तैनात सैन्य अधिकारियों की संख्या में कटौती करने की योजना बनाई है। रूस से कोई बड़ी डील नहीं होने की वजह से डिफेंस अताशे की संख्या को घटा दिया गया है। हाल तक रूस में ऐसे 10 अधिकारी तैनात रहते थे, जिसमें चार नेवी से होते थे। ये नए अताशे सेना, नौसेना और वायुसेना से होंगे, जो पोलैंड, फिलीपींस, आर्मेनिया और अफ्रीकी देश तंजानिया, मोजाम्बिक, जिबूती, इथोपिया और आइवरी कोस्ट में मौजूद डिप्लोमेटिक स्टाफ का हिस्सा होंगे। इनमें से कुछ ने पहले ही अपने पदों पर ज्वाइन कर लिया है। वहीं अगले चरण में, कई देशों में 10 नए रक्षा विंग बनाए जाएंगे, जिसमें उन देशों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जिन्हें हथियार निर्यात किए जा सकते हैं।
अफ्रीका पर क्यों है फोकस?
सेना से सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कहते हैं कि अफ्रीका में हथियारों की बिक्री की काफी संभावनाएं हैं और मेक इन इंडिया प्रोग्राम के तहत जिस तरह से भारत स्वेदशी हथियारों को विकसित कर रहा है, इससे भारत की लोकप्रियता दुनियाभर में बढ़ रही है। वहीं दूसरे देश भारत में बने हथियारों को इसलिए प्राथमिकता दे रहे हैं क्योंकि भारत के साथ कोई राजनीतिक विवाद जुड़ा नहीं होता है।
लेकिन अफ्रीका में बाजार तलाशने की दूसरी वजह भी हैं। एक छोटे से अफ्रीकी देश जिबूती में डिफेंस अताशे की तैनाती को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि जिबूती रणनीतिक रूप से पूर्वी अफ्रीका में स्थित है और लाल सागर और अदन की खाड़ी के आसपास एक प्रमुख समुद्री केंद्र है। इसलिए इसे सैन्य ठिकानों के लिए मुफीद जगह के तौर पर देखा जाता है। चीन ने पहली बार 2017 में जिबूती में अपना सैन्य ठिकाना बनाया था, जिससे उसकी पहुंच लाल सागर तक हो गई। तब से अफ्रीकी पूर्वी तट से हिंद महासागर क्षेत्र में मलक्का जलडमरूमध्य तक सुविधाएं स्थापित करने का काम तेजी से हो रहा है। लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन के मुताबिक भारत मध्य शक्ति है, जो अब बड़ी महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। हमारी अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है और हमारा भू-राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ रहा है। अफ्रीका में बड़ी संख्या में ऐसे देश हैं, जिन्हें समर्थन और सहायता की आवश्यकता है। सैन्य तकनीक की बिक्री इसमें अहम भूमिका निभा सकती है। वह कहते हैं कि चीन ने डिफेंस सप्लाई में काफी बढ़त हासिल कर ली है और भारत को भी आगे बढ़ने की जरूरत है। बता दें कि पिछले साल भारत की ही अध्यक्षता में 55 देशों वाले अफ्रीकी संघ को जी-20 के स्थायी सदस्य के रूप में एंट्री मिली थी। वहीं, भारत दुनिया भर में 26 नए मिशन खोलने की तैयारी कर रहा है, इनमें से 18 अफ्रीकी देशों में होंगे।
इथोपिया, मोजाम्बिक और आइवरी कोस्ट में डिफेंस अताशे तैनात करने का फैसला अफ्रीकी देशों के साथ सैन्य रणनीति बढ़ाने के उद्देश्य से लिया गया है। इथोपिया में हालांकि पहले भी डिफेंस अताशे भेजे जाते रहे हैं। 1970 के दशक के मध्य में मेंगीस्तु हैली मरियम के शासन के दौरान राजधानी अदीस अबाबा में डिफेंस अताशे की तैनाती रह चुकी है। रक्षा सूत्रों के मुताबिक, डिफेंस अताशे की तैनाती से यह संदेश जाएगा कि अफ्रीका भारत के लिए मायने रखता है। साथ ही, इससे सैन्य सहयोग और हथियारों की बिक्री की संभावनाएं भी खुलेंगी, क्योंकि कई अफ्रीकी देश अपनी सेनाओं को आधुनिक बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
वहीं चीन भी अफ्रीका में अपनी रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, इससे उसे इन देशों में घुसपैठ करने का मौका मिला है। भारत ने भी मौके की नजाकत को समझते हुए अफ्रीकी देशों के साथ सैन्य युद्धाभ्यास बढ़ाए हैं। साथ ही, डिफेंस एक्सचेंज और ट्रेनिंग प्रोग्राम्स के अलावा, भारत अब उन्हें स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान, पिनाका मल्टी-लॉन्च रॉकेट सिस्टम, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और आकाश एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम निर्यात करने की कोशिश कर रहा है।
पोलैंड में क्यों भेज रहे डिफेंस अताशे?
पोलैंड में डिफेंस अताशे भेजना यूरोपीय संघ (ईयू) को अपने पाले में करने की रणनीति का हिस्सा है। हाल के कुछ सालों में यूरोप में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार के रूप में उभरा है। यूरोपीय संघ ने पिछले साल पहली बार भारत में अपने मिशन के लिए एक डिफेंस अताशे को तैनात किया था। वहीं पोलैंड में भी ऐसा करने से दोनों देशों के बीच संबंधों को नया आयाम मिलेगा।
आर्मेनिया बना है भारत के लिए बड़ा बाजार
भारत पहली बार आर्मेनिया में अपना डिफेंस अताशे भेज रहा है। पिछले कुछ समय से भारत, अर्मेनिया को हथियार बेच रहा है। भारत ने पहले ही आर्मेनिया के साथ पिनाका रॉकेट्स, आकाश मिसाइल और मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर समेत अन्य हथियारों की आपूर्ति के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसकी वजह अजरबैजान और आर्मेनिया का पुराना झगड़ा है। अजरबैजान ने आर्मीनियाई मूल के लोगों के कब्जे से नागोर्नो-काराबाख इलाके को खाली करा लिया था। अब अजरबैजान, तुर्की और पाकिस्तानी हथियारों की मदद से आर्मेनिया को धमका रहा है, जिसके चलते आर्मेनिया बड़े पैमाने पर भारत और फ्रांस से हथियार खरीद रहा है। वहीं आर्मेनिया में डिफेंस अताशे की तैनाती इस पूरी प्रक्रिया को और आसान बना सकती है।
फिलीपींस में पहली बार डिफेंस अताशे
फिलीपींस और चीन के बीच चल रहे विवाद ने भारत के लिए एक नया बाजार खोला है। दक्षिण चीन सागर में चीन की सैन्य आक्रामकता ने भारत को आसियान देशों के साथ सैन्य संबंध बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है। फिलीपींस में पहली बार डिफेंस अताशे भेजने के पीछे मुख्य वजह है कि भारत ने 2022 में ब्रह्मोस मिसाइल की तीन बैटरियों की आपूर्ति के लिए फिलीपींस के साथ 375 मिलियन डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे और जल्द ही मनीला को इन मिसाइलों की डिलीवरी शुरू होने वाली है। हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि भारत फिलीपींस की संप्रभुता का समर्थन करता है। जिसके बाद चीन तिलमिला गया था।