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Kargil 25 Years: 'नींबू साब' ने कैसे नंगे पैर पहाड़ चढ़ कर पाकिस्तान को दिया था शॉक, पेट में लगी थीं 2 गोलियां

Tue, 02 Jul 2024 08:28 PM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Tue, 02 Jul 2024 08:28 PM IST
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सार
कारगिल के बलिदानी सपूतों में नागालैंड के रहने वाले कैप्टन नेइकेझाकुओ का नाम भी गिना जाता है। इस जांबाज का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। 25 साल पहले कारगिल युद्ध में उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। 29 जून, 1999 को जब वे देश के लिए शहीद हुए, तो उनकी उम्र 25 साल से भी कम थी।
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Kargil War 25 years Nimbu Saab braversy Story Pakistan got shot heroic Story news and updates
करगिल युद्ध के वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक अनाम लेखक ने लिखा है, "हमारा झंडा इसलिए नहीं लहराता, क्योंकि हवा उसे हिलाती है, बल्कि यह हर उस सैनिक की आखिरी सांस से लहराता है, जो इसकी रक्षा करते हुए शहीद हो गया।" आज से 25 साल पहले 16-17 हजार फीट की ऊंचाइयों पर कारगिल की जंग लड़ी गई थी। ऐसी जगह जहां आम आम आदमी अपनी सांसों के लिए जद्दोजहद करता दिखाई देता है, उस इलाके में हमारी सेना के जंबाजों ने पाकिस्तानी सेना को मुंहतोड़ जवाब दिया था। उस जंग की यादें शायद अब लोगों के जहन में नहीं है कि कैसे उस जंग में सेना के कई शूरवीरों ने असीम वीरता का परिचय दिया था। उनमें से कुछ की शौर्य गाथाएं हम सभी जानते हैं, तो कुछ की कहानियों से हम अंजान हैं। उनमें से ही एक शूरवीर थे महावीर चक्र से सम्मानित 'नींबू साब'। उनका असली नाम तो कैप्टन नीकेझाकुओ केंगुरुसे था, लेकिन अपने घर और बटालियन में वे 'नींबू साब' के नाम से प्रसिद्ध थे। कारगिल की जंग में वे अहम रणनीतिक चोटी पॉइंट 4590 को बचाते हुए शहीद हो गए। जब उन्होंने माइनस दस डिग्री में दुश्मन की अहम पोस्ट पर कब्जा किया था, तो उनके बदन में दो गोलियां लगी थीं, यहां तक कि उनके पैरों में जूते भी नहीं थे। खास बात यह थी कैप्टन केंगुरुसे उसी बटालियन में थे, जिसमें शहीद कैप्टन विजयंत थापर और शहीद मेजर पद्मपाणि आचार्य भी थे। 


पेट में गोली लगने के बाद भी पहाड़ पर चढ़ते रहे 
नागालैंड के रहने वाले कैप्टन नेइकेझाकुओ को 25 साल पहले कारगिल युद्ध में उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। 29 जून, 1999 को जब वे देश के लिए शहीद हुए, तो उनकी उम्र 25 साल से भी कम थी। 15 जुलाई 1974 को जन्मे 'नींबू साब' (नेइबू) के शौर्य की कहानी दो बहनों दीक्षा और नेहा द्विवेदी ने लिखी है, जो खुद अपने पिता युद्ध नायक मेजर सीबी द्विवेदी, सेना मेडल को कारगिल युद्ध में खो चुकी हैं। जब उनके पिता शहीद हुए थे तब नेहा सिर्फ 12 साल की थीं और दीक्षा केवल 8 साल की थीं। दीक्षा और नेहा ने केंगुरुसे के भाई निंगुटोली के साथ मिलकर "नींबू साब: द बेयरफुट नागा कारगिल हीरो" नाम से किताब लिखी है। जिसमें उन्होंने बताया है कि कैसे 'नींबू साब' पेट में गोली लगने के बाद भी घाव पर बेल्ट बांधकर वे पहाड़ पर चढ़ते रहे और 16000 फीट पर माइनस 10 डिग्री सेल्सियस में नंगे पैर लोन हिल की रक्षा के लिए अपने सैनिकों का नेतृत्व करते हुए शहीद हो गए। 



कैप्टन नेइबू इस तरह बने नींबू साब 
अमर उजाला से खास बातचीत में दीक्षा द्विवेदी बताती हैं कि कैप्टन नेइकेझाकुओ केंगुरूसे छह महीने पहले ही राजपूताना राइफल्स की दूसरी बटालियन में बतौर जूनियर कमांडर शामिल हुए थे, जिसने प्वाइंट 4590 की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह एक ऐसा ऑपरेशन था, जिसमें नींबू साब सहित 23 सैनिक शहीद हुए थे। कैप्टन केंगुरूसे 13 भाई-बहनों के बड़े परिवार में दूसरे नंबर पर थे, जिनमें से तीन की जैविक मां नुपुलहु थीं। उनके सबसे बड़े भाई की मृत्यु हो चुकी थी। पिता पादरी थे और केंगुरूसे की आय से बड़े परिवार का खर्च चलता था। उनका परिवार अंगामी जनजाति से ताल्लुक रखता है। दीक्षा बताती हैं कि उन्हें अपनी पिछली किताब "लेटर्स फ्रॉम कारगिल" पर शोध करते समय उनके कुछ पत्र मिले थे, जिसके बाद उन्होंने उनके बारे में अधिक जाना। नींबू के साथ भाषा की अड़चन थी, लेकिन डेढ़ साल की अकादमी ट्रेनिंग ने उन्हें हिंदी में बातचीत करने में सहज बना दिया। लेकिन उनकी यूनिट में कोई भी नागा भाषा नहीं जानता था। जिससे ज़्यादातर लोगों को उसका पहला नाम नेइकेझाकुओ बोलने में दिक्कत हुई। इसलिए, जब अधिकारियों ने नेइबू को चुना, जिसका उच्चारण करना ज्यादा आसान था, सैनिकों ने उसे ऐसा नाम दिया, जो उनकी जुबान पर आसानी से आ गया। और इस तरह नेइबू बहुत पसंद किए जाने वाले नींबू साब बन गए। 

माइनस 10 डिग्री तापमान में नंगे पैर चट्टान पर चढ़े
दीक्षा बताती हैं कि उनकी कंपनी के मेजर ने कैप्टन नेइकेझाकुओ केंगुरूसे से तीन पिंपल्स (तीन चोटियां) लोन हिल्स, ब्लैक रॉक और नॉल को कैप्चर करने का हुक्म सुनाया। इससे पहले इन पर हमले का पहला चरण पूरा हो चुका था। 28 जून 1999 की रात को द्रास सेक्टर में एरिया ब्लैक रॉक पर हमले के दौरान वे 12-13 लोगों वाली डी प्लाटून (डेल्टा) के कमांडर थे। उन्हें ब्लैक रॉक पर दुश्मन के कब्जे वाली मशीन गन पोस्ट को नष्ट करने की जिम्मेदारी दी गई थी। यहां से हो रही भारी गोलाबारी से बटालियों को आगे ऑपरेशन चलाने में दिक्कत आ रही थी। चढ़ाई बहुत खड़ी थी और वर्टिकल हिल थी, जिससे चढ़ने में बाधा आ रही थी। उनके जूते बर्फीले ढलानों पर फिसल रहे थे। 16,000 फीट की ऊंचाई पर और माइनस 10 डिग्री सेल्सियस के बेहद ठंडे तापमान में, कैप्टन केंगुरूसे ने अपने जूते उतार दिए। अपने नंगे पैर ही, वह किसी तरह बर्फीली चट्टान पर चढ़ गए और साथ में आरपीजी रॉकेट लॉन्चर भी ले गए। जैसे ही कमांडो प्लाटून चट्टान पर चढ़ी, तो ऊपर से पाकिस्तानी सेना ने मोर्टार और मशीनगन की गोलाबारी शुरू हो गई। वे भी चपेट में आ गए। उनकी टीम को भारी नुकसान उठाना पड़ा और कैप्टन केंगुरूसे के पेट में गोली लग गई। चोट से विचलित हुए बिना, उन्होंने अपने जवानों से हमला जारी रखने को कहा। अंतिम चट्टान पर पहुंचने पर, प्लाटून को एक खड़ी चट्टान की दीवार ने रोक दिया, जिससे उन्हें दुश्मन की पोस्ट तक पहुंचने में दिक्कत आ रही थी। 

“ये आपकी जीत है, नींबू साब"
दीक्षा आगे बताती हैं कि किसी तरह से ऊपर पहुंच कर एक बार ऊपर पहुंचकर कैप्टन नेइबू ने अपने सामने खड़े सात पाकिस्तानी बंकरों पर रॉकेट लांचर से हमला किया। जिसके जवाब में पाकिस्तानी सेना ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी, लेकिन वह तब तक गोलीबारी करते रहे, जब तक कि उन्होंने सभी बंकरों को नष्ट नहीं कर दिया। पास के बंकर से दो दुश्मन सैनिक उनकी ओर दौड़े, और उन्होंने हाथापाई में अपने कमांडो चाकू से उनका सामना किया। अपनी राइफल से दो लोगों को और कमांडो चाकू से दो अन्य लोगों को घायल होने से पहले मार गिराया। कैप्टन नेइबू ने बड़ी बहादुरी से लोन हिल्स पर कब्जा कर लिया। लेकिन घायल अवस्था में ही वे नीचे खाई में गिर गए। जब उनके साथी जवानों ने उन्हें नीचे उस अंधेरे देखा, जहां उनका प्यारे नींबू साब पड़े थे, तो वे वहां पहुंचे और कहने लगे, “ये आपकी जीत है, नींबू साब। ये आप की जीत है।” और उनके नाम को समर्पित करते हुए फूट-फूट कर रोने लगे। 



पिता को लिखा भावुक पत्र
सिर्फ़ 25 साल की उन्र में कैप्टन केंगुरूसे ने अकेले ही दुश्मन के अहम ठिकाने को ध्वस्त कर दिया। अपने पिता को लिखे अपने आखिरी पत्र में कैप्टन केंगुरूसे ने लिखा था, "पिताजी, मैं शायद अपने परिवार का हिस्सा बनने के लिए घर वापस न आ पाऊं। अगर मैं ऐसा नहीं कर पाया, तो भी मेरे लिए दुखी मत होना, क्योंकि मैंने पहले ही देश के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देने का फैसला कर लिया है।" उनके अद्वितीय साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया, वे आर्मी सर्विस कोर (एएससी) के एकमात्र सैनिक थे, जिन्हें यह सम्मान मिला। उनके पदक पर लिखा था- उन्होंने कर्तव्य से परे अदम्य वीरता, अदम्य संकल्प, धैर्य और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया तथा भारतीय सेना की सच्ची परंपराओं का पालन करते हुए दुश्मन के सामने सर्वोच्च बलिदान दिया।
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