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सीट का समीकरण: इस सीट पर आज तक नहीं जीते भाजपा और सपा, मऊ में पिछले छह चुनाव से मुख्तार अंसारी परिवार का दबदबा
Wed, 16 Sep 2026 11:14 PM IST
अमन तिवारी
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Wed, 16 Sep 2026 11:14 PM IST
सार
मऊ विधानसभा सीट प्रदेश की उन सीटों में शामिल हैं जहां आज तक न तो भाजपा को जीत मिली न ही सपा कभी जीत दर्ज कर सकी। 1996 से यहां मुख्तार अंसारी ने लगातार पांच चुनाव जीते। 2022 में उनके बेटे अब्बास अंसारी ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज कर पिता के दबदबे को कायम रखा। आइये जानते हैं इस सीट का चुनावी इतिहास...
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मऊ सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर चुनावी मोड में नजर आने लगी है। यहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव को लेकर सियासी दल जमीनी स्तर पर अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं। आने वाले चुनाव में जहां भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश करेगी, वहीं विपक्ष सत्ता परिवर्तन की उम्मीदों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है। उत्तर प्रदेश की इसी चुनावी सरगर्मी के बीच, हम आपको राज्य की हर सीट के इतिहास और राजनीतिक परिदृश्य के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज बात मऊ जिले की मऊ (मऊ सदर) विधानसभा सीट की होगी। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इतिहास।
पहले जानते हैं मऊ विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला मऊ है। जिले में कुल चार विधानसभा सीटें हैं। इनमें- मधुबन, घोसी, मोहम्मदाबाद-गोहना और मऊ (मऊ सदर) शामिल हैं। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम मऊ विधानसभा सीट की बात करेंगे। 1951-52 में देश के पहले आम चुनाव हुए, तब तक मऊ के नाम से स्वतंत्र विधानसभा सीट नहीं बनी थी। उस समय मऊ क्षेत्र आजमगढ़ जिले का हिस्सा था और 'मोहम्मदाबाद नॉर्थ कम घोसी साउथ' व आसपास के संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों के अंतर्गत आता था। 1956-57 के परिसीमन के बाद 1957 में औपचारिक रूप से 'मऊ' विधानसभा सीट अस्तित्व में आई। उस समय यह एक द्वि-सदस्यीय सीट थी, यानी यहां से दो विधायक चुने जाते थे। यहां के पहले आम चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सुदामा प्रसाद गोस्वामी और बेनी बाई चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।
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पहले जानते हैं मऊ विधानसभा सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला मऊ है। जिले में कुल चार विधानसभा सीटें हैं। इनमें- मधुबन, घोसी, मोहम्मदाबाद-गोहना और मऊ (मऊ सदर) शामिल हैं। सीट का समीकरण की कड़ी में आज हम मऊ विधानसभा सीट की बात करेंगे। 1951-52 में देश के पहले आम चुनाव हुए, तब तक मऊ के नाम से स्वतंत्र विधानसभा सीट नहीं बनी थी। उस समय मऊ क्षेत्र आजमगढ़ जिले का हिस्सा था और 'मोहम्मदाबाद नॉर्थ कम घोसी साउथ' व आसपास के संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों के अंतर्गत आता था। 1956-57 के परिसीमन के बाद 1957 में औपचारिक रूप से 'मऊ' विधानसभा सीट अस्तित्व में आई। उस समय यह एक द्वि-सदस्यीय सीट थी, यानी यहां से दो विधायक चुने जाते थे। यहां के पहले आम चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सुदामा प्रसाद गोस्वामी और बेनी बाई चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।
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मऊ विधानसभा सीट का जातीय समीकरण
मऊ विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में मुस्लिम, अनुसूचित जाति, राजभर, यादव और चौहान आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। अगर जातिगत आंकड़ों पर नजर डालें तो क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी मुस्लिम मतदाताओं की है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 36% हैं। इसके बाद अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 20% है। राजभर मतदाता लगभग 10%, यादव मतदाता करीब 10% और चौहान मतदाता लगभग 9% हैं। वहीं राजपूत मतदाताओं की आबादी लगभग 4% है। इसके अलावा बाकी बचे मतदाता अन्य समुदायों से आते हैं।
मऊ विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1957: कांग्रेस के दबदबे के साथ शुरुआत
इस चुनाव के समय मऊ विधानसभा एक द्वि-सदस्यीय सीट थी, यानी यहां से दो विधायक चुने जाते थे। मऊ विधानसभा के अस्तित्व में आने के बाद यहां के पहले आम चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सुदामा प्रसाद गोस्वामी और बेनी बाई यहां से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी बाल कृष्ण और सूरत सिंह यादव को हराया।
मऊ विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में मुस्लिम, अनुसूचित जाति, राजभर, यादव और चौहान आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। अगर जातिगत आंकड़ों पर नजर डालें तो क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी मुस्लिम मतदाताओं की है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 36% हैं। इसके बाद अनुसूचित जाति के मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 20% है। राजभर मतदाता लगभग 10%, यादव मतदाता करीब 10% और चौहान मतदाता लगभग 9% हैं। वहीं राजपूत मतदाताओं की आबादी लगभग 4% है। इसके अलावा बाकी बचे मतदाता अन्य समुदायों से आते हैं।
मऊ विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1957: कांग्रेस के दबदबे के साथ शुरुआत
इस चुनाव के समय मऊ विधानसभा एक द्वि-सदस्यीय सीट थी, यानी यहां से दो विधायक चुने जाते थे। मऊ विधानसभा के अस्तित्व में आने के बाद यहां के पहले आम चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सुदामा प्रसाद गोस्वामी और बेनी बाई यहां से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी बाल कृष्ण और सूरत सिंह यादव को हराया।
इन पार्टियों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1962: कांग्रेस ने दोहराई जीत
1962 के चुनाव में मऊ विधानसभा सीट से कांग्रेस की बेनी बाई विजयी हुईं। उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) के हल्के राम को 8,281 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में बेनी बाई को 17,691 वोट, जबकि हल्के राम को 9,410 वोट मिले।
1967: पहली बार जीता भारतीय जनसंघ
इस चुनाव की बात करें तो इस चुनाव में मऊ विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय जनसंघ (BJS) ने जीत दर्ज की। चुनाव में बी. एम. डी. अग्रवाल विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के एच. रहमान को 6,316 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में बी. एम. डी. अग्रवाल को 20,877 वोट, जबकि एच. रहमान को 14,561 वोट मिले।
1969: पहली बार जीता भारतीय क्रांति दल
इस चुनाव में मऊ विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय क्रांति दल ने जीत दर्ज की। चुनाव में हबीबुर्रहमान विजयी हुए। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के एम. ए. बाकी को 3,195 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में हबीबुर्रहमान को 15,810 वोट, जबकि एम. ए. बाकी को 12,615 वोट मिले।
1962 के चुनाव में मऊ विधानसभा सीट से कांग्रेस की बेनी बाई विजयी हुईं। उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) के हल्के राम को 8,281 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में बेनी बाई को 17,691 वोट, जबकि हल्के राम को 9,410 वोट मिले।
1967: पहली बार जीता भारतीय जनसंघ
इस चुनाव की बात करें तो इस चुनाव में मऊ विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय जनसंघ (BJS) ने जीत दर्ज की। चुनाव में बी. एम. डी. अग्रवाल विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के एच. रहमान को 6,316 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में बी. एम. डी. अग्रवाल को 20,877 वोट, जबकि एच. रहमान को 14,561 वोट मिले।
1969: पहली बार जीता भारतीय क्रांति दल
इस चुनाव में मऊ विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय क्रांति दल ने जीत दर्ज की। चुनाव में हबीबुर्रहमान विजयी हुए। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के एम. ए. बाकी को 3,195 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में हबीबुर्रहमान को 15,810 वोट, जबकि एम. ए. बाकी को 12,615 वोट मिले।
1974: पहली बार जीती भाकपा
1974 के चुनाव में मऊ विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने जीत दर्ज की। चुनाव में अब्दुल बाकी विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ के रामजी को 6,068 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अब्दुल बाकी को 19,814 वोट, जबकि रामजी को 13,746 वोट मिले।
आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1974 के चुनाव में मऊ विधानसभा सीट पर पहली बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने जीत दर्ज की। चुनाव में अब्दुल बाकी विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनसंघ के रामजी को 6,068 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में अब्दुल बाकी को 19,814 वोट, जबकि रामजी को 13,746 वोट मिले।
आपातकाल का समय और 1977 का सियासी बदलाव
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977: पहली बार जीती जनता पार्टी
इस चुनाव में मऊ विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी ने जीत दर्ज की। चुनाव में रामजी विजयी हुए। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के अब्दुल बाकी को महज 108 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में रामजी को 33,798 वोट, जबकि अब्दुल बाकी को 33,690 वोट मिले।
राजनीतिक अस्थिरता का समय
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
इस चुनाव में मऊ विधानसभा सीट पर पहली बार जनता पार्टी ने जीत दर्ज की। चुनाव में रामजी विजयी हुए। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के अब्दुल बाकी को महज 108 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में रामजी को 33,798 वोट, जबकि अब्दुल बाकी को 33,690 वोट मिले।
राजनीतिक अस्थिरता का समय
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
1980 में निर्दलीय ने जीती चुनाव
वहीं 1980 के विधानसभा चुनाव में मऊ विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी खैरुल बशर विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस (आई) के सुहैल को 2,042 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में खैरुल बशर को 19,499 वोट, जबकि सुहैल को 17,457 वोट मिले।
1985: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने की वापसी
इस चुनाव में मऊ विधानसभा सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने वापसी की। चुनाव में भाकपा के इकबाल अहमद विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के रामजी को 16,204 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में इकबाल अहमद को 31,607 वोट, जबकि रामजी को 15,403 वोटों से संतोष करना पड़ा।
पहली बार जीती बसपा
इसके बाद राज्य में साल 1989 के चुनाव हुए। इस चुनाव में मऊ विधानसभा सीट पर पहली बार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने जीत दर्ज की। चुनाव में बसपा के मोबीन विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रामजी को 1,547 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मोबीन को 26,729 वोट, जबकि रामजी को 25,182 वोट मिले।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में मऊ विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1991 का चुनाव
इस विधानसभा चुनाव में मऊ सीट से सीपीआई के इम्तियाज अहमद ने जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा के मुख्तार अब्बास को महज 133 वोटों के मामूली अंतर से हराया।
1993 का चुनाव
इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने वापसी की। चुनाव मे बसपा के नसीम ने जीत हासिल की। उन्होंने भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी को 10,245 वोटों से हराया।
वहीं 1980 के विधानसभा चुनाव में मऊ विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी खैरुल बशर विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस (आई) के सुहैल को 2,042 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में खैरुल बशर को 19,499 वोट, जबकि सुहैल को 17,457 वोट मिले।
1985: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने की वापसी
इस चुनाव में मऊ विधानसभा सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने वापसी की। चुनाव में भाकपा के इकबाल अहमद विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के रामजी को 16,204 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में इकबाल अहमद को 31,607 वोट, जबकि रामजी को 15,403 वोटों से संतोष करना पड़ा।
पहली बार जीती बसपा
इसके बाद राज्य में साल 1989 के चुनाव हुए। इस चुनाव में मऊ विधानसभा सीट पर पहली बार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने जीत दर्ज की। चुनाव में बसपा के मोबीन विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रामजी को 1,547 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में मोबीन को 26,729 वोट, जबकि रामजी को 25,182 वोट मिले।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में मऊ विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1991 का चुनाव
इस विधानसभा चुनाव में मऊ सीट से सीपीआई के इम्तियाज अहमद ने जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा के मुख्तार अब्बास को महज 133 वोटों के मामूली अंतर से हराया।
1993 का चुनाव
इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने वापसी की। चुनाव मे बसपा के नसीम ने जीत हासिल की। उन्होंने भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी को 10,245 वोटों से हराया।
1996: मुख्तार अंसारी का उभार
फिर आया 1996 का विधानसभा चुनाव, जो मऊ की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हुआ। इस चुनाव में बसपा के टिकट पर मुख्तार अंसारी मैदान में उतरे और उन्होंने भाजपा के विजय प्रताप सिंह को 25,973 वोटों के बड़े अंतर से हराया।यहीं से मऊ विधानसभा सीट पर मुख्तार अंसारी के लंबे राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई।
1996 के बाद 2002 में मुख्तार अंसारी ने पार्टी के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और फिर जीत दर्ज की। उन्होंने समता पार्टी की सीता को 33,042 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में मुख्तार को 70,687 वोट मिले, जबकि सीता को 37,645 वोट मिले। यह उनकी मऊ सीट पर लगातार दूसरी जीत थी।
मुख्तार अंसारी ने लगाई जीत की हैट्रिक
2007 के चुनाव में भी मुख्तार अंसारी ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरकर जीत का सिलसिला जारी रखा। उन्होंने बसपा के विजय प्रताप सिंह को 7,018 वोटों से हराया। चुनाव में मुख्तार अंसारी को 70,226 वोट मिले, जबकि विजय प्रताप सिंह को 63,208 वोट मिले। इस जीत के साथ वह मऊ सीट से लगातार तीसरी बार विधायक बने।
फिर आया 1996 का विधानसभा चुनाव, जो मऊ की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हुआ। इस चुनाव में बसपा के टिकट पर मुख्तार अंसारी मैदान में उतरे और उन्होंने भाजपा के विजय प्रताप सिंह को 25,973 वोटों के बड़े अंतर से हराया।यहीं से मऊ विधानसभा सीट पर मुख्तार अंसारी के लंबे राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई।
1996 के बाद 2002 में मुख्तार अंसारी ने पार्टी के बजाय निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और फिर जीत दर्ज की। उन्होंने समता पार्टी की सीता को 33,042 वोटों के बड़े अंतर से हराया। चुनाव में मुख्तार को 70,687 वोट मिले, जबकि सीता को 37,645 वोट मिले। यह उनकी मऊ सीट पर लगातार दूसरी जीत थी।
मुख्तार अंसारी ने लगाई जीत की हैट्रिक
2007 के चुनाव में भी मुख्तार अंसारी ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरकर जीत का सिलसिला जारी रखा। उन्होंने बसपा के विजय प्रताप सिंह को 7,018 वोटों से हराया। चुनाव में मुख्तार अंसारी को 70,226 वोट मिले, जबकि विजय प्रताप सिंह को 63,208 वोट मिले। इस जीत के साथ वह मऊ सीट से लगातार तीसरी बार विधायक बने।
2022 का नतीजा
- फोटो : अमर उजाला
2012 में मुख्तार अंसारी ने कौमी एकता दल के टिकट पर चुनाव लड़ा। इस बार उन्होंने बसपा के भीम राजभर को 5,904 वोटों से हराया। मुख्तार को 70,210 वोट मिले, जबकि भीम राजभर को 64,306 वोट मिले। यह मऊ सीट पर उनकी चौथी लगातार जीत थी।
मुख्तार अंसारी ने जीता लगातार पांचवां चुनाव
2017 में भी मुख्तार अंसारी ने मऊ सीट पर अपना दबदबा कायम रखा। इस बार उन्होंने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और 96,793 वोट हासिल करते हुए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के महेंद्र राजभर को 8,698 वोटों से हराया। महेंद्र राजभर को 88,095 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के अल्ताफ अंसारी 72,016 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। इस जीत के साथ मुख्तार अंसारी मऊ से लगातार पांचवीं बार विधायक बने।
बता दें कि मुख्तार अंसारी की राजनीति के साथ उनका आपराधिक रिकॉर्ड भी लगातार चर्चा में रहा। वह लंबे समय तक जेल में रहे और उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज थे। मार्च 2024 में बांदा जेल में उनकी मौत हो गई।
2022: मुख्तार के बाद बेटे अब्बास अंसारी ने संभाली विरासत
2022 के विधानसभा चुनाव में मुख्तार अंसारी खुद चुनाव मैदान में नहीं उतरे। उनकी जगह उनके बड़े बेटे अब्बास अंसारी ने मऊ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। अब्बास ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और 1,24,691 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा के अशोक कुमार सिंह को 38,116 वोटों से हराया। अशोक कुमार सिंह को 86,575 वोट मिले, जबकि बसपा के भीम 44,516 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।
मुख्तार अंसारी ने जीता लगातार पांचवां चुनाव
2017 में भी मुख्तार अंसारी ने मऊ सीट पर अपना दबदबा कायम रखा। इस बार उन्होंने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और 96,793 वोट हासिल करते हुए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के महेंद्र राजभर को 8,698 वोटों से हराया। महेंद्र राजभर को 88,095 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के अल्ताफ अंसारी 72,016 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। इस जीत के साथ मुख्तार अंसारी मऊ से लगातार पांचवीं बार विधायक बने।
बता दें कि मुख्तार अंसारी की राजनीति के साथ उनका आपराधिक रिकॉर्ड भी लगातार चर्चा में रहा। वह लंबे समय तक जेल में रहे और उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज थे। मार्च 2024 में बांदा जेल में उनकी मौत हो गई।
2022: मुख्तार के बाद बेटे अब्बास अंसारी ने संभाली विरासत
2022 के विधानसभा चुनाव में मुख्तार अंसारी खुद चुनाव मैदान में नहीं उतरे। उनकी जगह उनके बड़े बेटे अब्बास अंसारी ने मऊ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। अब्बास ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और 1,24,691 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा के अशोक कुमार सिंह को 38,116 वोटों से हराया। अशोक कुमार सिंह को 86,575 वोट मिले, जबकि बसपा के भीम 44,516 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे।