आयोग अध्यक्ष पद पर रिटायर्ड जज की नियुक्ति से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा : जस्टिस गुप्ता
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जस्टिस दीपक गुप्ता ने ट्रिब्यूनल पर अलग से लिखे गए फैसले में कहा है कि लोकपाल, लोकायुक्त, मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष व विधि आयोग के अध्यक्ष आदि पद रिटायर्ड जज के लिए होते हैं। लेकिन यह रूटीन नहीं बनना चाहिए, क्योंकि ये नियुक्तियां कार्यपालिका द्वारा की जाती हैं।
उन्होंने कहा कि उन लोगों से न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती, जो सेवानिवृत्ति से पहले सत्ता के गलियारे में अपना भविष्य तलाशते हैं। लिहाजा मेरा मानना है कि निकाय के अधिकांश सदस्य भारत के मुख्य न्यायाधीश और उनके द्वारा नामित व्यक्ति होने चाहिए और उनके विचारों को अन्य सदस्यों की तुलना में प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
अगर कार्यपालिका द्वारा इन पदों पर नियुक्ति के लिए सेवारत या हाल में रिटायर्ड जजों के नामों पर विचार किया जाता है, तो उससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता होने की संभावना है। देश की जनता अब भी न्यायपालिका में बहुत विश्वास रखती है।
उन्होंने कहा कि वह विश्वास तब मिट जाएगा, जब यह महसूस किया जाएगा कि नियुक्तियां असंगत कारणों से हुई हैं। अधिकांश जज अपेक्षाओं पर खरा उतरते हैं, लेकिन इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि कुछ इसके उलट भी हैं।
'तो हाईकोर्ट जज की सेवानिवृत्ति उम्र 65 वर्ष कर देनी चाहिए'
जस्टिस गुप्ता ने कहा, यदि ट्रिब्यूनल के लिए सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जजों की जरूरत है, तो हाईकोर्ट जजों की सेवानिवृत्ति की उम्र सुप्रीम कोर्ट के जजों के समान 65 वर्ष कर देनी चाहिए। मुझे नहीं लगता कि ऐसा करने में कोई परेशानी है। इससे अगले 3 वर्षों में होने वाली रिक्तियों पर भी कुछ हद तक परेशानी कम होगी।