जम्मू-कश्मीर परिसीमन: 1947 के हालात को क्यों याद कर रहीं महबूबा? ये शेख अब्दुल्ला नहीं, मोदी-शाह की सियासत है
राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) ने कहा, आखिर महबूबा 1947 वाले हालात को क्यों याद कर रहीं हैं। आज शेख अब्दुल्ला नहीं, बल्कि मोदी-शाह की सियासत है। 1951 में भारतीय संविधान अपनाने के लिए जम्मू-कश्मीर में जब संविधान सभा का गठन हो रहा था तो उस चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस के 75 उम्मीदवार जीते थे। बाकी उम्मीदवारों को जीतने ही नहीं दिया गया...
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जम्मू-कश्मीर को लेकर परिसीमन आयोग की अंतिम रिपोर्ट आ गई है। अब वहां पर चुनावी सरगर्मियां जल्द शुरू हो सकती हैं। पीडीपी व एनसीपी के नेताओं ने इस रिपोर्ट पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती कह रही हैं कि आज जम्मू-कश्मीर में 1947 वाले हालात हो गए हैं। उन्होंने परिसीमन रिपोर्ट को 'भाजपा का विस्तार' बता दिया। परिसीमन आयोग की सिफारिशें, अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की एक कड़ी है। इसका मकसद है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को कैसे शक्तिहीन किया जाए। राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) ने कहा, आखिर महबूबा 1947 वाले हालात को क्यों याद कर रहीं हैं। आज शेख अब्दुल्ला नहीं, बल्कि मोदी-शाह की सियासत है। 1951 में भारतीय संविधान अपनाने के लिए जम्मू-कश्मीर में जब संविधान सभा का गठन हो रहा था तो उस चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस के 75 उम्मीदवार जीते थे। बाकी उम्मीदवारों को जीतने ही नहीं दिया गया। महबूबा मुफ्ती 2022 में कुछ वैसी ही व्यवस्था चाह रही हैं। यानी जम्मू-कश्मीर में 'मुस्लिम' मुख्यमंत्री बनता रहे। आज यहां सभी को मौका मिलने के आसार बने हैं।
जम्मू-कश्मीर में खेला गया था सियासत का ये खेल
जम्मू-कश्मीर में परिसीमन आयोग की रिपोर्ट बाबत कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) ने कहा कि जो नेता आज रिपोर्ट का विरोध कर रहे हैं, वे इस राज्य में बदलाव के विरोधी हैं। ये बात ठीक है कि रिपोर्ट हर वर्ग को खुश नहीं कर सकती। कुछ कमियां भी रही होंगी। पूर्व सीएम महबूबा का ये कहना कि 1947 वाले हालात हो गए हैं, ठीक नहीं है। महाराजा हरिसिंह के शासन के दौरान 1934 में प्रजा सभा का चुनाव हुआ था। उसमें 33 निर्वाचित सदस्य थे। 30 मनोनीत सदस्य और 12 पदेन सदस्य थे। प्रजा सभा में कुल 75 सदस्य थे। यही पहली विधानसभा का खाका था। मुस्लिम कांफ्रेंस को 33 में से 14 सीट मिली थीं। 1939 में शेख अब्दुल्ला ने मुस्लिम कांफ्रेंस का नाम बदलकर नेशनल कांफ्रेंस कर दिया। ऐसा कर वे खुद के ऊपर से मुस्लिम टैग को थोड़ा हटाना चाहते थे। उन्होंने 1947 में कश्मीर क्विट मूवमेंट शुरू कर दी और चुनाव में भाग नहीं लिया। बतौर कैप्टन गौर, 1951 में संविधान सभा के गठन के दौरान एनसी के 75 उम्मीदवार जीते थे। चुनाव पर सवाल खड़े हो गए थे। उस वक्त भी जम्मू-कश्मीर में सियासत का जो खेल खेला गया, उसका आधार यहां पर मुस्लिम राज्य स्थापित करना था। उसमें जम्मू का रोल ही न हो, शासन में हिंदुओं की भूमिका न के बराबर रहे, ऐसे प्रयास किए गए थे।
भाजपा के खिलाफ एकजुट नहीं हो सकेंगे सभी विपक्षी दल
परिसीमन आयोग की रिपोर्ट के बाद कई दलों ने भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर चुनाव लड़ने की बात कही है। इसमें एनसी, पीडीपी व सीपीआई प्रमुख हैं। सज्जाद लोन की अध्यक्षता वाली 'पीपुल्स कांफ्रेंस' पहले ही गुपकर गठबंधन से अलग हो चुकी है। कांग्रेस पार्टी भी अलग रह सकती है। 'अपनी पार्टी' भी अलग है। आम आदमी पार्टी इस बार चुनाव में कूद सकती है। ऐसे में एकजुट होकर भाजपा को हराने का दावा ठीक नहीं लगता। एनसी के कई नेता भाजपा में आ चुके हैं। जम्मू में पीडीपी का ग्राफ अब बहुत नीचे चला गया है। कैप्टन गौर के अनुसार, आयोग की रिपोर्ट से पहले जनसंख्या गणना होनी चाहिए थी। 2011 की जनगणना के हिसाब से यह रिपोर्ट तैयार हुई है। जम्मू में अब जनसंख्या काफी बढ़ गई है। चारों तरफ से लोग जम्मू में आकर बसे हैं। कश्मीरी पंडित भी यहां आए हैं। ऐसे में यहां पर विधानसभा सीटें ज्यादा होनी चाहिए थीं। कश्मीर में सीटों की संख्या घटनी थी।
आयोग ने केंद्र शासित प्रदेश में सीटों की संख्या 83 से बढ़ाकर 90 करने का प्रस्ताव दिया है। पहली बार अनुसूचित जनजातियों के लिए नौ सीटें आरक्षित की गई हैं। जम्मू में पहले 37 सीटें थीं, अब 43 हो गई हैं। कश्मीर में 46 सीट थी, वहां एक सीट बढ़ाकर 47 सीटें कर दी गई हैं। पिछली जनगणना में कश्मीर में 32 लाख 60 हजार वोटर थे और जम्मू में 30 लाख 84 हजार वोटर थे। आज कश्मीर का क्षेत्रफल कम है, जनसंख्या भी कम है। करीब चार लाख कश्मीरी पंडित ही वहां से निकल चुके हैं। भाजपा ढोल बजा रही है, मगर उतना ही लाभ हो, ये तय नहीं है।
शेख अब्दुल्ला ने मनमर्जी से सीटें तय कर दी थीं
राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में विधानसभा सीटें तय करने में मनमर्जी दिखाई थी। भाजपा अब उसी को भुनाना चाहती है। पार्टी का कहना है कि अब जम्मू-कश्मीर में किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि सही मायने में लोकतंत्र स्थापित होगा। पार्टी ने अनुच्छेद 370 हटाने का ढोल बजाया है। अब विधानसभा सीटें बढ़ाने का श्रेय लेने में भाजपा चूक नहीं करेगी। नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष डा. फारूक अब्दुल्ला, उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला, पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, अब्दुल रहमान वीरी, जीए मीर, पीरजादा मोहम्मद सईद, गुलाम नबी आजाद और रमन भल्ला जैसे नेताओं के विधानसभा क्षेत्रों में परिवर्तन हुआ है। इनमें भाजपा के डा. निर्मल सिंह, कविंद्र गुप्ता, सत शर्मा, श्याम लाल शर्मा व देवेंद्र राणा के विस क्षेत्र भी बदले गए हैं।
जम्मू में अपनी पार्टी, आप, कांग्रेस, एनसी कमजोर है। पीडीपी का नाम नहीं है। पैंथर पार्टी के नेता, आप में चले गए हैं। दूसरी ओर, कश्मीर में भी भाजपा को लाभ हो सकता है। पंचायत व डीडीसी चुनाव में पार्टी का वोट शेयर बढ़ा है। जिस तरह से जम्मू में साइलेंट वोटरों का बाहुल्य है, कुछ वैसा ही कश्मीर में है। वहां के लोगों को लगता है कि यह पार्टी माहौल को ठीक कर देगी। इतना ही नहीं, एनसी व पीडीपी का एंटी इंडिया प्लान भी कश्मीर के लोगों को स्वीकार नहीं है।