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जलियांवाला बाग कांड : कभी ना भुलाई जा सकने वाली टीस
Wed, 10 Apr 2019 11:29 PM IST
अमर शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Wed, 10 Apr 2019 11:29 PM IST
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जलियांवाला बाग हत्याकांड
- फोटो : PTI
जलियांवाला हत्याकांड के 100 साल पूरे होने वाले हैं। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पर्व पर पंजाब में अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश हुकूमत में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर के आदेश पर निहत्थे बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को गोलियों से भून दिया गया था। यह हत्याकांड सिर्फ ब्रिटिने के औपनिवेशिक राज की बर्बरता का ही परिचय नहीं देता, बल्कि इसने भारत के इतिहास की धारा को बदल दिया। इसी के बाद देश को ऊधम सिंह जैसा क्रांतिकारी मिला और भगत सिंह समेत कई युवाओं के दिलों में देशभक्ति की लहर दौड़ गई। आइए जानते हैं जलियांवाला बाग हत्याकांड से जुड़ी खास बातें।
आजादी के आंदोलन की सफलता और बढ़ता जन आक्रोश देख ब्रिटिश राज ने दमन का रास्ता अपनाया। भारत में ब्रिटिश राज ने 13 अप्रैल 1919 को क्रांतिकारी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए रोलेट एक्ट लाने का फैसला किया था। इस एक्ट के मुताबिक ब्रिटिश सरकार के पास शक्ति थी कि वह बिना मुकदमा चलाए किसी भी संदिग्ध को गिरफ्तार कर सकती थी या उसे जेल में डाल सकती थी।
रोलेट एक्ट के तहत पंजाब में दो मशहूर नेताओं डॉक्टर सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर निर्वासित कर दिया गया, जिससे अमृतसर में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था। इनकी गिरफ्तारी के विरोध में कई प्रदर्शन हुए और कई रैलियां भी निकाली गईं थी। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने अपना दूसरा चाल और अमृतसर में मार्शल लॉ लागू कर दिया और सभी सार्वजनिक सभाओं और रैलियों पर रोक लगा दी।
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पंजाब प्रशासन को यह खबर मिली कि 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन आंदोलनकारी जलियांवाला बाग में इकट्ठा हो रहे हैं, तो सरकार ने उन्हें सबक सिखाने की ठान ली। एक दिन पहले ही मार्शल लॉ का एलान कर दिया गया। और सभी सार्वजनिक सभाओं और रैलियों पर रोक लगा दी। अतिरिक्त सैनिक टुकड़ी बुला ली गई। ब्रिगेडियर जनरल डायर के कमान में यह टुकड़ी 11 अप्रैल की रात को अमृतसर पहुंची और अगले दिन शहर में फ्लैग मार्च किया।
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आजादी के आंदोलन की सफलता और बढ़ता जन आक्रोश देख ब्रिटिश राज ने दमन का रास्ता अपनाया। भारत में ब्रिटिश राज ने 13 अप्रैल 1919 को क्रांतिकारी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए रोलेट एक्ट लाने का फैसला किया था। इस एक्ट के मुताबिक ब्रिटिश सरकार के पास शक्ति थी कि वह बिना मुकदमा चलाए किसी भी संदिग्ध को गिरफ्तार कर सकती थी या उसे जेल में डाल सकती थी।
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रोलेट एक्ट के तहत पंजाब में दो मशहूर नेताओं डॉक्टर सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर निर्वासित कर दिया गया, जिससे अमृतसर में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा था। इनकी गिरफ्तारी के विरोध में कई प्रदर्शन हुए और कई रैलियां भी निकाली गईं थी। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने अपना दूसरा चाल और अमृतसर में मार्शल लॉ लागू कर दिया और सभी सार्वजनिक सभाओं और रैलियों पर रोक लगा दी।
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पंजाब प्रशासन को यह खबर मिली कि 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन आंदोलनकारी जलियांवाला बाग में इकट्ठा हो रहे हैं, तो सरकार ने उन्हें सबक सिखाने की ठान ली। एक दिन पहले ही मार्शल लॉ का एलान कर दिया गया। और सभी सार्वजनिक सभाओं और रैलियों पर रोक लगा दी। अतिरिक्त सैनिक टुकड़ी बुला ली गई। ब्रिगेडियर जनरल डायर के कमान में यह टुकड़ी 11 अप्रैल की रात को अमृतसर पहुंची और अगले दिन शहर में फ्लैग मार्च किया।
10 मिनट तक कुल 1,650 राउंड गोलियां चलाई गईं
जलियांवाला बाग हत्याकांड
- फोटो : PTI
अमृतसर के जलियांवाला बाग में बैसाखी पर्व पर एक सभा रखी थी जिसमें आंदोलनकारियों को भाषण देना था। हालांकि शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो आस-पास के इलाकों से बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे। इसमें महिलाएं और बच्चे भी थे। जलियांवाला बाग में सभा के शुरू होने तक 10 से 15 हजार लोग इकट्ठा हो गए थे।
उस वक्त जलियांवाला बाग की चारों तरफ बड़ी-बड़ी दीवारें बनी हुई थी और बाहर जाने के लिए सिर्फ एक मुख्य द्वार था। तभी इस बाग के एकमात्र रास्ते से जनरल डायर अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ वहां पहुंचा और बिना कोई चेतावनी दिए गोलीबारी शुरू कर दी। वहां मौजूद लोगों ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन रास्ता बहुत संकरा था और डायर के फौजी उसे रोककर खड़े थे। इस कारण कोई बाहर नहीं निकल पाया और वहां मौजूद लोग अपनी जान नहीं बचा पाए।
जलियांवाला बाग में जमा लोगों की भीड़ पर 10 मिनट तक कुल 1,650 राउंड गोलियां चलाई गईं। कुछ ही देर में जलियांवाला बाग में बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों की लाशों का ढेर लग गया था। अनाधिकृत आंकड़ों के मुताबित यहां 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे और 2000 से अधिक घायल हुए थे।
उस वक्त जलियांवाला बाग की चारों तरफ बड़ी-बड़ी दीवारें बनी हुई थी और बाहर जाने के लिए सिर्फ एक मुख्य द्वार था। तभी इस बाग के एकमात्र रास्ते से जनरल डायर अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ वहां पहुंचा और बिना कोई चेतावनी दिए गोलीबारी शुरू कर दी। वहां मौजूद लोगों ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन रास्ता बहुत संकरा था और डायर के फौजी उसे रोककर खड़े थे। इस कारण कोई बाहर नहीं निकल पाया और वहां मौजूद लोग अपनी जान नहीं बचा पाए।
जलियांवाला बाग में जमा लोगों की भीड़ पर 10 मिनट तक कुल 1,650 राउंड गोलियां चलाई गईं। कुछ ही देर में जलियांवाला बाग में बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों की लाशों का ढेर लग गया था। अनाधिकृत आंकड़ों के मुताबित यहां 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे और 2000 से अधिक घायल हुए थे।
रवींद्रनाथ टैगोर ने विरोधस्वरूप उपाधि लौटाई थी
जलियांवाला बाग में शहीदी कुआं
- फोटो : PTI
घबराहट में कई लोग जान बचाने के लिए बाग में बने कुंए में कूद पड़े थे। जिसे अब 'शहीदी कुआं' कहा जाता है। यह आज भी जलियांवाला बाग में मौजूद है और उन मासूमों की याद दिलाता है जो अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म का शिकार बने थे।
इस जघन्य हत्याकांज की दुनियाभर में निंदा हुई थी। जिसके बाद विश्व दबाव में ब्रिटिश सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एडविन मॉटेग्यु ने 1919 के आखिर में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन बनाया था। कमीशन के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चलाने का फैसला पहले से ही कर चुका था। हंटर ने कमीशन को यह भी बताया था वह बाग में जमा लोगों पर चलाने के लिए दो तोपें भी ले गया था जो रास्ता संकरा होने की वजह से अंदर नहीं जा पाई थीं।
इस नृशंस हत्याकांड की दुनियाभर में हुई आलोचना के बाद ब्रिटिश सरकार को निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा और 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को इस्तीफा देना पड़ा। इस घटना के बाद जनरल डायर ब्रिटेन लौट गए थे क्योंकि उन्हें निलंबित कर दिया गया था।
बताया जाता है कि इस घटना के बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने विरोधस्वरूप ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई अपनी उपाधि लौटा दी थी।
जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के लिए 13 मार्च 1940 को ऊधम सिंह लंदन गए। वहां उन्होंने कैक्सटन हॉल में डायर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है।
जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह को भीतर तक प्रभावित किया था। बताया जाता है कि जब भगत सिंह को इस हत्याकांड की सूचना मिली तो वह अपने स्कूल से 19 किलोमीटर पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंचे थे।
उस समय ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स ने डायर का निंदा प्रस्ताव पारित किया था लेकिन हाउस ऑफ लॉर्ड ने इस हत्याकांड की प्रशंसा करते हुए उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया था।
इस जघन्य हत्याकांज की दुनियाभर में निंदा हुई थी। जिसके बाद विश्व दबाव में ब्रिटिश सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एडविन मॉटेग्यु ने 1919 के आखिर में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन बनाया था। कमीशन के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चलाने का फैसला पहले से ही कर चुका था। हंटर ने कमीशन को यह भी बताया था वह बाग में जमा लोगों पर चलाने के लिए दो तोपें भी ले गया था जो रास्ता संकरा होने की वजह से अंदर नहीं जा पाई थीं।
इस नृशंस हत्याकांड की दुनियाभर में हुई आलोचना के बाद ब्रिटिश सरकार को निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा और 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को इस्तीफा देना पड़ा। इस घटना के बाद जनरल डायर ब्रिटेन लौट गए थे क्योंकि उन्हें निलंबित कर दिया गया था।
बताया जाता है कि इस घटना के बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने विरोधस्वरूप ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई अपनी उपाधि लौटा दी थी।
जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के लिए 13 मार्च 1940 को ऊधम सिंह लंदन गए। वहां उन्होंने कैक्सटन हॉल में डायर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है।
जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह को भीतर तक प्रभावित किया था। बताया जाता है कि जब भगत सिंह को इस हत्याकांड की सूचना मिली तो वह अपने स्कूल से 19 किलोमीटर पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंचे थे।
उस समय ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स ने डायर का निंदा प्रस्ताव पारित किया था लेकिन हाउस ऑफ लॉर्ड ने इस हत्याकांड की प्रशंसा करते हुए उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया था।
टेरीजा मे ने ब्रिटिश संसद में जलियांवाला बाग हत्याकांड पर जताया अफसोस
टेरीजा मे
- फोटो : PTI
अब एक बार फिर ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने ब्रिटिश संसद में जलियांवाला बाग हत्याकांड पर अफसोस जताया है। टेरीजा मे ने कहा, 'जो भी हुआ था और उससे लोगों को जो पीड़ा हुई उसका हमें बेहद अफसोस है।' मे ने इस घटना को ब्रिटिश-भारतीय इतिहास में शर्मनाक दाग बताया।
इससे पहले मंगलवार को इस घटना को लेकर ब्रिटेन सरकार द्वारा माफी मांगने के प्रस्ताव रखा गया था, जिसपर वहां बहस हुई। लगभग सभी सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। हालांकि, ब्रिटिश सरकार के एशिया-प्रशांत क्षेत्र मामलों के मंत्री मार्क फील्ड ने इस घटना को लेकर संसद में संवेदना तो जताई थी, लेकिन माफी मांगने से इनकार कर दिया था।
इससे पहले मंगलवार को इस घटना को लेकर ब्रिटेन सरकार द्वारा माफी मांगने के प्रस्ताव रखा गया था, जिसपर वहां बहस हुई। लगभग सभी सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। हालांकि, ब्रिटिश सरकार के एशिया-प्रशांत क्षेत्र मामलों के मंत्री मार्क फील्ड ने इस घटना को लेकर संसद में संवेदना तो जताई थी, लेकिन माफी मांगने से इनकार कर दिया था।
टेरीजा मे के मंत्री की माफी नहीं मांगने की वजह सुनिए
जलियांवाला बाग
- फोटो : PTI
हाउस ऑफ कॉमंस परिसर के वेस्टमिंस्टर हॉल में आयोजित बहस के दौरान ब्रिटिश विदेश मंत्री मार्क फील्ड ने कहा कि हमें उन बातों की एक सीमा रेखा खींचनी होगी जो इतिहास का 'शर्मनाक हिस्सा' हैं। ब्रिटिश राज से संबंधित समस्याओं के लिए बार-बार माफी मांगने से अपनी तरह की दिक्कतें सामने आती हैं।
फील्ड ने कहा कि वह ब्रिटेन के औपनिवेशिक काल को लेकर थोड़े पुरातनपंथी हैं और उन्हें बीत चुकी बातों पर माफी मांगने को लेकर हिचकिचाहट होती है। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार के लिए यह चिंता की बात हो सकती है कि वह माफी मांगे। इसकी वजह यह भी हो सकती माफी मांगने में वित्तीय मुश्किलें हो सकती हैं। फील्ड ने कहा कि अगर हम माफी मांगते हैं तो कई घटनाओं के लिए मांगनी होगी। इससे मुद्रा भी गिर सकती है।
फील्ड ने कहा कि वह ब्रिटेन के औपनिवेशिक काल को लेकर थोड़े पुरातनपंथी हैं और उन्हें बीत चुकी बातों पर माफी मांगने को लेकर हिचकिचाहट होती है। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार के लिए यह चिंता की बात हो सकती है कि वह माफी मांगे। इसकी वजह यह भी हो सकती माफी मांगने में वित्तीय मुश्किलें हो सकती हैं। फील्ड ने कहा कि अगर हम माफी मांगते हैं तो कई घटनाओं के लिए मांगनी होगी। इससे मुद्रा भी गिर सकती है।