जय किसान : अंग्रेजीराज से अब तक अन्नदाता की जद्दोजहद, कड़ी मेहनत से उगाई फसल
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विस्तार
भारत में किसानों ने जमीन पर अधिकार से लेकर अपनी कड़ी मेहनत से उगाई फसल की वाजिब कीमत और जमींदारों से लेकर साहूकारों तक के अत्याचारों के खिलाफ कई आंदोलन किए हैं। केंद्र सरकार द्वारा तीन नए कृषि कानून वापस लेने की घोषणा इन आंदोलनों में मिली सफलता की नई कड़ी कही जा सकती है। जानिए भारत में किसानों ने किस तरह आजादी के बाद भी अपने संघर्षों और आंदोलनों की परंपरा को जीवित रखा।
वेट्टी प्रथा के खिलाफ तेलंगाना आंदोलन 1946-51
- हालात : हैदराबाद निजाम के शासन में तेलंगाना में जमीनों पर सामंतों का अधिकार था। वे मजदूरों से ऊंची कीमत लेकर खेती करने देते थे। किसानों को ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता। इसे वेट्टी प्रथा (बंधुआ मजदूरी) कहा जाता था।
- संघर्ष : 1946 में किसानों ने संघर्ष किया। निजाम की पुलिस ने किसानों को क्रूरता से कुचला। 1948 में निजाम शासन खत्म कर भारत सरकार ने हैदराबाद का विलय किया। 1950 में आंध्र प्रदेश काश्तकारी व कृषि भूमि अधिनियम 1950 बना जिसके बाद किसानों से जबरन वसूली, वेट्टी प्रथा पर रोक लगी।
हालात : कोलागा मापक यंत्र से भड़का 1951 का सत्याग्रह
कर्नाटक के शिमोगा में किसानों ने जमीनों पर मालिकाना हक को लेकर आंदोलन शुरू किया। तब कृषि उपज मापने के लिए कोलागा नामक यंत्र इस्तेमाल होता था। जमींदार कर्ज देते तो तीन सेर का एक कोलागा मानते, जब वसूलते तो चार सेर तक का कोलागा उपयोग करते। विरोध पर किसानों को पीटा जाता। किसानों को राम मनोहर लोहिया का भी साथ मिला। बंधुआ मजदूरी रुकी, जो सबसे बड़ी उपलब्धि बनी। 1974 में किसानों को पहली बार जमीन पर अधिकार मिले।
नक्सलबाड़ी आंदोलन 1967
- हालात : ‘हमारी बाड़ी, तुम्हारी बाड़ी, नक्सल बाड़ी’ नारे के साथ यह आंदोलन पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के गांव नक्सलबाड़ी में शुरू हुआ। यहां किसानों आदिवासियों का जमीन पर हक नहीं था।
- संघर्ष : मार्च 1967 में कुछ किसानों ने जमींदारों के कब्जे वाली जमीनों पर खेती शुरू की। समितियां बनाकर उनसे सशस्त्र संघर्ष किए। दार्जिलिंग के चाय बागान श्रमिकों ने भी समितियों के समर्थन में हड़ताल शुरू कर दी। नक्सलबाड़ी आंदोलन को भारत का प्रमुख किसान आंदोलन माना जाता है।
यूपी में टिकैत से शुरू हुआ नया संघर्ष
मुजफ्फरनगर के सिसौली गांव में 1935 में जन्मे महेंद्र सिंह टिकैत को आठ साल की उम्र में पिता की मृत्यु के बाद बालियान खाप का चौधरी बनाया गया। 1986 में उन्होंने भारतीय किसान यूनियन बनाई और इसे राजनीति से दूर रखा।
- संघर्ष : जनवरी 1987 में पहली बार टिकैत के नेतृत्व में संगठित किसानों ने करमूखेड़ा बिजलीघर और बिजली की बढ़ी दरों के मामले में शक्ति प्रदर्शन किया। अगले ही साल गन्ना मूल्य, बिजली की बढ़ी दरों पर आंदोलन शुरू किया। इसके लिए इंडिया गेट मार्च निकाला, जिसमें करीब पांच लाख किसान शामिल हुए। जिसके कारण तब प्रधानमंत्री राजीव गांधी को किसानों की 35 मांगों को मानना पड़ा था।