कैसी होती है सुरक्षा बलों से रिटायर हुए 'खोजी कुत्तों' की जिंदगी, कौन बनता है इनके बुढ़ापे का सहारा
कुछ बलों में बूढ़े हो चुके कुत्तों को किसी एनजीओ के हवाले कर दिया जाता था। बाद में यह महसूस किया गया कि ये खोजी कुत्ते बल की शान रहे हैं। इन्होंने कई मुश्किलों से जवानों को बचाया है, ऐसे में रिटायरमेंट के बाद इन्हें बल से दूर नहीं रखा जाना चाहिए
कुछ बलों में बूढ़े हो चुके कुत्तों को किसी एनजीओ के हवाले कर दिया जाता था। बाद में यह महसूस किया गया कि ये खोजी कुत्ते बल की शान रहे हैं। इन्होंने कई मुश्किलों से जवानों को बचाया है, ऐसे में रिटायरमेंट के बाद इन्हें बल से दूर नहीं रखा जाना चाहिए
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केंद्रीय सुरक्षा बलों में लंबे समय तक अपनी सेवाएं देने के बाद रिटायर होने वाले 'खोजी कुत्तों' का जीवन कैसे चलता है, वे कहां चले जाते हैं, बुढ़ापे में उनका पेट कैसे भरता है, ऐसे कई सवाल बहुत से लोगों के जेहन में घूमते रहते हैं। क्या इन कुत्तों के लिए पेंशन आदि का प्रावधान है, बीमारी में इनका इलाज कौन करता है और जब ये दुनिया को अलविदा कहते हैं तो उस वक्त की रस्म कौन पूरी करता है, इन सबका जवाब यहीं पर है।
अपने जीवनकाल के 14-15 वर्षों में ये कुत्ते सुरक्षा बलों को कई तरह के भारी जानमाल के नुकसान से बचाते हैं। इसके चलते कई कुत्तों को जान भी गंवानी पड़ी है। रिटायरमेंट के बाद सुरक्षा बल ही इन कुत्तों की देखरेख करते हैं। अंतिम सांस तक ये बल का हिस्सा बने रहते हैं, हालांकि इन्हें सक्रिय ड्यूटी से दूर रखा जाता है। रिटायरमेंट के बाद इनकी दिनचर्या का नया चार्ट तैयार होता है। इन्हें पहले जैसा ही खाना मिलता है, मगर उसकी मात्रा तीस फीसदी कम कर दी जाती है।
आईटीबीपी के पंचकूला स्थित भानु नेशनल डॉग ट्रेनिंग सेंटर के एक अधिकारी बताते हैं कि सभी केंद्रीय सुरक्षा बलों में खोजी कुत्तों को रिटायरमेंट के बाद एक धरोहर की तरह रखा जाता है। पहले कुछ बलों में यह प्रथा भी रही है कि बहुत से बूढ़े हो चुके कुत्तों को किसी एनजीओ के हवाले कर दिया जाता था। बाद में यह महसूस किया गया कि ये खोजी कुत्ते बल की शान रहे हैं। इन्होंने कई मुश्किलों से जवानों को बचाया है, ऐसे में रिटायरमेंट के बाद इन्हें बल से दूर नहीं रखा जाना चाहिए।
अधिकारी के मुताबिक, सच तो यह है कि इनके साथ बल के जवानों, खासतौर पर ट्रेनर आदि का एक भावनात्मक जुड़ाव हो जाता है। बाद में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी सुरक्षा बलों में डॉग के रख रखाव के लिए एक एसओपी तैयार कर दी। इसमें तय किया गया है कि रिटायरमेंट के बाद कोई भी कुत्ता बल परिसर से बाहर नहीं जाएगा। ये कुत्ते आजीवन बल का हिस्सा बने रहेंगे। इनके रहने के लिए विशेष सेंटर तैयार करा दिए गए।
एक कुत्ता अमूमन 14-15 साल तक सुरक्षा बलों के बीच में रहता है। आठ साल की सेवा के बाद उसे रिटायर कर दिया जाता है। उसके बाद बल का पशु चिकित्सक उनके स्वास्थ्य की जांच करता है। यदि वह पशु चिकित्सक यह सलाह देता है कि अभी एक-दो साल तक, खोजी कुत्ते को ड्यूटी पर रखा जा सकता है तो उसे दोबारा से फील्ड में भेज दिया जाता है। रिटायरमेंट वाले कुत्ते को तीस फीसदी कम खाना मिलता है। यानी ड्यूटी पर तैनात डॉग को मिलने वाली सौ फीसदी डाइट के मुकाबले रिटायरमेंट वाले कुत्ते को सत्तर फीसदी डाइट दी जाती है। इसकी वजह यह है कि उसे कहीं फील्ड में नहीं जाना पड़ता।
सेंटर पर इन कुत्तों को अकेले नहीं छोड़ते। तीन कुत्तों पर एक केयरटेकर होता है। वह उन्हें रोजाना मॉर्निंग वॉक कराता है। उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखता है। कभी-कभार इन्हें ट्रेनिंग के मकसद से बाहर ले जाया जाता है। यदि एक डॉग अपने जीवन में आईईडी या दूसरी विस्फोटक सामग्री तलाश लेता है तो यह उसकी बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इनकी मदद से अनेक जवानों का जीवन बच जाता है। कई कुत्ते तो ऐसे भी हैं जो अपने जीवनकाल में अनेक मौकों पर जवानों को मुश्किल में पड़ने से बचा लेते हैं। जब ये दुनिया को अलविदा कहते हैं तो उसके लिए रस्म अदा की जाती है।
के-9 विंग के श्वानों को मिला ये नाम
आईटीबीपी ने अपने के-9 विंग के श्वानों को नाम देने के लिए बुधवार को भानू में नामकरण समारोह आयोजित किया है। पहली बार किसी भी सशस्त्र बल में श्वानों को देसी नाम देने का प्रचलन प्रारंभ किया गया है। इन श्वानों को आईटीबीपी ने जो नाम दिए हैं, वे उन जगहों के हैं, जहां पर बल के जवान ड्यूटी देते हैं। ये नाम देश की सुरक्षा में लगे जवानों को समर्पित हैं।
लगभग 2 महीने पूर्व जन्मे बेल्जियन मेलिनोइस श्वानों के नाम रखे गए हैं। इन 17 श्वानों, जिनके पिता का नाम गाला और माताओं का नाम ओलगा और ओलिशिया हैं, उनके नए नाम हैं आने-ला, गलवान, ससोमा, सिरिजाप, चिप चाप, सासेर, चार्डिंग, रेजांग, दौलत, सुल्तान-चुस्कू, इमिस, रांगो, युला, मुखपरी, चुंग थुंग, खार्दुंगी और श्योक। इन के-9 योद्धाओं को 100 फीसदी स्थानीय नाम दिए गए हैं। आईटीबीपी के डॉग हैंडलर गर्व से अपने श्वानों को उन नाम से पुकारेंगे जहां भारत तिब्बत सीमा पर आइटीबीपी की तैनाती होती है।
नक्सल रोधी अभियानों में आईटीबीपी ने पहली बार एक दशक पूर्व बेल्जियन मेलिनोइस श्वानों को तैनात किया था। अब सुरक्षा बलों में इन श्वानों की बढ़ती मांग को देखते हुए आईटीबीपी ने इनकी वैज्ञानिक पद्धति से ब्रीडिंग भी प्रारंभ कर दी है। कई अन्य सुरक्षा बलों ने भी आईटीबीपी से इन श्वानों की उपलब्धता के लिए अनुरोध किया है।