Health: भारतीय शोधकर्ताओं ने अन्य ट्यूमर के लिए शुरू किया शोध, घातक है स्वदेशी सीएआर-टी थेरैपी
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ब्लड कैंसर के बाद जल्द ही स्वदेशी तकनीक से बड़े ट्यूमर को भी नष्ट किया जा सकेगा। भारतीय शोधकर्ताओं ने चिमेरिक एंटीजन रिसेप्टर यानी सीएआर-टी सेल थेरैपी पर शोध शुरू किया है। इसमें आईआईटी बॉम्बे और टाटा कैंसर अस्पताल सहित देश के कई संस्थान मिलकर काम कर रहे हैं। इस शोध को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएसओ) की ओर से भी प्रारंभिक अनुमति दी गई है।
लिम्फोमा और ल्यूकेमिया ब्लड कैंसर में सफल इम्युनो एक्ट के सह-संस्थापक शिरीष आर्य ने बताया कि पिछले साल 12 अक्तूबर को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएसओ) ने मुंबई स्थित टाटा कैंसर अस्पताल के क्लीनिकल ट्रायल परिणामों के आधार पर सीएआर-टी सेल थेरैपी को देश के अस्पतालों तक पहुंचने की अनुमति दी। अब तक करीब 15 अस्पतालों में यह सुविधा शुरू की गई है। उत्तर भारत में मैक्स हेल्थकेयर के साथ करार किया गया है। अभी तक यह तकनीक सिर्फ लिम्फोमा और ल्यूकेमिया रोगियों के लिए है, लेकिन आगामी दिनों में कैंसर के अन्य मरीजों के इलाज में भी इस्तेमाल हो सकती है। इसमें ब्रेन कैंसर से लेकर ठोस ट्यूमर तक शामिल हैं।
अभी खर्च लाखों में, लेकिन सस्ती होगी
मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर केयर के चेयरमैन डॉक्टर हरित के. चतुर्वेदी ने कहा कि जब भी कोई नई तकनीक आती है तो उसकी कीमत काफी अधिक रहती है, लेकिन जैसे-जैसे तकनीक आम होने लगती है उसकी कीमत भी गिरती है। इसी तरह सीएआर-टी थेरैपी के भी अगले कुछ वर्षों में सस्ते होने की उम्मीद की जा सकती है। बहरहाल मौजूदा समय में इस थेरैपी की कीमत करीब 30 से 35 लाख रुपये हो सकती है।
इम्यून सेल्स पर आधारित है तकनीक
यह तकनीक कैंसर मरीज के इम्यून सेल्स पर आधारित है। इसमें मरीज के सेल्स को कैंसर से लड़ने लायक बनाते हैं। इसमें टी कोशिकाओं नामक विशिष्ट प्रकार की सफेद रक्त कोशिकाएं मदद करती हैं। एक बार सेल्स कैंसर से लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं तो उन्हें वापस अस्पताल में भर्ती मरीज में प्रवेश करा दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के करीब दो से तीन सप्ताह में रिकवरी देखने को मिलती है। वैज्ञानिक साक्ष्य बताते हैं कि 80 फीसदी से ज्यादा मरीजों में यह थेरैपी सफल रही है और कैंसर से मुक्ति मिली है।
पांच साल में भारत को मिली सफलता
अध्ययन बताते हैं कि सीएआर-टी थेरैपी को लेकर दुनिया में पहला प्रयास अमेरिकी वैज्ञानिकों ने वर्ष 2009 से 2010 के बीच शुरू किया। हालांकि, इसे सरकारी अनुमति 2018 में दी गई और उसी दौरान भारतीय शोधकर्ताओं ने इस पर अपना अध्ययन शुरू किया। भारत ने महज पांच साल के भीतर इस तकनीक को अस्पतालों तक उपलब्ध कराया है। अमेरिका और भारत के अलावा यह तकनीक स्पेन, जर्मनी और चीन के पास है।