भारत ने दोहराया, एलएसी में चीन का एकतरफा प्रयास स्वीकार नहीं

शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Thu, 23 Jul 2020 10:26 PM IST
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india china - फोटो : social media

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सार

  • चीन के सैनिकों के व्यवहार में भारी बदलाव
  • पड़ोसी देश ने तैनात किए बड़ी संख्या में सैनिक
  • बनी सहमति को मानने को लिए तैयार नहीं पड़ोसी देश
  • कर रहा है एलएसी की वास्तविकता बदलने की एकतरफा कोशिश

विस्तार

भारत ने बृहस्पतिवार को फिर दोहराया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि है कि हमें चीन की वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की वास्तविकता को बदलने की एकतरफा कोशिश स्वीकार नहीं है। अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि 14 जुलाई को वरिष्ठ सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरेन्द्र सिंह और मेजर जनरल लियु लिन के बीच हुई बैठक में चीन के साथ पूरी तरह से सेना को पीछे ले जाने पर चर्चा हुई थी और इसको लेकर जल्द ही वर्किंग मैकेनिज्म ऑन कंसल्टेशन एंड कोआर्डिनेशन ऑफ इंडो-चाइना बार्डर की बैठक होने वाली है।
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विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का कहना है कि भारत एलएसी, अंतरराष्ट्रीय समझौते का सम्मान करता है और चीन से भी अपेक्षा रखते हैं कि वह भी सीमा पर शांति और सद्भाव बनाने में सहयोग दे। प्रवक्ता ने कहा कि दोनों देशों के विदेश प्रतिनिधियों अजीत डोभाल और वांग यी के बीच में एलएसी पर शांति और सद्भाव कायम करने, सेना को हटाने पर कार्य करने को लेकर सहमति बनी थी। चीन को इस सहमति का सम्मान करना चाहिए।
चीन कर रहा है अन्याय
भारत ने कहा कि चीन के साथ 1993 से सीमा पर शांति स्थापित करने के लिए आपसी सहमति और समझौते हुए हैं। लेकिन चीन ने एलएसी पर बड़े पैमाने पर सैनिकों की तैनाती, एलएसी के प्रारुप को बदलने वाला दावा और सैनिकों के व्यवहार में आए बदलाव (हिंसक झड़प) के साथ इस समझौतों की अवहेलना करके अन्याय कर रहा है। यह आपसी समझतों को न मानना है। अनुराग श्रीवास्तव ने साफ कहा कि सीमा क्षेत्र में शांति और सद्भाव की स्थापना दी दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते का आधार है। भारत हमेशा से इसका पक्षधर रहा है और चीन को इसका आदर करना चाहिए।
 
रक्षात्मक रुख से थोड़ा बाहर आना चाहिए
चीन के साथ लद्दाख क्षेत्र में बने तनाव को लेकर पूर्व विदेश सचिव शशांक ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि भारत को रक्षात्मक रुख से थोड़ा बाहर निकालना चाहिए।  एयरवाइस मार्शल(पूर्व) एनबी सिंह और लेफ्टिनेंट जनरल(पूर्व) बलविंदर सिंह संधू का भी कहना है कि रक्षात्मक तरीके से समाधान निकलने की संभावना कम नजर आ रही है। एनबी सिंह के अनुसार रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने खुद माना है कि बातचीत के जरिए वह समाधान निकलने की गारंटी नहीं दे सकते। उन्होंने वायुसेना की कमांडर कांफ्रेस के दौरान भी चुनौती से निबटने के लिए तैयार रहने को कहा है। भारतीय कूटनीति और रक्षा विशेज्ञज्ञों का मानना है कि भारत को अब अन्य विकल्पों पर गंभीरता के साथ सोचना चाहिए।

चीन को लगता है कि आसानी से कब्जा कर लेंगे
पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि चीन ने पहले से ही हमारी काफी जमीन को कब्जे में ले रखा है। उसकी अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ ढाई कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे हटने की नीति रही है। इसलिए उसे लग रहा है कि लद्दाख क्षेत्र में वह इसी तरह दबाव बनाए रखेगा तो धीरे-धीरे भारत शांत हो जाएगा। वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार को भी चीन की मानसिकता इसी तरह की दिखाई दे रही है। हालांकि पूर्व विदेश सचिव शिवशंकर मेनन चीन के व्यवहार में इस तरह के बदलाव और सीमा क्षेत्र पर कोशिश के लिए भारतीय विदेश नीति को जिम्मेदार ठहराते हैं। मेनन का मानना है कि भारत को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए।
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