मैकमोहन रेखा क्या है और आखिर क्यों इसे मानने से इनकार करता है चीन?
भारत और चीन, 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है. ये सीमा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से होकर गुजरती है।
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1962 के बाद भारत और चीन के रिश्ते एकबार फिर बेहद खराब स्तर पर पहुंच चुके हैं। बीते 58 साल में पहली बार इतनी बड़ी मात्रा में भारतीय सैनिक शहीद हुए हैं। बीते सोमवार को दोनों देशों के बीच लद्दाख की गलवां घाटी में हिंसक झड़प हुई, एक अधिकारी समेत 20 भारतीय जवानों की शहादत से पूरे देश में रोष का माहौल है। सीमा विवाद को लेकर शुरू हुआ पूरा मामला अब किस स्तर तक जाएगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन चीन की फितरत ही धोखेबाजी की रही है। 'ड्रैगन' के खून में ही दगा है। वह मैकमोहन रेखा को ही नहीं मानता, जिसकी वजह से सारा विवाद खड़ा हुआ है।
1914 में सर हेनरी मैकमोहन ने खींची थी लकीर
मैकमोहन रेखा तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार में विदेश सचिव रहे सर हेनरी मैकमोहन ने खींची थी, जो ब्रिटेन, चीन और तिब्बत के बीच हुए शिमला सम्मेलन के मुख्य वार्ताकार भी थे। 1914 में जब ब्रिटिश भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों ने यह समझौता किया था, तब वहां चीन मौजूद नहीं था। भारत की ओर से ब्रिटिश शासकों ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग और तिब्बत के दक्षिणी हिस्से को हिंदुस्तान का हिस्सा माना और जिसे तिब्बतियों ने भी सहमति दी थी। अब चीन न तो मैकमोहन रेखा को मान्यता देता है और न ही उसे स्वीकारता है। 1935 में भारत के सर्वे ऑफ इंडिया के मैप में मैकमोहन लाइन को आधिकारिक रूप से प्रकाशित किया है। शुरू से ही विवादित रही इस रेखा को लेकर 1950 में विवाद बढ़ गया, जिसके बाद 1962 का युद्ध भी हुआ। गलवां घाटी जैसी हिंसक घटनाएं भी मैकमोहन रेखा के प्रति चीन के अड़ियल रवैये को दर्शाता है।
कम्युनिस्ट क्रांति से पहले की सारी संधियों को नकारता है चीन
दरअसल 1914 में जब मैकमोहन रेखा तय हुई थी तो तिब्बत एक कमजोर स्वतंत्र देश था, लेकिन चीन ने तिब्बत को कभी स्वतंत्र मुल्क माना ही नहीं, इसलिए इस फैसले को भी नहीं मानता। चीन ने 1950 में तिब्बत पर पूरी तरह से अपना कब्जा जमा लिया। चीन के इस क्षेत्र पर दावे के जवाब में भारत यह तर्क देता है कि जब मैकमोहन रेखा खींची गई थी, तब तिब्बत पर चीन का शासन नहीं था। चीन ने तिब्बत पर कब्जा करने के बाद ही अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा जताना शुरू किया। वर्तमान समय में चीन का सबसे बड़ा सीमा विवाद भारत और कुछ हद तक भूटान के साथ चल रहा है। भू-सीमा के अलावा चीन के साथ चार देशों (जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम और फिलिपींस) की समुद्री सीमा भी लगती है। इन समुद्री सीमाओं को लेकर भी चीन का विवाद चलता रहता है। चीन लगभग हर उस संधि को नकारता है, जिसे उसने कम्युनिस्ट क्रांति होने से पहले मंजूरी दी थी।
क्या थी यह संधियां?
विशेषज्ञ ऐसा मानते हैं कि एशियाई देशों के बीच सीमा विवाद की जड़ों में उन पर हुआ औपनिवेशिक शासन प्रमुख कारण है। इन यूरोपिय शक्तियों ने मनमाने तरीके से कई आधुनिक देशों का निर्माण किया था। 19वीं-20वीं शताब्दी के प्रारंभ में चीन को भी कई संधियों में शामिल होने के लिए विवश किया गया था, इनमें से अधिकांश संधियों में चीनी सरकार ने उपनिवेशवादियों को संरक्षण दिया, उन्हें व्यापार करने के लिए विशेषाधिकार दिए और कुछ इलाके भी उन्हें सौंपे। चीन ने ब्रिटेन को हांगकांग, पुर्तगाल को मकाउ, अपने उत्तरी क्षेत्र का एक बड़ा भूभाग रूस के जार को, फ्रांस को अन्नम (अब वियतनाम में) और जापान को ताइवान का भूभाग सौंपा था। रूसी क्रांति के बाद बने सोवियत संघ ने तो चीन को उसका इलाका लौटा दिया, लेकिन अन्य उपनिवेशवादी शक्तियों ने इसके बाद भी कई दशकों तक एशिया से जाना गवारा नहीं किया और चीन के अधिकांश सीमा विवाद इसी औपनिवेशिक काल की देन हैं।