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भारत में चीन से ज्यादा विद्यालय, शिक्षा में सुधार की गुंजाइश बाकी

Sat, 30 Mar 2019 11:53 AM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Sneha Baluni Updated Sat, 30 Mar 2019 11:53 AM IST
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India beats China in number of school but we lags in qualitative education
प्राथमिक विद्यालय के छात्र (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

एक दशक पहले भारत में शिक्षा का अधिकार कानून आया था। उसके बाद से प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य को लगभग 100 प्रतिशत तक हासिल कर लिया गया है लेकिन अब जो समस्या हमारे सामने खड़ी है वह है शिक्षा की गुणवत्ता। नीति आयोग द्वारा जारी की गई अध्ययन रिपोर्ट से पता चला है कि विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए हमें बहुआयामी दृष्टिकोण के जरिए पारंपरिक रणनीतियों में बदलाव करना होगा।

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इस अध्ययन रिपोर्ट का नीति आयोग के सलाहकार आलोक कुमार और बॉस्टन कंसल्टिंग समूह की निदेशक सीमा बंसल ने सह-लेखन किया है। उन्होंने कहा, 'भारत आज दो तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है। पहला औसत दर्जे के विद्यालय बनाए जा रहे हैं और दूसरा इन विद्यालयों में शिक्षकों की बहुत ज्यादा कमी है। जिसके कारण अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे हैं।' 
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सालों के सिलेबल में बदलाव लाने की कोशिशों, अध्यापकों को प्रशिक्षण दिलाने और छात्रों का आकलन करने के बावजूद संरचनात्मक दोषों के कारण परिस्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। बच्चों का विद्यालय में नामांकन कराने पर जोर देने के कारण भारत ने हर आबादी वाले क्षेत्र में विद्यालय खोलने की रणनीति अपनाई है। जिसके परिणामस्वरूप छोटी आबादियों के बीच कम संसाधनों में विद्यालयों को खोला जा रहा है।
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रिपोर्ट में कहा गया है, 'आज भारत में लगभग समान जनसंख्या होने के बावजूद चीन के मुकाबले ज्यादा विद्यालय हैं। चीन में केवल 5 लाख विद्यालय हैं। वहीं भारत में यह संख्या 15 लाख है। भारत के लगभग 4 लाख विद्यालयों में प्रत्येक छात्र की संख्या 50 और अध्यापक की दो है। लगभग 1.5 करोड़ भारतीय छात्र औसत विद्यालय में पढ़ाई करते हैं। शिक्षक की रिक्तियों ने समस्या को बढ़ा दिया है। भारत में 35.22 छात्रों पर एक अध्यापक है। वहीं चीन में 23.65 छात्रों पर एक अध्यापक मौजूद है जोकि वैश्विक मानक के अनुरूप है।'

रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में आज 10 लाख से ज्यादा अध्यापकों की कमी है। जो अध्यापक उपलब्ध हैं उनकी पोस्टिंग बेतरतीब तरीके से की गई है। इसे देखने में कोई हैरानी नहीं होगी कि शहरी विद्यालय में जहां संख्या से ज्यादा अध्यापक मौजूद हैं। वहीं गांवों के विद्यालय में एक अध्यापक को 100 से ज्यादा बच्चों को देखना पड़ता है। झारखंड जैसे राज्यों में अध्यापकों की संख्या में 40 प्रतिशत की कमी है। मध्यप्रदेश, ओडिशा और राजस्थान भी इसी तरह प्रभावित हैं।

रिपोर्ट में इस समस्या से निजात पाने के तीन उपाय बताए गए हैं:-

1. एक दूसरे से कम दूरी पर स्थित विद्यालय का एकीकरण किया जाए और परिवहन और भत्ते प्रदान किए जाएं। 

2. जिन स्थानों पर शिक्षकों की संख्या ज्यादा है वहां से उन्हें उन जगहों पर स्थानांतरित किया जाए जहां उनकी कमी है। शिक्षकों के कैडर की पुन: सरंचना की जाए और शिक्षक भर्ती में बेहतर योजना और सख्त प्रक्रिया के जरिए ज्यादा निवेश किया जाए।



3. माध्यमिक विद्यालयों में व्यावसायिक शिक्षा पर पुनर्विचार किया जाए। देश में मौजूद लगभग 8,000 माध्यमिक विद्यालयों में एक या दो ट्रेड की व्यावसायिक शिक्षा दी जाती है लेकिन अब वह पुरानी हो चुकी है।

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