Independence Day 2021: 75 साल में स्वास्थ्य सुविधाएं कितनी बदलीं? देश को क्या सबक मिले?
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विस्तार
कोरोना के इस दौर से पहले शायद दुनियाभर की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कभी इतना चुनौतीपूर्ण समय नहीं आया। कोरोना ने महाशक्ति माने जाने वाले अमेरिका समेत कई देशों की स्वास्थ्य सुविधाओं की कलई खोल दी। ऐसे में देश की स्वास्थ्य सुविधाओं की तरफ हमारा ध्यान जाना बहुत स्वाभाविक है।कोरोना ने सिखाया आत्मनिर्भर बनना ही पड़ेगा
सबसे पहली बात कोरोना महामारी के दौर की ही करते हैं। कोरोना ने हमें स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राथमिकता देने और आत्मनिर्भर बनने की सबसे बड़ी सीख दी। महामारी के शुरू होने पर पहले सरकार भारी असमंजस में थी। विशेषज्ञों-डॉक्टरों को अंदाजा नहीं था कि इसका मुकाबला कैसे किया जाया। कोरोना से बचाव का सबसे कारगार तरीका यही था कि देश के लोगों को इस वायरस से बचाने के लिए टीके लगाए जाएं। अमेरिका, रूस और चीन समेत कई देशों ने अपने-अपने यहां वैक्सीन बनाने का काम शुरू कर दिया। भारत भी इस मामले में पीछे नहीं रहा।
देश ने स्वास्थ्य सुविधाओं के बुनियादी ढांचे में सुधार करने के साथ-साथ वैक्सीन बनाने पर भी पूरी ताकत लगा दी। अब देश टीके के मामले में आत्मनिर्भर है। देश में कोवाक्सीन बन रही है। कोविशील्ड भले ही विदेशी है, लेकिन इसका उत्पादन भी भारत में ही हो रहा है। दोनों वैक्सीन दुनिया की सबसे सस्ती और विश्वसनीय मानी जा रही है। वैक्सीन के आने से लाखों लोगों को संक्रमण से बचाने में मदद मिली है। देश में अब तक 51 करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना का टीका लगाया जा चुका है। आज देश में विश्व का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चल रहा है।
आजादी के बाद स्वास्थ्य सेवाओं में कितनी प्रगति हुई?
स्वतंत्रता के समय देश स्वास्थ्य सेवा के मामले में काफी पिछड़ा हुआ था। धीरे-धीरे आर्थिक योजनाओं के लागू होने से भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में बहुत प्रगति होने लगी। इसमें सबसे अहम था शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के रूप में बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया जाए। डॉक्टर, हॉस्पिटल की संख्या बढ़ाने से लेकर संचारी रोगों के नियंत्रण पाने की कोशिश हुई। एक नजर आंकड़ों पर भी डालते हैं...
- 1947 में जहां औसत उम्र महज 32 वर्ष थी, वह 2018 में 69.09 वर्ष हो गई।
- 1950-51 के दौरान देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 28 थी, जो अब 460 से ज्यादा हो गई है।
- आजादी के समय देश में सरकारी अस्पतालों की संख्या महज सात हजार थी। अब यह संख्या 26 हजार है।
- तब निजी अस्पतालों की संख्या केवल आठ फीसदी थी। आज यह संख्या 93 फीसदी है।
- आजादी के समय देश में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों की संख्या केवल 725 थी। अब डेढ़ लाख से ज्यादा स्वास्थ्य केंद्र हैं। कोरोना संकट में इन स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका ने गांवों की बहुत बड़ी मदद की है।
- आजादी के बाद 50 हजार डॉक्टर थे। 31 मार्च 2019 तक देश में 9.27 लाख पंजीकृत डॉक्टर सक्रिय सेवा में थे।
- आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक डॉक्टर की संख्या 7.88 लाख है। राज्यसभा में पेश स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में 11.59 लाख एलोपैथी डॉक्टर पंजीकृत हैं।
और क्या बदला
- कोरोना के समय, देश में टेस्टिंग के लिए केवल एक लैब थी। आज 1400 से ज्यादा लैब्स का नेटवर्क है।
- कोरोना की पहली लहर में एक दिन में सिर्फ 300 टेस्ट हो पाते थे। अब हर दिन सात लाख से ज्यादा टेस्ट हो रहे हैं।
- देश में एक महत्वपूर्ण योजना आयुष्मान भारत चल रही है। योजना का लक्ष्य देश में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करना है।
- छ हजार जन-औषधि केंद्रों के जरिए करीब पांच करोड़ से ज्यादा सैनिटरी पैड गरीब महिलाओं तक पहुंच चुके हैं।
- एमबीबीबीएस, एमडी में 45 हजार से ज्यादा छात्रों के लिए सीटें बढ़ी हैं।
- केंद्र सरकार ने अखिल भारतीय चिकित्सा शिक्षा कोटे में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्ल्यूएस) वर्ग के उम्मीदवारों के लिए 10 फीसदी आरक्षण लागू किया है।
संक्रामक रोगों पर काबू पाया
किसी भी देश के समग्र स्वास्थ्य सूचकांक में सुधार का मापदंड इस बात से मापा जाता है कि उस देश ने संक्रामक रोगों पर किस तरह काबू पाया है। इस मामले में भारत ने काफी महत्वपूर्ण प्रगति की है। आजादी के बाद, भारत में महामारियां फैलने का बड़ा खतरा था और कई महामारियों ने उसे अपना शिकार बनाया भी। मगर देश ने उनका डटकर सामना किया। महामारियों के खिलाफ जंग शुरू की और जीत हासिल की। डब्लूयएचओ के कार्यकारी निदेशक डॉ. माइकल रेयान ने पिछले साल कहा था कि भारत ने चेचक और पोलियो जैसी दो गंभीर बीमारियों से लड़ने में भी दुनिया को राह दिखाई थी।
मलेरिया से होने वाली मौतों पर कुछ अंकुश लगा
आजादी के समय मलेरिया से हर साल 10 लाख से ज्यादा लोगों की जानें जाती थीं। भारत में वर्ष 2000 से 2019 के बीच मलेरिया से होने वाली मौतों में भी कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2000 में मौतों का आंकड़ा 35 हजार था जो 2019 में घटकर 9,000 हो गया है।
सरकार ने 1958 में राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम शुरू करके इस बीमारी से निपटने के लिए एक बड़ा कदम उठाया। इसे बड़े कार्यक्रमों में शुमार किया गया। इससे मलेरिया से होने वाली मौतों की संख्या में तेजी से कमी आई। विश्व मलेरिया रिपोर्ट 2018 के अनुसार, मलेरिया के सबसे अधिक रोगियों के मामले में शीर्ष तीन देशों में भारत नहीं था। 2017 में, देश में मलेरिया के मामलों की संख्या 95 लाख थी। डब्लूयएचओ ने 2030 तक दुनिया को मलेरिया मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। भारत ने 2027 तक मलेरिया मुक्त और 2030 तक मलेरिया को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य बनाया है।
चेचक पर काबू पाया
अंग्रेजों के समय से ही चेचक को मिटाने के प्रयास जारी थे। एक आंकड़ें के मुताबिक आजादी के बाद 1950-51 में देश में चेचक के चार लाख से ज्यादा मामले थे। 1948 में चेन्नई के किंग्स इंस्टीट्यूट में बीसीजी टीका बनाने के लिए लैब शुरू हो चुका था। उसके बाद चेचक रोकने के लिए टीकाकरण की शुरुआत हुई। भारत ने 1962 में राष्ट्रीय चेचक उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया। टीकों के वितरण और चिकित्सा सुविधा की आसान पहुंच से देश से चेचक को सफलतापूर्वक समाप्त कर दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय चेचक आकलन आयोग ने 23 अप्रैल, 1977 को देश को चेचक मुक्त देश घोषित किया।
2009 में, भारत में वैश्विक पोलियो के 60 प्रतिशत से अधिक मामले थे। इसके तहत तीन साल तक के बच्चे को टीकाकरण अभियान के दायरे में लाया गया। भारत में पोलियो उन्मूलन मिशन की शुरुआत वर्ष 1995 में हुई थी। तब यह बीमारी एक साल में 50,000 से अधिक बच्चों को अपंग कर रही थी। सरकार ने देश के हर बच्चे के टीकाकरण के लिए 23 लाख पोलियो स्वयंसेवियों और डेढ़ लाख सुपरवाइजरों की एक मजबूत टीम तैयार की। इस टीम ने देश के प्रत्येक बच्चे तक पहुंचने के लिए कड़ी मेहनत की। जब पोलियो संक्रमण अपने चरम पर था तब देश में 6.4 लाख पोलियो बूथ बनाए गए। पोलियो कार्यक्रम की करीबी निगरानी से यह अभियान सफल रहा। देश को 2014 में पोलियो मुक्त होने का प्रमाण पत्र हासिल हुआ।
स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण
बढ़ते आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण ने स्वास्थ्य देखभाल सेवा को भी प्रभावित किया है। लोग सरकारी स्वास्थ्य देखभाल की तुलना में एक मरीज को मिलने वाली सुविधाएं जैसे बिस्तर, भोजन की गुणवत्ता, उपचार और यहां तक कि डॉक्टर का चयन जैसी बातों को लेकर निजी अस्पतालों को तरजीह देने लगे। इस वजह से स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ और भारतीयों की उम्र बढ़ने लगी।
भारत में चिकित्सा पर्यटन
पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिका और कुछ दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की तुलना में भारत में इलाज सस्ता होने के कारण हाल के कुछ सालों में देश में चिकित्सा पर्यटन बढ़ा है। हर साल पर्यटकों की संख्या में वृद्धि के साथ भारत चिकित्सा पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। पर्यटन मंत्रालय के अनुसार, भारत के चिकित्सा पर्यटन उद्योग के 2020 तक 200 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है, जो 9 अरब डॉलर तक पहुंच सकता था, हालांकि कोरोना के कारण इसमें कमी आ गई है।
राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन शुरू होगा
केंद्र सरकार प्रत्येक भारतीय को हेल्थ आईडी देने की योजना पर काम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 के स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत की घोषणा की थी। अभी यह कुछ केंद्रशासित प्रदेशों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चल रहा है। ये हेल्थ आईडी प्रत्येक भारतीय के स्वास्थ्य खाते की तरह काम करेगी। आपके हर टेस्ट, हर बीमारी की जानकारी यहां दर्ज होगी। नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन के माध्यम से व्यक्ति की सेहत व इलाज से संबंधी जानकारियां दर्ज होंगी।
75 सरकारी मेडिकल कॉलेज खुलेंगे
केंद्र सरकार चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए 2021-22 में 75 नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोलने की योजना पर भी काम कर रही है। इन कॉलेजों की स्थापना उन जिलों में बनाने की योजना है, जहां 200 बेड या उससे ज्यादा की क्षमता वाले जिला अस्पताल हैं। इन कॉलेजों के जरिये एमबीबीएस की 15,700 सीटें बढ़ सकती हैं।
कमी कहां?
दुर्भाग्यवश हम अपनी जीडीपी का महज दो फीसदी ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करते हैं। 2008-09 से 2019-20 के बीच भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर कुल जीडीपी का 1.2 से 1.6 फीसदी ही खर्च हुआ। नई स्वास्थ्य नीति 2017 के मुताबिक भारत ने 2025 तक स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का ढाई फीसदी खर्च करने का लक्ष्य रखा है। जबकि इसका वैश्विक स्तर छह फीसदी माना जाता है।
मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएं
स्वतंत्रता के 75 सालों के बाद देश अभी भी इन सेवाओं को ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। 2014 में, भारत मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सबसे खराब प्रदर्शन करने वालों में से था। सेव द चिल्ड्रेन के वैश्विक सर्वेक्षण में भारत कुल 178 देशों में 137वें स्थान पर था।
वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा सूचकांक में भारत किस स्थान पर
- 2019 के वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा सूचकांक के मुताबिक गंभीर और संक्रामक रोगों से लड़ने के सूचकांक में भारत 195 देशों में 46.5 अंक के साथ 57वें स्थान पर है। इस सूची में केवल 13 देश है जो शीर्ष पर हैं।
- वहीं 2018 मेडिकल जर्नल ‘लैंसेट’ के एक अध्ययन के मुताबिक, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और लोगों तक पहुंच के मामले में भारत विश्व के 195 देशों में 145वें स्थान पर है।
- डब्लूयएचो की रिपोर्ट के मुताबिक 64 प्रतिशत डॉक्टरों की गांवों में कमी है।
- केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलीजेंस की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 11,082 की आबादी पर मात्र एक डॉक्टर है।
- वहीं, नवंबर 2019 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यसभा में पेश अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि 1,445 लोगों की जिम्मेदारी केवल एक एलोपैथ के डॉक्टर के कंधों पर है। डब्ल्यूएचओ का मानक यह है कि एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए।
- साल 2015 में आई संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट में कहा गया कि अगर देश में हर साल 100 मेडिकल कॉलेज खोले जाएं, तब भी इस मानक को पूरा करने में 2029 तक का समय लग जाएगा।
- यही हाल सरकारी अस्पतालों में पंजीकृत नर्सों और दाईयों की संख्या का है। अभी 2,50,000 नर्स और दाइयां है। 135 करोड़ की आबादी के लिए इस लिहाज से प्रति 610 व्यक्तियों पर एक नर्स है।
- मरीजों के बिस्तरों की संख्या 7,13,986 है। यानी प्रति 1,000 की आबादी पर 0.55 बिस्तर उपलब्ध है। जबकि इसका वैश्विक औसत प्रति 1000 जनसंख्या पर अस्पताल में 3.96 बिस्तर है।
- पिछले साल नवंबर में आई संसदीय कमेटी की रिपोर्ट, द ऑउटब्रेक ऑफ कोविड-19 पैनडेमिक ऐंड इट्स मैनेजमेंट में कहा गया कि देश के सरकारी अस्पतालों के कुल बेड कोविड के बढ़ते मामलों की तुलना में नाकाफी थे।
नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2019 की रिपोर्ट क्या कहती है
इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य को सर्जरी की जरूरत है। भारत में प्रति 11,082 की आबादी पर मात्र एक डॉक्टर होना विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानक पर खरा नहीं उतरता है। भारत में फरवरी 2020 में 1404 लोगों पर एक डॉक्टर था।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय क्या कहता है
- केंद्र सरकार यह खुल कर स्वीकार करती है कि आजादी के 75 सालों बाद भी देश आज कई स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है।
- स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से लगभग एक मिलियन भारतीयों की हर साल मृत्यु हो जाती है।
- 70 करोड़ लोगों को विशेषज्ञ डॉक्टरों का इलाज नहीं मिल पाता है।
- 80 फीसदी विशेषज्ञ केवल शहरी क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में इसकी भारी कमी है।
- अधिकतर राज्यों में वेतन और पारिश्रमिक का खर्च ही कुल स्वास्थ्य बजट का 70 प्रतिशत है जिससे सेवाओं के विस्तार के लिए मुश्किल से कोई संसाधन बचता है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2017 की अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि लोग अपनी आय का 10 फीसदी से ज्यादा इलाज पर ही खर्च कर रहे हैं।
- रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्वास्थ्य के मद में होने वाले खर्च का 67.78 प्रतिशत लोग अपनी जेब से खर्च करते हैं। वहीं इस मामले में वैश्विक औसत 17.3 प्रतिशत है।
-रिपोर्ट में कहा गया है कि आधे भारतीयों की आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच ही नहीं है।
स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो छह दशक तक देश के सर्वोच्चतम अस्पताल और उच्च शिक्षा के सार्वजनिक संस्थानों का समूह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स केवल सात थे। अब इनकी संख्या नौ है। ये नौ संस्थान दिल्ली, ऋषिकेश, भोपाल, भुवनेश्वर, जोधपुर, पटना, रायपुर, गुंटूर और नागपुर में स्थित हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार ने जून 2018 में 11 एम्स को मंजूरी दे दी है जो देश के अलग-अलग जगहों पर स्थापित किए जाएंगे। प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार ने कुल 22 एम्स की स्थापना को स्वीकृति दी है।
आजादी के बाद सबसे पहले बना दिल्ली का एम्स
पहला एम्स दिल्ली में 1961 में बना। इसकी आधारशिला 1952 में रखी गई। पूर्व प्रधानमंत्री चाहते थे कि दिल्ली में एक हेल्थ और रिसर्च सेंटर बने जो दक्षिण पूर्व एशिया में मिसाल कायम करे। उनके इस सपने को पूरा किया देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ने। 1956 में संसद से एक्ट पास होने के बाद एम्स को स्वायत्तता मिली। इसकी शुरूआत 50 मेडिकल छात्रों के साथ हुई।
अखिल भारतीय स्वास्थ्य सेवा के अलग कैडर का प्रस्ताव लंबित
आजादी के बाद देश की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए एक अलग सार्वजनिक स्वास्थ्य कैडर गठित करने की जरूरत महसूस की गई। इसका सुझाव सबसे पहले मुदलियार समिति ने दिया था। समिति ने कहा था आईएएस, आईपीएस और आईएफएस की तरह ही अखिल भारतीय चिकित्सा सेवा के रूप में एक अलग कैडर गठित किया जाए। लेकिन यह प्रस्ताव करीब पिछले पांच दशक से लटका हुआ है।
इसके बाद साल 1973 में करतार सिंह कमेटी, 1997 में पांचवें वेतन आयोग और वर्ष 2017 में आई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में भी अलग कैडर बनाने की सिफारिश की गई।
इसी साल मार्च में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की संसदीय समिति ने अपनी अनुदान संबंधी मांगों पर अपनी 126वीं रिपोर्ट में अलग कैडर बनाने का सुझाव दिया। आजादी से पहले भारत में इस तरह का अलग कैडर था, जो चिकित्सकों और अन्य कर्मियों की भर्ती और तैनाती का मामला देखता था। 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद इस पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण हो गया था। इस सेवा को 1947 के बाद खत्म कर दिया गया।