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1971 की लड़ाई में एडमिरल नंदा ने यूं किया था कराची को 'तबाह'
amarujala.com- Submitted by: आनंद
Updated Sat, 13 May 2017 01:40 PM IST
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1971 में भारत पाकिस्तान लड़ाई शुरू होने से दो महीने पहले अक्टूबर 1971 में नौसेना अध्यक्ष एडमिरल एसएम नंदा प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मिलने गए। नौसेना की तैयारियों के बारे में बताने के बाद उन्होंने श्रीमती गांधी से पूछा अगर नौसेना कराची पर हमला करे तो क्या इससे सरकार को राजनीतिक रूप से कोई आपत्ति हो सकती है।
इंदिरा गांधी ने हाँ या ना कहने के बजाय सवाल पूछा कि आप ऐसा पूछ क्यों रहे हैं? नंदा ने जवाब दिया कि 1965 मे नौसेना से खास तौर से कहा गया था कि वह भारतीय समुद्री सीमा से बाहर कोई कार्रवाई न करे, जिससे उनके सामने कई परेशानियाँ उठ खड़ी हुई थीं।
इंदिरा गांधी ने कुछ देर सोचा और कहा, "वेल एडमिरल, इफ देयर इज अ वॉर, देअर इज अ वॉर।" यानी अगर यु्द्ध है तो यु्द्ध है। एडमिरल नंदा ने उन्हें धन्यवाद दिया और कहा, "मैडम मुझे मेरा जवाब मिल गया।"
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इंदिरा गांधी ने हाँ या ना कहने के बजाय सवाल पूछा कि आप ऐसा पूछ क्यों रहे हैं? नंदा ने जवाब दिया कि 1965 मे नौसेना से खास तौर से कहा गया था कि वह भारतीय समुद्री सीमा से बाहर कोई कार्रवाई न करे, जिससे उनके सामने कई परेशानियाँ उठ खड़ी हुई थीं।
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इंदिरा गांधी ने कुछ देर सोचा और कहा, "वेल एडमिरल, इफ देयर इज अ वॉर, देअर इज अ वॉर।" यानी अगर यु्द्ध है तो यु्द्ध है। एडमिरल नंदा ने उन्हें धन्यवाद दिया और कहा, "मैडम मुझे मेरा जवाब मिल गया।"
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इंदिरा गांधी से एडमिरल नंदा की दो टूक
इससे एक साल पहले, एडमिरल ने उस समय के मशहूर अखबार ब्लिट्ज को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, "मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अगर लड़ाई होती है तो मैं इसे पाकिस्तान के सबसे बड़े बंदरगाह कराची तक ले जाऊंगा। मैं उस बंदरगाह को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं, क्योंकि मेरा बचपन वहाँ बीता है।"
1971 में जब लड़ाई शुरू हुई तो एडमिरल नंदा ने अपना वो वादा पूरा कर दिखाया। एक दिसंबर, 1971 को एडमिरल नंदा ने सील्ड लिफाफे के जरिए सभी युद्धपोतों को कराची पर हमला करने के आदेश दिए।
पूरा वेस्टर्न फ्लीट दो दिसंबर को ही मुंबई से कूच कर गया। उनसे कहा गया कि युद्ध शुरू होने के बाद ही वह उस सील्ड लिफाफे को खोलें। योजना थी कि नौसैनिक बेड़ा दिन के दौरान कराची से 250 किलोमीटर के डायमीटर पर रहेगा और शाम होते-होते उसके 150 किलोमीटर की दूरी पर पहुँच जाएगा।
1971 में जब लड़ाई शुरू हुई तो एडमिरल नंदा ने अपना वो वादा पूरा कर दिखाया। एक दिसंबर, 1971 को एडमिरल नंदा ने सील्ड लिफाफे के जरिए सभी युद्धपोतों को कराची पर हमला करने के आदेश दिए।
पूरा वेस्टर्न फ्लीट दो दिसंबर को ही मुंबई से कूच कर गया। उनसे कहा गया कि युद्ध शुरू होने के बाद ही वह उस सील्ड लिफाफे को खोलें। योजना थी कि नौसैनिक बेड़ा दिन के दौरान कराची से 250 किलोमीटर के डायमीटर पर रहेगा और शाम होते-होते उसके 150 किलोमीटर की दूरी पर पहुँच जाएगा।
कराची पर ऐसे किया हमला
अंधेरे में हमला करने के बाद पौ फटने से पहले वह अपनी तीव्रतम रफ्तार से चलते हुए कराची से 150 किलोमीटर दूर आ जाएगा, ताकि वह पाकिस्तानी बमवर्षकों की पहुँच से बाहर आ जाए। और हमला भी रूस की ओसा क्लास मिसाइल बोट से किया जाएगा। वह वहाँ खुद से चल कर नहीं जाएंगी, बल्कि उन्हे नाइलॉन की रस्सियों से खींच कर ले जाया जाएगा। एडमिरल नंदा की इस दु:साहसी योजना का नौसेना के अंदर ही काफी विरोध हुआ। एडमिरल एसएम नंदा अपनी आत्मकथा, 'द मैन हू बॉम्ड कराची' में लिखते हैं, "पश्चिमी कमान के प्रमुख वाइस एडमिरल कोहली ने रक्षा मंत्री के सामने अपना प्रेजेंटेशन देते हुए कहा कि पाकिस्तानी पोतों के पास हमसे ज्यादा हथियार हैं और उनकी फायरिंग क्षमता भी हमसे बेहतर है।
लेकिन हमारे चीफ का कहना है कि हमें कराची पर हमला करना ही है।" नंदा ने लिखा है, ''कोहली के कहने का अंदाज ये था जैसे उन्हें कमजोर संसाधनों के साथ कराची पर हमला करने के लिए कहा जा रहा है और अगर ये हमला सफल नहीं होता है तो उसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।'' किताब के मुताबिक, ''वहाँ मौजूद हर शख्स की निगाह मेरी तरफ उठी, लेकिन मैं चुप रहा। बाद में मैंने कोहली को बुला कर कहा कि अगर आप इस योजना से सहमत नहीं हैं, तो मेरे पास सिवाए इसके कोई चारा नहीं है कि मैं रक्षा मंत्री के पास जा कर कहूँ कि आप से पश्चिमी बेड़े की कमान वापस ले ली जाए।" बाद में एडमिरल कोहली इस बात के लिए तैयार हो गए कि उन्हें जो भी आदेश दिया जाएगा, उसे वो पूरा करेंगे। पहला हमला चार दिसंबर की रात को मिसाइल बोट निपट, निरघट और वीर ने किया।
उन्होंने न सिर्फ पाकिस्तानी विध्वंसक 'खैबर' और माइन स्वीपर 'मुहाफिज' को डुबोया, बल्कि किमारी तेल टैंकों में भी आग लगा दी। दूसरा हमला आठ दिसंबर की रात में किया गया। इस बार अकेली मिसाइल बोट विनाश, दो फ्रिगेट्स त्रिशूल और तलवार के साथ गई। विनाश से मिसाइल फायर करने की जिम्मेदारी लेफ्टिनेंट कमांडर विजय जेरथ की थी। जेरथ याद करते हैं, "मैंने अपनी आखिरी मिसाइल किमारी के तेल टैंकों पर छोड़ी।
ऑपरेशन खत्म होते ही मैंने अपने कमांडिंग ऑफिसर को संदेश भेजा, 'फोर पिजंस हैपी इन द नेस्ट। रिजॉइनिंग।' जैसे ही मैं ऊपर आने लगा, उनका जवाब आया, 'इससे अच्छी दिवाली हमने आज तक नहीं देखी।' जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, उस दृश्य को मैं आपको बता नहीं सकता।" "आप इसे भयानक कह सकते हैं, खौफनाक कह सकते हैं। उत्तर से ले कर पूर्व तक सारे क्षितिज में आग लगी हुई थी और आग की लपटें 40, 60 डिग्री ऊपर तक उठ रही थीं। सच बताऊँ मेरे लिए ये खुशी की बात नहीं थी। एक सेकंड के लिए तो मैं वहीं जम कर रह गया। फिर मैंने दूसरी तरफ अपना मुंह कर लिया। ये सुखद दृश्य नहीं था।"
लेकिन हमारे चीफ का कहना है कि हमें कराची पर हमला करना ही है।" नंदा ने लिखा है, ''कोहली के कहने का अंदाज ये था जैसे उन्हें कमजोर संसाधनों के साथ कराची पर हमला करने के लिए कहा जा रहा है और अगर ये हमला सफल नहीं होता है तो उसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।'' किताब के मुताबिक, ''वहाँ मौजूद हर शख्स की निगाह मेरी तरफ उठी, लेकिन मैं चुप रहा। बाद में मैंने कोहली को बुला कर कहा कि अगर आप इस योजना से सहमत नहीं हैं, तो मेरे पास सिवाए इसके कोई चारा नहीं है कि मैं रक्षा मंत्री के पास जा कर कहूँ कि आप से पश्चिमी बेड़े की कमान वापस ले ली जाए।" बाद में एडमिरल कोहली इस बात के लिए तैयार हो गए कि उन्हें जो भी आदेश दिया जाएगा, उसे वो पूरा करेंगे। पहला हमला चार दिसंबर की रात को मिसाइल बोट निपट, निरघट और वीर ने किया।
उन्होंने न सिर्फ पाकिस्तानी विध्वंसक 'खैबर' और माइन स्वीपर 'मुहाफिज' को डुबोया, बल्कि किमारी तेल टैंकों में भी आग लगा दी। दूसरा हमला आठ दिसंबर की रात में किया गया। इस बार अकेली मिसाइल बोट विनाश, दो फ्रिगेट्स त्रिशूल और तलवार के साथ गई। विनाश से मिसाइल फायर करने की जिम्मेदारी लेफ्टिनेंट कमांडर विजय जेरथ की थी। जेरथ याद करते हैं, "मैंने अपनी आखिरी मिसाइल किमारी के तेल टैंकों पर छोड़ी।
ऑपरेशन खत्म होते ही मैंने अपने कमांडिंग ऑफिसर को संदेश भेजा, 'फोर पिजंस हैपी इन द नेस्ट। रिजॉइनिंग।' जैसे ही मैं ऊपर आने लगा, उनका जवाब आया, 'इससे अच्छी दिवाली हमने आज तक नहीं देखी।' जैसे ही मैंने दरवाजा खोला, उस दृश्य को मैं आपको बता नहीं सकता।" "आप इसे भयानक कह सकते हैं, खौफनाक कह सकते हैं। उत्तर से ले कर पूर्व तक सारे क्षितिज में आग लगी हुई थी और आग की लपटें 40, 60 डिग्री ऊपर तक उठ रही थीं। सच बताऊँ मेरे लिए ये खुशी की बात नहीं थी। एक सेकंड के लिए तो मैं वहीं जम कर रह गया। फिर मैंने दूसरी तरफ अपना मुंह कर लिया। ये सुखद दृश्य नहीं था।"
पाकिस्तान को ऐसे दिया झांसा
एडमिरल नंदा का एक और निराला आइडिया था कि कोई भी भारतीय पोत बंदरगाह में लंगर डाले न रहे ताकि पाकिस्तानी पनडुब्बियाँ उन्हें अपना निशाना न बना सके। भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी और एडमिरल नंदा के भांजे कमांडर अरुण सैगल याद करते हैं, 'जब लड़ाई छिड़ी तो हम कराची से 150 किलोमीटर दक्षिण में थे। एक जगह पर सब योजना बनाई जा रही थी। खुफिया खबरें आ रही थीं।" "अभी हाल में रॉ के अधिकारी की एक किताब छपी है जिसमें बताया गया है कि नौसेनिक अधिकारियों ने एडमिरल नंदा से कहा कि सर आपको तो याद है कि कराची बंदरगाह किस तरह का है। लेकिन हमें कराची बंदरगाह की तस्वीरें चाहिए।''
किताब के मुताबिक, ''एडमिरल नंदा ने दो फोटोग्राफरों को एक मर्चेंट शिप में कराची भेजा। शिप के डॉ से कहा गया कि आप इन्हें मरीज बना कर अपने साथ ले जाइए। उन्होंने कराची बंदरगाह पर उतर कर तस्वीरें लीं और दुबई होते हुए वापस भारत लौटे। मैंने खुद अपनी आंखों से ये तस्वीरें देखी हैं। इस तरह की चीजों की प्लानिंग छह सात महीनों से हो रही थीं।" एडमिरल नंदा ने 1971 मे दूसरा बड़ा काम किया भारतीय विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत को पाकिस्तानी पनडुब्बियों से बचाने का। उन्होंने विक्रांत को अंडमान में तैनात किया और पाकिस्तानियों की आंख में धूल झोंकी कि वो विशाखापटनम में खड़ा हुआ है। उस समय पूर्वी बेड़े के कमांडिग ऑफिसर एडमिरल कृष्णन अपनी आत्मकथा 'सेलर्स स्टोरी' में लिखते हैं, "विशाखापट्टनम में हमने कांट्रैक्टर्स को खूब सारे राशन का ऑर्डर दिया... खासतौर से गोश्त और सब्जियों का। उद्देश्य था कि ये खबर फैले कि विक्रांत विशाखापट्टनम में खड़ा है।
मुझे उम्मीद थी कि वहाँ घूम रहे पाकिस्तानी जासूस इन अफवाहों को पाकिस्तान तक पहुंचाएंगे।" "यही नहीं मैंने आईएनएस राजपूत को विक्रांत के झांसे के तौर पर इस्तेमाल किया। उसको हमने विशाखापट्टनम से 160 किलोमीटर दूर भेज दिया। उसको खूब सारे सिग्नल दिए गए और उसे उन्हें खुल कर इस्तेमाल करने के लिए कहा गया।'' उन्होंने लिखा है, ''हैवी सिग्नल ट्रैफिक का उद्देश्य था पाकिस्तानियों को संकेत देना कि यहाँ एक बड़ा जहाज खड़ा है। हमने जानबूझ कर विक्रांत के एक सेलर से एक प्राइवेट टेलिग्राम करवाया जिसमें उसने अपनी गंभीर रूप से बीमार माँ का हालचाल पूछा।"
"इस सबका नतीजा ये रहा कि कराची से पाकिस्तानी पनडुब्बी गाजी के लिए संदेश भेजा गया, 'खुफिया सूचनाएं बता रही हैं कि कैरियर बंदरगाह पर खड़ा है।' नतीजा ये हुआ कि पीएनएस गाजी उसकी टोह में वहाँ पहुंची। उसमें विस्फोट हुआ और वो वहीं डूब गई।" इस लड़ाई के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब अमरीका ने अपना सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजने का फैसला किया। एडमिरल एसएम नंदा अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "प्रधानमंत्री ने मुझे बुला कर पूछा कि क्या आपने ये खबर सुनी है कि अमरीका का सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में आ रहा है? मैंने कहा, 'जी हाँ।'"
किताब के मुताबिक, ''एडमिरल नंदा ने दो फोटोग्राफरों को एक मर्चेंट शिप में कराची भेजा। शिप के डॉ से कहा गया कि आप इन्हें मरीज बना कर अपने साथ ले जाइए। उन्होंने कराची बंदरगाह पर उतर कर तस्वीरें लीं और दुबई होते हुए वापस भारत लौटे। मैंने खुद अपनी आंखों से ये तस्वीरें देखी हैं। इस तरह की चीजों की प्लानिंग छह सात महीनों से हो रही थीं।" एडमिरल नंदा ने 1971 मे दूसरा बड़ा काम किया भारतीय विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत को पाकिस्तानी पनडुब्बियों से बचाने का। उन्होंने विक्रांत को अंडमान में तैनात किया और पाकिस्तानियों की आंख में धूल झोंकी कि वो विशाखापटनम में खड़ा हुआ है। उस समय पूर्वी बेड़े के कमांडिग ऑफिसर एडमिरल कृष्णन अपनी आत्मकथा 'सेलर्स स्टोरी' में लिखते हैं, "विशाखापट्टनम में हमने कांट्रैक्टर्स को खूब सारे राशन का ऑर्डर दिया... खासतौर से गोश्त और सब्जियों का। उद्देश्य था कि ये खबर फैले कि विक्रांत विशाखापट्टनम में खड़ा है।
मुझे उम्मीद थी कि वहाँ घूम रहे पाकिस्तानी जासूस इन अफवाहों को पाकिस्तान तक पहुंचाएंगे।" "यही नहीं मैंने आईएनएस राजपूत को विक्रांत के झांसे के तौर पर इस्तेमाल किया। उसको हमने विशाखापट्टनम से 160 किलोमीटर दूर भेज दिया। उसको खूब सारे सिग्नल दिए गए और उसे उन्हें खुल कर इस्तेमाल करने के लिए कहा गया।'' उन्होंने लिखा है, ''हैवी सिग्नल ट्रैफिक का उद्देश्य था पाकिस्तानियों को संकेत देना कि यहाँ एक बड़ा जहाज खड़ा है। हमने जानबूझ कर विक्रांत के एक सेलर से एक प्राइवेट टेलिग्राम करवाया जिसमें उसने अपनी गंभीर रूप से बीमार माँ का हालचाल पूछा।"
"इस सबका नतीजा ये रहा कि कराची से पाकिस्तानी पनडुब्बी गाजी के लिए संदेश भेजा गया, 'खुफिया सूचनाएं बता रही हैं कि कैरियर बंदरगाह पर खड़ा है।' नतीजा ये हुआ कि पीएनएस गाजी उसकी टोह में वहाँ पहुंची। उसमें विस्फोट हुआ और वो वहीं डूब गई।" इस लड़ाई के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब अमरीका ने अपना सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजने का फैसला किया। एडमिरल एसएम नंदा अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "प्रधानमंत्री ने मुझे बुला कर पूछा कि क्या आपने ये खबर सुनी है कि अमरीका का सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में आ रहा है? मैंने कहा, 'जी हाँ।'"
इस तरह से हुई थी तैयारी
"उन्होंने पूछा, 'आप क्या करने जा रहे हैं?' मैंने जवाब दिया, 'क्या आप समझती हैं अमरीका भारत के साथ युद्ध करना चाहेगा? अगर वो हमारे पोतों पर हमला करते हैं तो ये युद्ध की कार्रवाई होगी।' तब वो बोंली, 'क्या किया जाना चाहिए?' मैंने जवाब दिया, 'मैडम वो हम पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन हमें दृढ़ रहना होगा। मैं अपने जलपोतों के कप्तानों को आदेश दे रहा हूँ कि अगर उनका सामना अमरीकी जहाजों से हो तो वो अपनी आइडेंटिटीज एक्सचेंज करें और उन्हें अपने पोत पर ड्रिंक्स के लिए आमंत्रित करे।'
वो हंसने लगीं। मैंने फिर एडमिरल कृष्णन से कहा कि हमारे सारे युद्ध पोतों को इस बारे में बता दिया जाए।" एडमिरल नंदा की शख्सियत की खूबी थी उनका मावनीय पक्ष। वो छोटे से छोटे नाविक की राय लेते और उसका हालचाल पूछते। उनको नजदीक से जानने वाले वाइस एडमिरल एस के चांद याद करते हैं, "मुझे याद है 1968 में मैं लेफ्टिनेंट कमांडर था और मुंबई में तैनात था और नंदा फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ थे वाइस एडमिरल के तौर पर।'' ''मैंने उनसे कहा कि मेरी पत्नी और मैं आपको घर पर खाने पर बुलाना चाहता हूँ। उन्होंने कहा, मैं जरूर आऊंगा और एक हफ्ते बाद वो अपनी पत्नी सहित मेरे घर पर आए और हमारे साथ रात का खाना खाया।"
एडमिरल नंदा को हर छोटी चीज जो खराब हो जाती थी, उसको ठीक करने का शौक था। अरुण सैगल याद करते हैं, "वो सबसे छोटा काम अपने आप करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।'' उन्होंने कहा, ''मैं देखा करता था कि वो किचन में जाकर प्लेटों को खुद धोकर करीने से लगाया करते थे। घर की मिक्सी या टेप रिकॉर्डर खराब होता था तो उसको ठीक करने का बीड़ा भी एडमिरल नंदा उठाते थे।" "एक बार मैं उनके डिफेंस कॉलोनी वाले घर गया तो देखता क्या हूँ कि वो अपने बेडरूम के दरवाजे अपने हाथ से पेंट कर रहे हैं और उनके सारे शरीर पर सफेद पेंट लगा हुआ है।
हम लोग डरा करते थे कि कहीं इनके घर के सामने हमारी कार न खराब हो जाए। अगर ऐसा होता तो वो उसका एक एक पुर्जा खोल डालते।" नौसेना के लोग उन्हें इस बात के लिए भी याद करते हैं कि उन्होंने नेवी में शॉर्ट्स पहनने और दाढ़ी न रखने का चलन बंद करवाया। एडमिरल चांद याद करते हैं, "ब्रिटिश नेवी के जमाने से हमारे यहाँ परंपरा चली आ रही थी कि हम लोग शार्ट्स पहनते थे। एडमिरल नंदा ने हमें विकल्प दे दिया कि आप चाहे तो शॉर्ट्स पहनें या फिर फुल पैंट।"
वो हंसने लगीं। मैंने फिर एडमिरल कृष्णन से कहा कि हमारे सारे युद्ध पोतों को इस बारे में बता दिया जाए।" एडमिरल नंदा की शख्सियत की खूबी थी उनका मावनीय पक्ष। वो छोटे से छोटे नाविक की राय लेते और उसका हालचाल पूछते। उनको नजदीक से जानने वाले वाइस एडमिरल एस के चांद याद करते हैं, "मुझे याद है 1968 में मैं लेफ्टिनेंट कमांडर था और मुंबई में तैनात था और नंदा फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ थे वाइस एडमिरल के तौर पर।'' ''मैंने उनसे कहा कि मेरी पत्नी और मैं आपको घर पर खाने पर बुलाना चाहता हूँ। उन्होंने कहा, मैं जरूर आऊंगा और एक हफ्ते बाद वो अपनी पत्नी सहित मेरे घर पर आए और हमारे साथ रात का खाना खाया।"
एडमिरल नंदा को हर छोटी चीज जो खराब हो जाती थी, उसको ठीक करने का शौक था। अरुण सैगल याद करते हैं, "वो सबसे छोटा काम अपने आप करने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।'' उन्होंने कहा, ''मैं देखा करता था कि वो किचन में जाकर प्लेटों को खुद धोकर करीने से लगाया करते थे। घर की मिक्सी या टेप रिकॉर्डर खराब होता था तो उसको ठीक करने का बीड़ा भी एडमिरल नंदा उठाते थे।" "एक बार मैं उनके डिफेंस कॉलोनी वाले घर गया तो देखता क्या हूँ कि वो अपने बेडरूम के दरवाजे अपने हाथ से पेंट कर रहे हैं और उनके सारे शरीर पर सफेद पेंट लगा हुआ है।
हम लोग डरा करते थे कि कहीं इनके घर के सामने हमारी कार न खराब हो जाए। अगर ऐसा होता तो वो उसका एक एक पुर्जा खोल डालते।" नौसेना के लोग उन्हें इस बात के लिए भी याद करते हैं कि उन्होंने नेवी में शॉर्ट्स पहनने और दाढ़ी न रखने का चलन बंद करवाया। एडमिरल चांद याद करते हैं, "ब्रिटिश नेवी के जमाने से हमारे यहाँ परंपरा चली आ रही थी कि हम लोग शार्ट्स पहनते थे। एडमिरल नंदा ने हमें विकल्प दे दिया कि आप चाहे तो शॉर्ट्स पहनें या फिर फुल पैंट।"
नियमों को आसान बनाया
हम लोग ये फैसला सुन कर बहुत खुश हुए क्योंकि जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है, हमारी टाँगे पतली होने लगती हैं और हम नहीं चाहते कि कोई इन्हें देखे। दूसरी चीज जब हमारे राजपूत सैनिक अपने घर जाते थे तो उन्हें अपनी दाढ़ी बढ़ानी पड़ती थी क्योंकि नौसेना में दाढ़ी बढ़ाने की अनुमति नहीं थी। वो दस-पंद्रह दिन अपने घर नहीं जाते थे कि तब तक इनकी मूछें या दाढ़ी निकल आए। जब एडमिरल नंदा को ये परेशानी बताई गई तो उन्होंने दाढ़ी न रखने के नियम को बदल दिया। एडमिरल नंदा को औरतों को रिझाने की कला भी बखूबी आती थी।
एक बार फील्डमार्शल सैम मानेकशॉ ने उन्हें पत्र लिख कर कहा था कि इस मामले में आप मेरे गुरु हैं। एडमिरल नंदा की नातिन अमीता मेहरा बताती हैं, "उनकी सबसे अच्छी दोस्त मेरी नानी की दोस्त हुआ करती थीं। वो लेडीज मैन थे। उन्हें वो सारे गुर पता थे जिससे औरतें खुश होती थीं।'' उन्होंने कहा, ''किसी महिला की तारीफ कर मंत्रमुग्ध कर देना उनके बांए हाथ का खेल था। वो उन्हें गले लगाते और हाथ मिलाते। उन्हें डांस करने का बहुत शोक था और सभी औरतें उनके साथ डांस करने के लिए लालायित रहती थीं।" भारतीय नौसेना को आत्मनिर्भर बनाने में भी एडमिरल नंदा की बहुत बड़ी भूमिका थी। ये उनकी दूरदर्शिता का परिणाम था कि आज भारतीय नौसेना 'बायर्स नेवी' से 'बिल्डर्स नेवी' बन गई है।
एडमिरल एस के चाँद कहते हैं, "एडमिरल नंदा ने जब देखा कि हम बाहर से पोत मंगवा रहे हैं, तो इन्होंने लियेंडर प्रोजेक्ट शुरू करवाया मजगाँव डॉक्स में। शुरू में डिजाइन उन्होंने ब्रिटेन से लिया। बाद में उन्होंने भारतीय डिजाइनरों को बहुत बढ़ावा दिया।'' उन्होंने कहा, ''अब हालात यहाँ तक हो गए हैं कि हम विमानवाहक भी अपने यहाँ बना सकते हैं। पनडुब्बियाँ अभी भी जरूर बाहर से आती हैं लेकिन बाकी सभी जहाज यहीं डिजाइन होते और बनते हैं। इसकी शुरुआत नंदा साहब ने की थी।"
एक बार फील्डमार्शल सैम मानेकशॉ ने उन्हें पत्र लिख कर कहा था कि इस मामले में आप मेरे गुरु हैं। एडमिरल नंदा की नातिन अमीता मेहरा बताती हैं, "उनकी सबसे अच्छी दोस्त मेरी नानी की दोस्त हुआ करती थीं। वो लेडीज मैन थे। उन्हें वो सारे गुर पता थे जिससे औरतें खुश होती थीं।'' उन्होंने कहा, ''किसी महिला की तारीफ कर मंत्रमुग्ध कर देना उनके बांए हाथ का खेल था। वो उन्हें गले लगाते और हाथ मिलाते। उन्हें डांस करने का बहुत शोक था और सभी औरतें उनके साथ डांस करने के लिए लालायित रहती थीं।" भारतीय नौसेना को आत्मनिर्भर बनाने में भी एडमिरल नंदा की बहुत बड़ी भूमिका थी। ये उनकी दूरदर्शिता का परिणाम था कि आज भारतीय नौसेना 'बायर्स नेवी' से 'बिल्डर्स नेवी' बन गई है।
एडमिरल एस के चाँद कहते हैं, "एडमिरल नंदा ने जब देखा कि हम बाहर से पोत मंगवा रहे हैं, तो इन्होंने लियेंडर प्रोजेक्ट शुरू करवाया मजगाँव डॉक्स में। शुरू में डिजाइन उन्होंने ब्रिटेन से लिया। बाद में उन्होंने भारतीय डिजाइनरों को बहुत बढ़ावा दिया।'' उन्होंने कहा, ''अब हालात यहाँ तक हो गए हैं कि हम विमानवाहक भी अपने यहाँ बना सकते हैं। पनडुब्बियाँ अभी भी जरूर बाहर से आती हैं लेकिन बाकी सभी जहाज यहीं डिजाइन होते और बनते हैं। इसकी शुरुआत नंदा साहब ने की थी।"