{"_id":"5b6ac0914f1c1ba33e8b5baf","slug":"impact-of-dmk-chief-m-karunanidhi-demise","type":"story","status":"publish","title_hn":"'करुणानिधि' एक अनथक योद्धा का जाना...","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
'करुणानिधि' एक अनथक योद्धा का जाना...
विनोद पुरोहित, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 08 Aug 2018 03:36 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
न्यूजरूम में शाम को घड़ियां दौड़ रही थी, डेस्क पर साथियों की धड़कनें रोज की तरह बढ़ रहीं थी। वक्त पर खबरें देने का दबाव धीरे-धीरे बढ़ रहा था तभी खबर आई कि एम. करुणानिधि नहीं रहे। अखबार की सारी प्लानिंग एक बार बदल सी गई। बीमार नेता के लिए निर्धारित सिंगल कॉलम खबर का कद बढ़ गया और खबर ने नीचे से ऊपर आकर सात कॉलम की शक्ल अख्तियार कर ली।
विज्ञापन
सारे हालात किसी फिल्म की तरह दृश्य दर दृश्य बदल रहे थे.. टेलीविजन से लेकर अखबार के दफ्तर तक सिर्फ दक्षिण के इस सितारे की चर्चा शुरू हो गई। इधर खबर को सभी तथ्यों के साथ खबर संजोने की जद्दोजहद जारी थी वहीं सुदूर दक्षिणी प्रान्त तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में अस्पताल के बाहर करुणानिधि के प्रशंसकों की भावनाओं का सैलाब फूटने को था।
विज्ञापन
अपने चहेते नेता की सलामती के लिए रोते बिलखते लोगों के उठे हाथ निधन की खबर मिलने के साथ ही गम में छाती कूटने लगे। लोग ने आपा खो दिया और अस्पताल के बाहर लगाया सुरक्षा घेरा तोड़ने को आमादा हो गए। कोई धहाड़े मारकर रो रहा था तो कोई असहाय सा बाल नोच रहा था। देखते ही देखते ऐसी गमजदा तस्वीरों की न्यूज एजेंसी पर बाढ़ सी आ गई, जो इस बात का सुबूत थी कि द्रविड़ आंदोलन का यह योद्धा दक्षिण में कितना लोकप्रिय था। अपने नेता अभिनेता के लिए ऐसा जुनून दक्षिण का अलहदा अंदाज है।
विज्ञापन
करुणानिधि असल मायने में एक कुशल और पारंगत कलाकार थे। उन्होंने विचार, राजनेता, लेखक, समाजसुधारक, प्रशासक और ओजस्वी वक्ता के रूप में अलग अलग किरदार जनता के बीच करीब 80 वर्षों तक कुशलता से निभाए। सबसे कमाल की बात तो यह है असल जिंदगी में उनके निभाए सभी किरदार तमिलनाडु की जनता ने खूब पसंद भी किए। तभी तो 80 वर्षों तक उनका शानदार सियासी सफर रहा। इसमें पांच बार वे मुख्यमंत्री रहे और लगातार 13 बार विधायक रहे। जनता का उनमें और उनका जनता में इस कदर भरोसा रहा कि वे एक चुनाव भी नहीं रहे।
अन्नादुरई के शिष्य करुणानिधि लगातार 50 वर्षों तक अपनी पार्टी द्रमुक के अध्यक्ष रहे। उनके जाने के बाद अब उनकी विरासत यानी पार्टी की बागडोर बेटे स्टालिन के हाथों में होगी। स्टालिन को भी पिता के साथ काम करने का लंबा अनुभव है। तमाम सियासी ऊंच नीच से वे वाकिफ हैं। पिता की कार्यशैली और द्रमुक की रवायत में रचे बसे हैं, लेकिन यह तय है कि उनकी डगर आसान नहीं होगी।
द्रमुक की अंदरूनी स्थिति के साथ ही तमिलनाडु की सियासत में भी व्यापक बदलाव होगा। इसकी बड़ी वजह है कि तमिलनाडु सियासत में द्रविड़ आंदोलन से जुड़े और करिश्माई दिग्गज अब करुणानिधि के बाद नहीं बचे हैं। अब वहां स्थानीय क्षत्रप तो हैं लेकिन उनकी राष्ट्रीय स्तर पर कोई पहचान नहीं के बराबर है। ऐसे हालात में तमिलनाडु की सियासत के रुपहले पर्दे पर नए नए किरदार उभरेंगे। दिग्गज अभिनेता रजनीकांत और कमल हसन इनमें शामिल हैं, लेकिन सियासी बॉक्स ऑफिस पर ये कितने हिट होते हैं, ये वक्त बताएगा....फिल्म अभी बाकी है।